अशोक का तेरहवाँ बृहद् शिलालेख

भूमिका

तेरहवाँ बृहद् शिलालेख ( Thirteenth Major Rock Edict ) सम्राट अशोक के चतुर्दश बृहद् शिलालेखों में से त्रयोदश शिला प्रज्ञापन है। मौर्य सम्राट अशोक महान द्वारा भारतीय उप-महाद्वीप में ‘आठ स्थानों’ पर ‘चौदह बृहद् शिलालेख’ या चतुर्दश बृहद् शिला प्रज्ञापन ( Fourteen Major Rock Edicts ) संस्थापित करवाये गये थे। प्रस्तुत मूलपाठ ‘शाहबाजगढी संस्करण’ का मूलपाठ है। १४ बृहद् प्रज्ञापनों में से गिरनार संस्करण सबसे सुरक्षित अवस्था में पाया गया है। इसलिए चतुर्दश शिला प्रज्ञापनों में से बहुधा इसी संस्करण का उपयोग किया जाता है। तथापि अन्यान्य संस्करणों को मिलाकर पढ़ा जाता रहा है, जैसे कि यहाँ पर शाहबाजगढी संस्करण उद्धृत है।

तेरहवाँ बृहद् शिलालेख : संक्षिप्त परिचय

नाम – अशोक का तेरहवाँ बृहद् शिलालेख या त्रयोदश बृहद् शिलालेख ( Ashoka’s Thirteenth Major Rock Edict )

स्थान – शहबाजगढी, पेशावर; पाकिस्तान

भाषा – प्राकृत

लिपि – खरोष्ठी

समय – मौर्यकाल

विषय – धर्मिक भावना का जागरण; कलिंग युद्ध; सीमान्त राज्य; राजा के धार्मिक विचार, प्रशासनिक और सामाजिक दृष्टिकोण का विवरण।

तेरहवाँ बृहद् शिलालेख : मूलपाठ

१ – अढवषअभिंसितस देवन प्रियस प्रिअद्रशिस रञो कलिग विजित [ । ] दिअढमत्रे प्रणशतमहस्रे ये ततो अपवुढे शतसहस्रमत्रे तत्र हते बहुतवतके व मुटे [ । ]

२ – ततो पचो अधुन लधेषु कलिगेषु तिव्रे ध्रमशिलनं ध्रमकमत ध्रमनुशस्ति च देवनं प्रियसर [ । ] सो अस्ति अनुसोचनं देवनं प्रियस विजिनिति कलिगनि [ । ]

३ – अविजतं हि विजिनमनो यो तत्र वध न मरणं व अपवहो व जनस तं बढं वेदनियमतं गुरुमतं च देवनं प्रियस [ । ] इदं पि चु ततो गुरुमततरं देवनं प्रियस [ । ] व तत्र हि

४ – वसति ब्रमण व श्रमण व अंञे व प्रषंड ग्रहथ व येसु विहित एष अग्रभुटि-सुश्रुत मतपितुषु सुश्रुष गुरुनं सुश्रुष मित्रसंस्तुतसहयञ्तिकेषु दसभटकनं संमप्रतिपति द्रिढभतित तेषं तत्र भोति अपग्रथो व वधो व अभिरतन व निक्रमणं [ । ] येषं व संविहितनं [ सि ] नहो अविप्रहिनो ए तेष मित्रसंस्तुतसहञतिक वसन

५ – प्रपुणति तत्र तं पि तेष वो अपघ्रथो भोति [ । ] प्रतिभंग च एतं सव्रं मनुशनं गुरुमतं च देवनं प्रियस [ । ] नस्ति च एकतरे पि प्रषंडस्पि न नम प्रसदो [ । ] सो यमत्रो जनो तद कलिगे हतो च मुटो च अपवुढ च ततो

६ – शतभगे व सहस्रभगं व अज गुरुमतं वो देवनं प्रियस [ । ] यो पि च अपकरेयति छमितवियमते वे देवनं प्रियस यं शको छमनये [ । ] य पि च अटवि देवनं प्रियस विजिते भोति त पि अनुनेति अपुनिझपेति [ । ] अमुतपे पि च प्रभवे

७ – देवनं प्रियस वुचति तेष किति अवत्रपेयु न च हंञेयसु [ । ] इछति हि देवनं प्रियो सव्रभुतन अछति संयमं समचरियं रभसिये [ । ] एषे च मुखमुते विजये देवनं प्रियस यो ध्रमविजयो [ । ] सो चन पुन लधो देवनं प्रियस इह च अन्तेषु

८ – अषपु पि योजन शतेषु यत्र अन्तियोको नम योनरज परं च तेन अन्तियोकेत चतुरे ४ रजनि तुरमये नम अन्तिकिनि नम मक नम अलिकसुदरो नम निज चोड पण्ड अब तम्बपंनिय [ । ] एवमेव हिद रज विषवस्पि योन-कंबोयेषु नमभ नभितिन

९ – भोज-पितिनिकेषु अन्ध्रपलिदेषु सवत्र देवनं प्रियस ध्रुमनुशस्ति अनुवटन्ति [ । ] यत्र पि देवनं प्रियस दुत न व्रचन्ति ते पि श्रुतु देवनं प्रियस ध्रमवुटं विधेनं ध्रुमनुशस्ति ध्रमं अनुविधियन्ति अनुविधियशन्ति च [ । ] यो च लधे एतकेन भोति सवत्र विजयो सवत्र पुन

१० – विजयो प्रतिरसो सो [ । ] लघ भोति प्रति ध्रमविजयस्पि [ । ] लहुक तु खो स प्रित [ । ] परत्रिकेव महफल मेञति देवन प्रियो [ । ] एतये च अठये अयो ध्रमदिपि दि पस्त [ । ] किति पुत्र पपोत मे असु नवं विजयं म विजेतविअ मञिषु [ । ] स्पकस्पि यो विजये छन्ति च लहुदण्डतं च रोचेतु [ । ] तं एवं विज [ यं ] मञ [ तु ]

११ – यो ध्रुमविजयो [ । ] सो हिदलोकिको परलोकिको [ । ] सव्र च निरति भोतु य स्रमरति [ । ] स हि हिदलोकिक परलोकिक [ । ]

तेरहवाँ बृहद् शिलालेख : संस्कृत छाया

अष्टवर्षाभिषिक्तस्य देवानां प्रियस्य प्रियदर्शिना राज्ञेः कलिंगा विजिताः। अधयर्धमानं प्राणशतसहस्रं शतसहस्रमात्रास्तमहता बहुतावत्का व मताः। ततः पश्चात् अधुना लब्द्धेषु कलिंगेषु तीव्रं धर्मशीलनं, धर्मकामता, धर्मानुशस्तिः च देवानां प्रियस्य। तत् अस्ति अनुशोचनं देवानां प्रियस्य विजित्य कलिंगान। अविजिते हि विजीयमाने यतत्र वधो वा मरण वा अपवहो वा जनस्य। तद्वाढं वेदनीयमतो गुरुमतं च देवानां प्रियस्य। इदमसि च तु ततो गुरुमततरं देवानां प्रियस्य। ये तत्र वसन्ति ब्राह्मणा वा श्रमणा वा अन्ये वा पाषण्डा गृहस्थासवा येषु विहितैसा अग्रबुद्धशुश्रुषा माता-पितशुश्रूया गुरुणांशुश्रूषा मित्रसंस्तुत सहायज्ञतिषु दासभतकेषु सम्यकप्रतिपत्तिर्दढ़भक्तिता। तेषां तत्र भवति उपघातो वा वधो वा अभिरतानां वा निष्क्रमणम् येषां वापि संविहितानां स्नेहः अविप्रहीन एतेषां मित्रसंस्तुत सहाय ज्ञातीया व्यसनं प्राप्नुवन्ति तत्सोपि तेषामेव उपघातो भवति। प्रतिभागं चैतत सर्वे मनुष्याणां गुरुमतं च देवानां प्रियस्य। नास्ति च एकतरे अपि पार्षदे न नाम प्रसादः। तत यन्मात्रः जनः तदा कलिंगे हृतः च मतः च अपवाढेः च ततः शतभागो वा सहस्र भागो वा अद्य गुरुमत एव देवानां प्रियस्य। योऽपि च अपकरोति क्षन्तव्य एव मतो देवानांप्रियस्य यः शक्यः क्षमषाय। योपिचाटविकः देवानां प्रियस्य विजितो भवति तपप्यनुनयत्यनुनिध्यायति। अनुतायेऽपि च प्रभावो देवानां प्रियस्य उच्यते तस्य। किमित्यपत्रपेरन्न च हन्येस्। इच्छति हि देवानां प्रियः सर्वभूतानमक्षति संयम समचर्या मोदवत्तिम्। एतञ्चमुख्यारत विजये देवानां प्रियस्य यो धर्मविजयः। सच पुनः लब्धो देवानां प्रियस्येह च सर्वेषु चान्तेष्टष्टस्वपि योजन शतेषु यत्र अन्तियोको नाम यवन राजः परं च तस्माद् अन्तियोका चत्वारो राजानस्तुरमयो नाम अन्तिकोनो नाम मगो नाम अलिकसुन्दरो नाम नीचाः चोडाः पाण्ड्याः एवं ताम्रपर्णीयाः। एवमेव इह राज्य विषयेषु यवन कम्बोजेषु नाभके नामप्रान्तेषु भोज पितिनिक्येषु आन्ध्रपुलिन्देषु सर्वत्र देवानां प्रियस्य धर्मानुशिष्टिमनुवर्तते। यत्राति द्वता देवानां प्रियस्य न यान्ति तत्रापि श्रुत्वा देवानां प्रियस्य धर्मवत्तं निधानं धर्मानुशिष्टिं धर्ममनुविधत्यनुविधास्यन्ति च। यत्रलब्धं एतावता भवति सर्वत्र विजयः प्रीतिरसः सः। गाढ़ा सा भवति प्रीतिः। पारमिकमेव महाफलं मन्यते देवानां प्रियः एतस्मे चार्व्यापयं धर्मलिपिः लिखिता। किमिति? पुत्राः प्रपौत्रा मे शृणुयुः नवं विजयं मा विजेतव्यं मन्येरन्। शराकर्षिणो विजये शान्ति च लघुदण्डतां च रोचयन्ताम्। तमेव च विजयं मन्यतां यो धर्मविजयः। स एहलौकिक-पारलौकिकः। सवचि निरतर्भवतु या उद्यमरतिः। सा हि ऐहलौकिकपारलौकिकी।

हिन्दी अनुवाद

१ – आठ वर्षों से अभिषिक्त देवों के प्रियदर्शी राजा से कलिंग विजित हुआ। डेढ़ लाख प्राणी यहाँ से बाहर ले जाये गये ( बन्दी बना लिये गये ), सौ हजार ( एक लाख ) वहाँ आहत ( घायल या हताहत ) हुए; [ तथा ] उससे [ भी ] अधिक बहुत अधिक संख्या में मरे।

२ – तत्पश्चात् अब कलिंग के उपलब्ध होने पर देवों के प्रिय का धर्मवाय ( धर्मपालन ), धर्मकामता ( धर्म की इच्छा ) और धर्मानुशासन तीव्र हुए। सो कलिंग के विजेता देवों के प्रिय को अनुशय ( पश्चाताप; अनुशोचन ) है।

३ – क्योंकि मैं विजित [ देश ] को अविजित ही मानता हूँ; यदि वहाँ के जन ( लोग ) का वध, मरण वा अपवाह ( बन्दी बना लेना ) होता है। यह ( वध, बन्दी आदि ) देवों के प्रिय से अत्यन्त वेदनीय ( दुःखदायी ) और गुरु ( भारी ) माना गया है। यह वध आदि देवों के प्रिय द्वारा उससे भी अधिक भारी माना गया है।

४ – [ क्योंकि ] वहाँ ब्राह्मण, श्रमण, दूसरे पाषण्ड ( पन्थ वाले ) और गृहस्थ बसते हैं, जिसमें ये विहित ( प्रतिष्ठित ) हैं — सबसे पहले ( आगे ) भरण [ पोषण ], माता-पिता की शुश्रूषा; मित्रों प्रशंसितों ( अथवा परिचितों ), सहायकों [ तथा ] सम्बन्धियों के प्रति [ एवं ] दासों व वेतनभोगी सेवकों के प्रति सम्यक् व्यवहार [ तथा ] दृढ़भक्ति। उनका ( ऐसे लोगों का ) वहाँ उपघात ( अपघात ) का वध या सुख से रहते हुओं का विनिष्क्रमण ( देशनिकाला, निष्क्रमण ) होता है। या जिन व्यवस्थित [ लोगों ] का स्नेह अक्षुण्ण है, उनके मित्र, प्रशंसित ( या परिचित ), सहायकों और सम्बन्धियों को व्यसन ( दुःख ) की प्राप्ति होती है।

५ – [ इसलिए ] वहाँ उनका ( मित्रादि का भी ) [ अक्षुण्ण स्नेह के कारण ] उपघात हो जाता है। यह दशा सब मनुष्यों की है; परन्तु देवों के प्रिय द्वारा अधिक भारी ( दुःखद ) मानी गयी है। ऐसा [ कोई ] भी जनपद नहीं है, जहाँ ब्राह्मणों और श्रमणों के वर्ग न हों। कहीं भी जनपद [ ऐसा स्थान ] नहीं है, जहाँ मनुष्यों का किसी न किसी पाषण्ड ( पन्थ ) में प्रसाद ( प्रीति, स्थिति ) न हो। सो तब ( उस समय ) कलिंग के उपलब्ध होने पर जितने जन ( लोग, मनुष्य ) मारे गये, मर गये और बाहर निकाले गये, उनमें से

६ – सौवाँ भाग वा हजारवाँ भाग भी [ यदि आहत होता, मारा जाता या निकाला जाता तो ] आज देवों के प्रिय से भारी ( खेदजनक ) माना जाता। जो भी अपकार करता है, [ वह भी ] देवों के प्रिय द्वारा क्षन्तव्य माना गया है, यदि [ वह ] क्षमा किया जा सके।  जो भी अटवियों ( वन्य प्रदेशों ) [ के वासी ] देवों के प्रिय के विजित ( राज्य ) में हैं, उन्हें भी [ वह ] शान्त करता है और ध्यानदीक्षित कराता है। अनुताप ( पश्चाताप ) होने पर भी देवों के प्रिय का प्रभाव उन्हें कहा [ बताया ] जाता है, जिसमें [ वे अपने दुष्कर्मों पर ] लज्जित हों और न मारे जायँ।

७ – देवों का प्रिय भूतों ( प्राणियों ) की अक्षति, संयम, समचर्चा और मोदवृत्ति ( मोद ) की इच्छा करता है। जो धर्मविजय है, वहीं देवों के प्रिय द्वारा मुख्य विजय मानी गयी है। पुनः देवों के प्रिय की वह [ धर्मविजय ] यहाँ [ अपने राज्य में ] और सब अन्तों ( सीमान्तस्थित राज्यों ) उपलब्ध हुई है।

८ – [ वह धर्मविजय ] छः सौ योजनों तक, जहाँ अन्तियोक नामक यवनराज है और उस अन्तियोक से परे चार राजा – तुरमय ( तुलमय ), अन्तिकिनी, मक ( मग ) और अलिकसुन्दर नामक – हैं, और नीचे ( दक्षिण में ) चोड, पाण्ड्य व ताम्रपर्णियों ( ताम्रपर्णीवालों ) तक [ उपलब्ध हुई है ]। ऐसे ही यहाँ राजा के विषय ( राज्य ) में यवनों [ और ] कांबोजों में, नाभक और नाभपंति ( नभिति ) में,

९ – भोजों [ और ] पितिनिकों में [ तथा ] आंध्रों [ और ] पुलिन्दों में सर्वत्र देवों के प्रिय धर्मानुशासन का [ लोग ] अनुवर्तन ( अनुसरण ) करते हैं। जहाँ देवों के प्रिय दूत न भी जाते हैं, वे भी देवों के प्रिय के धर्मवृत्त को, विधान को और धर्मानुशासन को [ अपने राज्यों में ] सुन कर धर्म का अनुविधान ( आचरण ) करते हैं एवं अनुविधान ( आचरण ) करेंगे।

१० – अब तक जो ( विजय ) उपलब्ध हुई है, वह विजय सर्वत्र प्रीतिरसवाली है। वह प्रीति धर्मविजय में गाढ़ी जाती है। किन्तु वह प्रीति निश्चय ही लघुतापूर्ण ( क्षुद्र, हलकी ) है। देवों का प्रिय पारत्रिक ( पारलौकिक ) [ प्रीति आनन्द ] को महाफलवाला मानता है। इस अर्थ ( प्रयोजन ) के लिए यह धर्मलिपि लिखवायी गयी, जिसमें [ जो ] मेरे पुत्र [ एवं ] प्रपौत्र हों, [ वे ] नवीन विजय को प्राप्त करने योग्य भी माने। स्वरस ( अपनी प्रसन्नता ) से प्राप्त विजय में [ वे ] शान्ति और लघुदण्डता को पसन्द करें और उसको ही विजय मानें, जो धर्मविजय है।

११ – वह [ धर्मविजय ] इहलौकिक [ व ] पारलौकिक [ फल देनेवाली है ]। जो धर्मरति ( उद्मरति ) उद्यम से उत्पन्न है [ है, वही ] सब [ प्रकार का ] आनन्द हो ( माना जाये ), क्योंकि वह ( धर्म या उद्यम का आनन्द इहलौकिक और पारलौकिक ) [ फल देनेवाला है ]।

प्रथम बृहद् शिलालेख

द्वितीय बृहद् शिलालेख

तृतीय बृहद् शिलालेख

चतुर्थ बृहद् शिलालेख

पाँचवाँ बृहद् शिलालेख

छठा बृहद् शिलालेख

सातवाँ बृहद् शिलालेख

आठवाँ बृहद् शिलालेख

नवाँ बृहद् शिलालेख

दसवाँ बृहद् शिलालेख

ग्यारहवाँ बृहद् शिलालेख

बारहवाँ बृहद् शिलालेख

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