दामोदरपुर ताम्रपत्र (चतुर्थ)

परिचय

दामोदरपुर ताम्रपत्र (चतुर्थ) बांग्लादेश से मिले पाँच अभिलेखों में चौथा है। इसको राधागोविन्द बसाक महोदय ने प्रकाशित किया।

संक्षिप्त परिचय

नाम :- दामोदरपुर ताम्रपत्र (चतुर्थ) [ Damodarpur Copper Plate Inscription Of Budhgupta ]

स्थान :- दामोदरपुर, उत्तरी बाँग्लादेश का रंगपुर जनपद।

भाषा :- संस्कृत

लिपि :- उत्तरवर्ती ब्राह्मी

समय :- तिथि अनुपलब्ध; बुधगुप्त का शासनकाल

विषय :- भूमि क्रय करके अक्षयनीवी दान से सम्बन्धित, विषय की प्रशासनिक जानकारी का स्रोत।

मूलपाठ

एक ओर

१. ……. फाल्गुन-दि १० (+) [५] परमदैवत-परमभट्टारक- महाराजाधिराज श्रीबुधगु[प्ते पृथिवी]-

२. [पतौ त]त्पाद-परिगृहीतस्य पुण्ड्रवर्द्धन भुक्ताबुपरिक महाराज जयदत्तस्य भोगेन

नुविहमा]-

३. नके [को]टि [वर्ष्ष] विषये च तन्नियुक्तक आयुक्तक भण्डके [अ]धिष्ठानाधिकरणं

नगर श्रेष्ठिरिभु-

४. पा[ल] सार्त्थवाह-वसुमित्र प्रथमकुलिक-वरदत्त प्रथमकायस्थ-विप्रपाल पुरोगे च

स[म्व्य]वहरति [I]

५. अनेन श्रेष्ठि-रिभुपालेन विज्ञापितं [।] हिमवच्छिखरे कोकामुखस्वामिनः चत्वारः

कुल्यवापाः [श्वे]तव-

६. राहस्वामिनो(ऽ)पि सप्त कुल्यवापाः अस्मत्फलाशान्सिना पुन्याभिवृद्धये डोङ्गाग्रामे पूर्वं मया

७. अप्रदा अतिसृष्टकास्तदहन्तत्क्षेत्र-सामीप्य-भूमौ तयोराद्य-कोकामुख-स्वामि-श्वेतवराह-

८. स्वामिनोर्ना[म]ल्लिङ्ग-[क्षोणि] देवकुल-द्वयमेतत्कोष्ठिका-द्वयञ्च कारयितुमिच्छाम्यर्हथ

वास्तुनो

९. षट् [कुल्य] वापान्यथाक्रय मर्य्यादया दातुमिति [।] यतः पुस्तपाल-विष्णुदत्त विजय

[नन्दि]-स्थानु-

१०. नन्दिनामवधारणयावधृतमस्त्यनेन हिमवच्छिखरे तयोः कोकामुख-स्वामि-

श्वेतवरा[ह] स्वामि[नोः]

११. अप्रदा क्षेत्र-कुल्यवापा एकदश दत्तकास्तदर्थञ्चेह देवकुल-कोष्ठिका-करणे

युक्त[मे]त[द्विज्ञा]-

१२. [पितं क्र]मेण तत्क्षे[त्र]-सामीप्य भूमौ वास्तु दातुमित्यनुवृत्त-त्रिदीनारिक्यकु-

[ल्यवा]प-विक्रय[मर्थ्या]द-

दूसरी ओर

१३. [या] ……. रा कुलन — रागर (?) – – – –

१४. …….. पु[ष्करि]णी पू[र्वेण] रिभु[पा]ल-पूर्व्वस्तक क्षेत्र] [दक्षिणेन] [पञ्च]

१५. [कुल्यापा] दत्ताः [।] [त]दुत्तरकालं [सं.]व्यवहारिभिर्द्देवभ[क्तया]-

नुमन्तव्याः [।] [उक्तं] व्यासेन [I]

स्व-दत्तां परदत्त-

१६.           [म्वा यो हरेत] वसुन्धराम् [I]

स विष्टा[यां] [क्रिमिर्भ्भूत्वा] पि[तृ]भिस्स[ह पच्यते[॥]

पूर्व्वं-दत्तां द्विजातिभ्यो

१७.         [यत्नाद्रक्ष यु]धिष्ठिर [।]

मही [महीमतां] श्रेष्ठ दा[नाच्छ्रेयो(ऽ)नुपालनं] [॥]

१८. बहु]भिर्व्वासु[धा द]त्ता [राजभिश्च] पुनः पुनः [I]

[य]स्य [य]स्य यदा भूमि[स्तस्य तस्य] त[दा] फलमिति [॥]

हिन्दी अनुवाद

…….. फाल्गुन दिन १५।

परमदैवत परमभागवत महाराजाधिराज श्री बुधगुप्त पृथ्वीपति हैं। उनके परिगृहीत पुण्ड्रवर्धन भुक्ति के उपरिक जयदत्त के प्रशासन में समृद्धि प्राप्त करनेवाला कोटिवर्ष विषय; वहाँ उनके द्वारा नियुक्त आयुक्त भंडक के अधिष्ठान के अधिकरण के नगर श्रेष्ठि रिभुपाल, सार्थवाह वसुमित्र, प्रथमकुलिक वरदत्त, प्रथमकायस्थ विप्रपाल और पुरोग यह सूचना देते हैं —

यहाँ के श्रेष्ठि रिभुपाल ने निवेदन प्रस्तुत किया है कि पुण्य लाभ की आशा से मैंने हिमवच्छिखर (हिमालय पर्वत शृंखला) में स्थित कोकमुखस्वामी को चार कुल्यवाप और श्वेत- वराहस्वामी को सात कुल्यवाप भूमि डोंगा ग्राम के पूर्व अप्रदा अतिसृष्टक के रूप में दे रखी है। अब मैं उसी भूमि के समीप इस आद्य कोकामुखस्वामी और श्वेत वराहस्वामी के निमित्त इसलिए क्षोणि (अदृश्य पृथिवी) पर दो देवकुल (मन्दिर) और दो कोष्ठक (भण्डार गृह) बनाने के लिए विक्रय-मर्यादा के अनुसार छः कुल्यवाप वास्तुभूमि क्रय करना चाहता हूँ।

अतः पुस्तपाल विष्णुदत्त, विजयनन्दि, स्थाणुनन्दिन से पूछने से ज्ञात हुआ कि हिमवच्छिखर में कोकमुखस्वामी और श्वेतवराहस्वामी को जो ग्यारह कुल्यवाप अप्रदा क्षेत्र दिया गया है, उसी के क्रम में देवकुल और कोष्ठक बनाने के निमित्त जिस भूमि की इच्छा की गयी है उसके लिए तीन दीनार प्रति कुल्यवाप [मूल्य] की मर्यादा है। ………….. पुष्करिणी के पूर्व, रिभुपाल द्वारा पहले दी गयी भूमि के दक्षिण [छः कुल्यवाप] दिया गया। भविष्य में होनेवाले संव्यवहारिन (अधिकारी) भक्तिपूर्वक व्यास के इस कथन का परिपालन करें —

अपनी या दूसरों को दी गयी भूमि का जो अपहरण करता है वह पितरोंसहित विष्ठा का कीड़ा होता है।

पूर्वकाल में ब्राह्मणों को जो भूमि दी गयी है, उसकी रक्षा हे युधिष्ठिर करो। भूमिदान श्रेष्ठ है, उससे भी श्रेष्ठ भूमिदान का अनुपालन है।

बहुत सी भूमि राजाओं ने निरन्तर दी है। जो जितनी ही भूमि देता है, उसे उसी के अनुसार फल मिलता है।

दामोदरपुर ताम्रपत्र अभिलेख ( प्रथम ) गुप्त सम्वत् १२४ ( ४४३ – ४४ ई० )

दामोदरपुर ताम्रपत्र लेख (द्वितीय) – गुप्त सम्वत् १२८ ( ४४७-४८ ई० )

दामोदरपुर ताम्र-लेख ( तृतीय ); गुप्त सम्वत् १६३ ( ४८२ ई० )

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