मन्दसौर अभिलेख; मालव सम्वत् ४९३ व ५२९

भूमिका

मन्दसौर अभिलेख, मन्दसौर (मध्य प्रदेश) नगर में शिवाना नदी के तट पर स्थित भगवान शिव को समर्पित एक मंदिर महादेव घाट की सीढ़ियों पर लगे एक शिला फलक पर अंकित मिला था। इसे १८८५ में पीटर पेटर्सन ने प्रकाशित किया था। किन्तु इसे ढूँढ निकालने का श्रेय फ्लीट के एक लिपिक को दिया जाता है जिसे उन्होंने वहाँ यशोधर्मन के अभिलेख की प्रतिलिपि करने के लिये भेंजा गया था। तब फ्लीट ने इसे सम्पादन कर प्रकाशित किया है। तदन्तर उनके पाठ, अनुवाद एवं व्याख्या सम्बन्धी भूलों को लेकर अनेक लेख प्रकाशित हो चुके हैं।

संक्षिप्त परिचय

नाम :- मन्दसौर अभिलेख

स्थान :- मन्दसौर, शिवाना नदी के तट पर महादेव घाट की सीढ़ी, मध्य प्रदेश

भाषा :- संस्कृत

लिपि :- ब्राह्मी

समय :- गुप्तकाल, मालव सम्वत् ४९३ ( ४३६ ई० ) और ५२९ ( ४७२ ई० )

विषय :- सूर्य मंदिर का निर्माण और पुनर्निर्माण का विवरण

रचयिता :- वत्सभट्टि

मूलपाठ

१. [ सिद्धम्॥ ]

[ यो ] [ धृत्य ] मुपास्यते सुर-गणैस्सिद्दैश् [ च ] सिद्ध्यर्त्विभि-

दर्ध्यनैकाग्र-परैर्व्विधेय-विषयैर्म्मोक्षार्त्थिभिर्य्योगिभिः।

भक्त्या तीव्र-तपोधनैश्च मुनिभिश्शाप-प्रसाद-क्षमै-

र्हेतुर्य्या जगत क्षयाभ्युदययोः पायात्स वो भास्करः [ । १ ]

तत्व-ज्ञान-विदो(ऽ)पि यस्य न विदुर्ष

२.                                   यो(ऽ)भ्युद्यतः –

कृत्स्नं यश्च गभस्तिभिः प्रवृसृतैः पु [ ष्ण ] आति लोक त्रयम् [ । ]

गन्धर्व्वामर-सिद्ध-किन्नर-नरैस्संस्तूयते(ऽ) भ्युत्थितो

भक्तेभ्यश्च ददाति यो(ऽ) भिलषितं तस्मै सवित्रे नमः। [ । २ ]

य प्रत्यहं प्रतिविभात्पुदयाचलेन्द्र-

विस्तीर्ण्ण-तुङ्ग-शिखर-स्खलितांशुजालः [ । ]

क्षीबाङ्गना-

३.                   जन-कपोल-तलाभिताम्र-

पायात्स वस्सु [ किं ] रणाभरणोविवस्वान् [ ॥ ३ ]

कुसुमभरानततरुवर-देवकुल-सभा-विहार-रमणियात्।

लाट विषयान्नगावृत-शैलाज्जगति प्रथित शिल्पाः [ । ४ ]

ते देश-विगुणापहृताः प्रकाश-

मद्ध्वादिजान्यविरलान्यासुखा-

४.                          न्यपास्य।

जातादरा दशपुरं प्रथमं मनोभि-

रन्थागतासस्ससुत-बन्धु-जनास्समेत्य [ ॥ ५ ]

मत्तेभ-गण्ड तट-विच्युत-दान-बिन्दु-

सिक्तोपलाचल-सहस्र-विभूषाणायाः [ I ]

पुष्पावनम्र-तरु-षण्ड-वतंसकाया

भूमे पुरन्तिलक-भूतमिदं क्रमेण [ ॥ ६ ]

तटोत्थ-वृक्ष-च्युत-

५.                           नैक-पुष्प-

विचित्र-तीरान्त-जलानि भान्ति।

प्रफुल्ल-पद्मभरणानि यत्र सरांसि कारण्डव-संकुलानि [ ॥ ७ ]

विलोल-वीची-चलितारविन्द-पतद्रजः-पिञ्जरितैश्च हंसैः।

स्व-केसरोदार-भरावभुग्नैः क्वचित्सरांस्यम्बुरुहैश्च भान्ति। [ । ८ ]

स्व-पुष्प-भारावनतैर्न्नगेन्द्रै-र्मद-।

६.                 प्रगल्भालि-कुल-स्वनैश्च।

अजस्रगाभिश्च पुराङ्गनाभि-र्व्वनानि यस्मिन्समलंकृतानि [ ॥ ९ ]

चलत्पताकान्यबला-सनाथा-न्यत्यर्त्थ-शुक्लान्यधिकोन्नतानि।

तडिल्लता-चित्र-सिताब्भ्र-कूट-तुल्योपमानानि गृहाणि यत्र [ ॥ १० ]

कैलास-तुङ्ग-शिखर-प्रतिमानि चान्या-

न्याभान्ति दीर्घ-बलभी-

७.                  नि सवेदिकानि।

गान्धर्व्व-शब्द-मुखरानि निविष्ट-चित्र-

कर्म्माणि लोल-कदली-वन-शोभितानि [ ॥ ११ ]

प्रासाद मालाभिरलंकृतानि धरां विदार्य्यैव समुत्थितानि।

विमान-माला-सदृशानि यत्र गृहाणि पूर्णेन्दु-करामलानि [ ॥ १२ ]

यद्भात्यभिरम्य-सरिद्वयेन चपलोर्म्मिणा समुपगूढं [ । ]

८. रहसि कुच-शालिनीभ्यां प्रीति-रतिभ्यां स्मराङ्गमिव [ ॥ १३ ]

सत्य-क्षमा-दग-शम-व्रत-शौच-धैर्य्य-

[ स्वाद्ध्या ] य-वृत-विनय-स्थिति-बुद्ध्युपेतैः।

विद्या-तपो-निधिभिरस्मयितैश्च विप्रै-

र्य्यभ्राजते ग्रह-गणै खमिव प्रदीप्तैः [ ॥ १४ ]

अथ समेत्य निरन्तर-सङ्गतै-रहरहः प्रविजृम्भित-

९.                        सौहृदाः [ । ]

नृपतिभिस्सुतवत्प्रतिमा] निताः प्रमुदिता न्यवसन्त सुखं पुरे [ ॥ १५ ]

श्रवण- [ सु ] भग गान्धर्व्वे दृढं परिनिष्ठिताः

सुचरित-शतासङ्गा केचिद्विचित्र-कथाविदः [ । ]

विनय-निभृतास्सम्यग्धर्म-प्रसङ्ग-परायाणा-

प्रियमपरुषं पत्थ्यं चान्ये क्षमा बहु भाषितुं [ ॥ १६ ]

१०. केचित्स्व-कर्म्मण्यधिकास्तथान्यै विज्ञायते ज्योतिममात्मवद्भिः [ । ]

अद्यापि चान्ये समर-प्रगल्भ-कुर्व्वन्त्यरीणामहितं प्रसह्य॥ [ १७ ]

प्राज्ञा मनोज्ञ-वधवः प्रथितोरुवंशा वंशानुरूप-चरिताभरणास्तथान्ये।

सत्यव्रताः प्रणयिनामुपकार-दक्षा विस्रम्भ-

११.        [ पूर्व्व ] मपरे दृढ़-सौहृदाश्च [ ॥ १८ ]

विजित-विषय-सङ्गैर्द्धर्म-शीलैस्तथान्यै-

[ र्मृ ] दुभिरधिक-सत्वैर्ल्लोकयात्रामरैश्च [ । ]

स्व-कुल-तिलक भूतैर्मुक्तरागैरुदारै-

रधिकमभिविभाति श्रेणिरेवं प्रकारैः [ ॥ १९ ]

तारुण्य-कान्त्युपचितो(ऽ) पि सुवर्ण्ण-हार-

तांबूल-पुरुष-विधिना सम-

१२.                  [ लंकृ ] तो (ऽ) पि।

नारी-जनः श्रियमुपैति न तावदग्ग्रयां

यावन्न पट्टमय-वस्त्र- [ यु ] गानि धत्ते [ ॥ २० ]

स्पर्श [ व ] ता [ व्वर्णा ] न्तर-विभाग-चित्रेण नेत्र-सु [ भ ] गेन [ । ]

यैस्सकलमिदं क्षितितलमलंकृतं पट्टवस्त्रेण [ ॥ २१ ]

विद्याधरी-रूचिर-पल्लव-कर्ण्णपूर-

वातेरितास्थिरतरं प्रविचिन्त्य

 

१३.               [ लो ] कं [ । ]

मानुष्यमर्त्य-निचयांश्च तथा विशालां

[ स्ते ] षां शुभेमतिरभूदचला ततस्तैः [ ॥ २२ ]

चतुरस्समुद्राम्बु-विलोल-मे [ खलां ] सुमेरु-कैलास-बृहत्पयोधराम् [ । ]

वनान्त-वान्त-स्फुट-पुष्प-हासिनीं कुमारगुप्ते प्रिथिवीं-प्रशासति [ ॥ २३ ]

समान-धीश्शुक्र-वृहस्पतिभ्यां ललामभूतो भुवि

१४.                पार्त्थिवानां [ । ]

रणेषु यः पार्थ-समानकर्म्मा

वभूव गोप्ता नृप-विश्ववर्म्मा [ ॥ २४ ]

दीनानुकंपन-परः कृपणार्त्त-वर्ग्ग-

सान्त्व प्रदो (ऽ) धिकदयालुरनाथ-नाथः [ । ]

कल्पद्रुमः प्रणयिनामभयं प्रदश्च

भीतस्य यो जनपदस्य च बन्धुरासीत् [ ॥ २५ ]

तस्यात्मजः स्थैर्य्य-नयोपपन्नो बन्धुप्रियो

१५.                 बन्धुरिव प्रजानां [ ॥ ]

बंध्वर्ति-हर्ता नृप-बन्धुवर्म्मा द्विइद्दप्त पक्ष-क्षपणैकदक्षः [ ॥ २६ ]

कान्तो युवा रण पटुर्व्विनयान्वितश्च

राजापि सन्नुपसृतो न मदैः स्मयाद्यैः [ । ]

शृङ्गार मर्त्तिरभिभात्यनलंकृतोऽपि

रूपेण य कुसुम-चाप इव द्वितीयः [ ॥ २७ ]

वैधव्य-तीव्र व्यसन-क्षतानां

१६.         स्मृत्वा यमद्याप्यरि-सुन्दरीणां।

भयाद्भवत्यायत लोचनानां घन-स्तनायास-करः प्रकम्पः [ ॥ २८ ]

तस्मिन्नेव क्षितिपति-वृषे बंधुवर्म्मण्युदारे

सम्यक्स्फीतं दशपुरमिदं पालयत्युन्नतांसे।

शिल्पावाप्तैर्द्धन-समुदयैः पट्टवायैरुदारं

श्रेणीभूतैर्ब्भवनमतुलं कारितं

१७.         दीप्तरश्मेः [ ॥ २९ ]

विस्तीर्ण्ण-तुङ्ग-शिखरं शिखरि-प्रकाश-

मभ्युद्गतेन्द्वमल-रश्मि-कलाप-गौरं [ । ]

यद्भाति पश्चिम-पुरस्य निविष्ट-कान्त-

चूड़ामणि-प्रतिसमन्नयनाभिरामं [ ॥ ३० ] रामा सनाथ-भवनोदर- भास्करांशु-

वह्नि-प्रतापं-सुभगे जल-लीन-मीने [ । ]

चन्द्रांशु-हर्म्यतल-

१८.               चन्दन – तालवृन्त

हारोपभोग-रहिते हिम-दग्ध-पद्ये [ ॥ ३१ ]

रोद्ध्र प्रियंगुतरु-कुन्दलता-विकोश-

पुष्पासव-प्रमुदितालि-कलाभिरामे [ । ]

काले तुषार-कण-कर्क्कश-शीत वात

वेग-प्रनृत्त-लवली-नगणैकशाखे [ ॥ ३२ ]

स्मर-वशग-तरुणजन-वल्लभाङ्गना-विपुल-कान्त-पीनोरु- [ । ]

१९. स्तन-जघन-घनालिङ्गन-निर्भर्त्सित तुहिन-हिम-पाते [ ॥ ३३ ]

मालवानां गण-स्थित्या या [ ते ] शत-चतुष्टये।

त्रिनवत्यधिके(ऽ)ब्दानामृतौ सेव्य-धनस्तनै [ ॥ ३४ ]

सहस्यमास शुक्लस्य प्रशस्ते(ऽ)ह्नि त्रयोदशे [ । ]

मङ्गलाचार-विधिना प्रासादो(ऽ) यं निवेशितः [ ॥ ३५ ]

बहुना समतीतेन

२०.           कालेनान्यैश्च पार्थिवैः [ । ]

व्यशीर्य्यतैकदैशो(ऽ)स्य भवनस्य ततो(ऽ) धुना [ ॥ ३६ ]

स्वयशो-वृद्धये सर्व्वमत्युंदारमुदारया।

संस्कारितमिदं भूयः श्रेण्या भानुमतो गृहं [ ॥ ३७ ]

अत्युन्नतमवदातं नभः स्पृशन्निव मनोहरैश्शिखरैः [ । ]

शशि-भान्वोरभ्युदयेष्वमल-मयूखायतन-

२१.                     भूतं [ ॥ ३८ ]

वत्सर-शतेषु पंचमु विशंत्यधिकेषु नवसु धाब्देषु।

यातेष्वभिरम्य-तपस्यमास-शुक्ल द्वितीयायां [ ॥ ३६ ]

स्पष्टैरशोकतरु-केतक-सिंदुवार-

लोलातिमुक्तकलता-मदयतिकानां।

पुष्पोद्गमैरभिनवैरधिगम्य नून-

मैक्यं विजृंभित-शरे हर-पूत-देहे [ ॥ ४० ]

२२. मधुपान-मुदित-मधुकर-कुलोपगीत-नगणैक-पृथु-शाखे [ । ]

काले नव-कुसुमोद्गम-दंतुर-कांत-प्रचुर-रोद्धे [ ॥ ४१ ]

शशिनेव नभो विमलं कौ [ स्तु ] भ मणिनेव शार्ङ्गिणो वक्षः [ । ]

भवन-वरेण तथेदं पुरमखिलमलंकृतमुदारं [ ॥ ४२ ]

अमलिन-शशि-

२३.                 लेखा-दंतुरं पिङ्गलानां

परिवहति समूहं यावदीशो जटानां।

वि [ कच ]– कमल-मालामंस-सक्तां च शार्ङ्गी

भवनमिदमुदारं शाश्वतन्तावदस्तु [ ॥ ४३ ]

श्रेण्यादेशेन भक्त्या च कारितं भवनं रवेः [ । ]

पूर्व्वा चेयं प्रयत्नेन रचिता वत्सभट्टिना [ ॥ ४४ ]

२४. स्वस्ति कर्तृ-लेखक-वाचक-श्रोतृभ्यः॥ सिद्धिरस्तु॥

  • फ्लीट ने इसको ― ‘रचने दर’ —पाठ प्रस्तुत किया था। आर० जी० भण्डारकर ने उसे ‘भवने दर’ पाठ प्रस्तुत किया है। कीलहार्न और ब्यूह्लर ने ‘भवनोदर’ पाठ माना है। कुछ विद्वानों ने ‘गमना दर’ पाठ की सम्भावना भी प्रस्तुत किया है।
  • भण्डारकर ने इसकाका पाठ ‘षित्या’ प्रस्तुत किया है।
  • भण्डारकर महोदय का पाठ ‘विकट’ है।

हिन्दी अनुवाद

सिद्धि हो!

अस्तित्व के अभिलाषी देव-समूह, यौगिक सिद्धि के अभिलाषी सिद्ध-गण, निरन्तर ध्यानमग्न संयमी और मोक्षार्थी भोगि-गण, वरदान और शाप देने में समर्थ कठोर तपस्या करनेवाले मुनि-गण द्वारा जो भक्तिपूर्वक पूजित है, वे — संसार के क्षय और निर्माण के कारण सूर्य [ भगवान् ] आप सबकी रक्षा करें। १

जिसके वास्तविक स्वरूप को, तत्वज्ञान को जाननेवाले और साधना में तत्पर ब्रह्मर्षि लोग भी समझने में असमर्थ हैं, जो अपनी फैली हुई किरणों से समस्त त्रैलोक्य का पोषण करते हैं, जो उदित होते ही गन्धर्व, देव, किन्नर, सिद्ध और मनुष्यों के द्वारा प्रशंसित होते हैं, जो अपने भक्तों की अभिलाषा को पूर्ण करते हैं, उन सवित्रि ( सूर्य भगवान् ) को नमस्कार। २

जो उदयाचल गिरीन्द्र के विस्तृत और उन्नत शिखरों पर अपने रश्मि-समूह को फैलाकर प्रतिदिन देदीप्यमान होते हैं; जो मदोन्मत्त स्त्रियों के कपोलों के समान ताम्रवर्ण हैं और सुन्दर किरणों से अलंकृत हैं, वह सूर्य [ भगवान् ] आपकी रक्षा करें। ३

पुष्प-भार के झुके वृक्षों, देव-मन्दिरों, सभा-भवनों और विहारों से सुन्दर तथा वनस्पति-युक्त पर्वतों से युक्त लाट नामक देश के जो विश्वविख्यात शिल्पी थे, वे देश के राजा के गुणों से आकृष्ट होकर, पहले मनसा फिर अपने बच्चों और बन्धुओं सहित, यात्रा आदि में होनेवाले कष्टों की परवाह न करके दशपुर आये। ४-५

[ यह दशपुर ] उन्मत्त गजराजों के गण्डस्थल से चूते हुए मद-जल से सिञ्चित चट्टानवाले सहस्रों पर्वतों से भूषित है तथा पुष्प-भार से झुके हुए वृक्ष-समूह के कर्णाभरणयुक्त पृथ्वी का तिलक है। ६

[ वहाँ ] तटवर्ती वृक्ष से गिरे पुष्पों के कारण रंग-बिरंग दिखायी पड़नेवाले जल से युक्त खिले हुए कमलों से अलंकृत तथा कारण्डों ( एक जल-पक्षी ) से भरे सरोवर हैं। ७

ये सरोवर चंचल लहरों से कम्पित कमल के झड़े हुए पराग से पीत-वर्ण हुए हंसों तथा अपने पराग के पूर्णभार से झुके कमलों से सुशोभित हैं। ८

[ यह नगर ] उपवन-प्रसून पुंज से अवगत तरुवर, मदमत्त मधुपों के गुञ्जन तथा निरन्तर संचरणशील पुर-नारियों से अलंकृत हैं। ९

[ यहाँ ] लहराते हुए पताकाओं से युक्त, कोमलाङ्गी ललनाओं से भरे अति स्वेत, अत्यन्त उन्नत, भवन हैं, जो विद्युल्लता की दीप्ति से रंग-बिरंगे बने हुए श्वेत मेघों की तरह जान पड़ते हैं। १०

[ ये भवन ] कैलाश पर्वत के गगनचुम्बी शिखरों के समान बड़े ऊँचे-ऊँचे छज्जों, चबूतरों तथा सुन्दर चित्रों से सुशोभित हैं और उनके क्रीड़ोद्यान लहलहाते कदली-द्रुमों से शोभायमान हैं। ११

[ ये भवन ] पूर्ण चन्द्र की किरणों की तरह स्वच्छ और तलों ( मंजिलों ) की परम्परा से अलंकृत ऐसे जान पड़ते हैं मानो वे पृथ्वी फाड़कर ऊपर उठे विमानों की पंक्ति हों। १२

[ यह नगर ] चंचल लहरोंवाली दो नदियों से घिरा हुआ ऐसा दिखायी पड़ता है मानो उरोज-वाहिनी प्रीति और रति नाम्नी पत्नियों से एकान्त में आलिंगित होता हुआ कामदेव का शरीर हो। १३

सत्य, क्षमा, संयम ( इन्द्रिय-निग्रह ), शान्ति, व्रत, शुद्धि ( पवित्रता ), धैर्य, स्वाध्याय, सरलता, विनयशीलता, स्थिरता और तीव्र बुद्धि आदि गुणों से युक्त, विद्या और तप के धनी अभिमान-रहित ब्राह्मणों से परिपूर्ण [ यह नगर ] चमकते नक्षत्रों से भरपूर आकाश के समान है। १४

आगे [ कहना यह है कि लाट देश से आये ये शिल्पी ] अनवरत पारस्परिक सम्पर्क के कारण दिनानुदिन बढ़ती हुई मित्रता से युक्त और राजाओं द्वारा पुत्र के सदृश सम्मानित होकर प्रसन्नचित्त एवं सुखपूर्वक [ इस नगर में ] रहने लगे। १५

[ इन शिल्पियों में से ] कुछ लोग कानों को सुख पहुँचानेवाली संगीत ( गन्धर्व ) विद्या में पूर्णरूप से पारंगत हैं; कुछ असंख्य मनोरम चरित्रचर्चा करने और अद्भुत कथा कहनेवाले हैं; कुछ विनीत अतएव शान्त स्वभाव के हैं; कुछ धार्मिक प्रसंगों में प्रवीण हैं; और कुछ सुखद, कोमल और हितकारी वचन बोलनेवाले हैं। १६

इनमें से कुछ [ शिल्पी ] रेशम बुनने की कला के लिए विख्यात हैं; कुछ अपनी ज्योतिष विद्या के लिए प्रसिद्ध हैं, कुछ समर-प्रगल्भ हैं; और कुछ शत्रुओं का संहार करनेवाले लोग हैं। १७

इनमें से कुछ लोग बुद्धिमान्, सुन्दर शरीरवाले, विख्यात और उच्च कुलवाले, कुल के अनुकूल आचरणरूपी अलंकारवाले, सत्यपरायण, प्रेमियों के उपकार में कुशल और विश्वासपूर्वक दृढ़ता से मित्रता को निभानेवाले हैं। १८

इस प्रकार शिल्पियों की यह श्रेणी सांसारिक विषयों को जीतनेवाले, धर्मात्मा, कोमल स्वभाव वाले, अत्यधिक शक्तिशाली, लोक-व्यवहार में देवता के समान, अपने कुल में तिलकस्वरूप, वासना से रहित, और उदार प्रकृति के लोगों से सुशोभित है। १९

सौन्दर्य से सम्पन्न तरुणी सोने के हार, ताम्बूल और पुष्पाभरणों से प्रसाधित होने पर भी तब तक परम शोभा को प्राप्त नहीं कर पाती थी जब तक वह रेशम के बने युगल वसन धारण नहीं कर लेती। २०

[ अतः ] रेशम बुननेवाले इन शिल्पियों ने छूने में मुलायम, भिन्न-भिन्न रंगों के संतुलित विभाजन द्वारा अद्भुत और नेत्रों को आनन्दित करनेवाले रेशमी वस्त्रों से सम्पूर्ण पृथ्वी को अलंकृत कर दिया। २१

विद्याधरियों के वायु-चालित सुन्दर, पल्लव कर्णपूर के समान इस संसार को क्षणभंगुर समझकर और अपने अपार धन-संग्रह को ध्यान में रखकर इन शिल्पियों ( बुनकरों ) ने अपने मन में एक हितकारी दृढ निश्चय किया। २२

चारों समुद्र की चंचल मेखला और सुमेरु और कैलास पर्वतों के उभरे हुए, उरोजोंवाली, वनान्त में गिरे हुए विकसित सुमन-समूहरूपी हासवाली पृथ्वी पर जब कुमारगुप्त शासन कर रहे थे। २३

[ उस समय ] विश्ववर्मा नाम राजा गोप्ता ( देश का प्रशासक ) हुआ। वह बुद्धि में शुक्र और बृहस्पति के समान, पृथ्वी के राजाओं में शिरोभूषण और समर भूमि में पार्थ के समान था। २४

[ वह विश्ववर्मा ] दीनों पर दया करनेवाला, दरिद्र अतएव दुःखी लोगों को सान्त्वना प्रदान करनेवाला, असाधारण दयालु, अनाश्रितों को आश्रय देनेवाला, मित्रों के लिए कल्पवृक्ष के समान, भयभीत लोगों को अभय-दान देनेवाला, और प्रजाजनों में भ्रातृ-भाव रखने वाला था। २५

उसका लड़का राजा बन्धुवर्मा हुआ। वह दृढ एवं नीतिमान्, बन्धु-वर्ग का प्रियपात्र, प्रजाजनों के लिए भाई के समान, सम्बद्ध लोगों के दुःखों को दूर करनेवाला और शत्रुओं एवं अहंकारियों के समुदाय को संहार करने में दक्ष है। २६

[ बन्धुवर्मा ] कान्तिवाला, तरुण, युद्ध-निपुण और विनीत है। सर्व-सम्पन्न शासक होता हुआ भी [ वह ] अहंकार आदि दुर्गुणों से रहित है। अलंकारविहीन होने पर भी वह कामदेव-सा जान पड़ता है। २७

उसके स्मृतिजन्य भय से वैधव्य की विषम वेदना से व्यथित विशालाक्षी शत्रु-पत्नियों के पीत स्तनों में क्लेशकारक कम्पन होने लगता है। २८

इस उदार और उन्नत स्कन्ध राजश्रेष्ठ बन्धुवर्मन के समृद्ध दशपुर के परिपालन काल में शिल्प-लब्ध, धन-सम्पन्न श्रेणी के रूप में संघटित, रेशमी वस्त्र बुननेवाले ( पट्टवाय ) शिल्पियों ने सूर्य का अनुपम भवन ( मन्दिर ) बनवाया। २९

पर्वत सदृश आयत और उन्नत शिखरों से युक्त, उदीयमान चन्द्र के विमल अंशु-जाल के सदृश उज्ज्वल [ यह मन्दिर ] पश्चिम देश की राजधानी दशपुर में, नेत्रों को मुग्ध कर देनेवाले जटित रुचिर चूड़ामणि की तरह शोभायमान था। ३०

जब केलि-भवनों में पति-पत्नी का मिलन होता है; सूर्य की मन्द किरणें और अग्नि का तेज प्रिय लगता है; मछलियाँ जल के भीतर ही छिपी रहती हैं; महलों के चन्द-किरण सदृश शीतल तल-खण्ड, चन्दन, पंखे और हार आदि का सेवन नहीं किया जाता है; हिमपात से कमल गल जाते हैं; [ जब ] लोध्र और प्रियंगु वृक्षों और कुन्द की लताओं के विकसित पुष्पों के मधुपान से प्रफुल्लित मधुकर-निकर-गुञ्जन से आकर्षक,

हिमकणमिश्रित अतएव तीव्र एवं शीतल वायु के वेग से आन्दोलित ‘लवली’ और ‘नगण’ नामक पुष्प की शाखा की शोभा अपूर्व हो जाती है; जब कामाभिभूत युवक-वृन्द अपनी प्रेयसियों के पृथुल, मनोहर और पीन जंघों, कुचों और पेडुओं के गाढ़ आलिंगन से अति शीतल हिमवर्षण को भी तिरस्कृत कर देता है, ऐसे घन-स्तन-सेव्य ऋतु [ हेमन्त ] में मालव-सम्वत् की गणना के अनुसार चार सौ तिरानबे वर्ष बीत जाने पर सहस ( पौष ) मास के शुक्ल पक्ष की पवित्र त्रयोदशी तिथि को माङ्गलिक विधिपूर्वक इस प्रासाद ( मन्दिर ) का निवेशन ( गृह प्रवेश अथवा मूर्ति की प्रतिष्ठा ) हुआ था। ३१ — ३५

कालान्तर में ( बहुना समतीतेन कालेन ) इस भवन ( मन्दिर ) का एक भाग ध्वस्त हो गया। तब अपनी कीर्ति बढ़ाने के लिए, उस उदार श्रेणी ( शिल्पी समूह ) ने इस सम्पूर्ण विशाल सूर्य-मन्दिर का संस्कार कराया। ३६ — ३७

[ इस प्रकार संस्कार किये जाने के बाद ] बहुत ऊँचा, स्वच्छ और अपने सुन्दर शिखरों से आसमान को छूता हुआ यह मन्दिर चन्द्रमा और सूर्य के उदयकालीन निर्मल किरणों का विश्राम स्थल [ सरीखा जान पड़ता है ]। ३८

पाँच सौ उनतीस ( ५२६ ) वर्ष बीत जाने के बाद मनभावन तपस्य ( फाल्गुन ) मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया को, [ जिन दिनों शिव के विषम लोचनानल से भस्मीभूत काम-देव अशोक, केवड़ा, सिन्दुवार और लहराती हुई अतिमुक्तक, लता और मदयन्तिका के सद्यः प्रस्फुटित पुञ्जीभूत प्रसूनों से अपने शरों को समृद्ध कर रहे थे; मधुपान से मस्त मधुपों की गूँज से ‘नगणक’ की एकाकी पृथु शाखा [ देखने योग्य हो रही थी ] और रतन सुमनों के विकास से रोघ्र-द्रुमों में उत्कर्ष और श्री की वृद्धि हो रही थी [ अर्थात् वसन्त ऋतु में ] इस मन्दिर का संस्कार हुआ। ३९ — ४१

जिस प्रकार निर्मल आकाश चन्द्रमा से और भगवान् विष्णु का वक्षःस्थल कौस्तुभमणि से सुशोभित होता है उसी प्रकार समस्त समृद्ध दशपुर नगर इस दिव्य मन्दिर से अलंकृत हो रहा है। ४२

जब तक भगवान् शंकर धवल चन्द्रकला से नतोन्नत, पीतवर्ण के जटाजूट को धारण करते रहें, जब तक भगवान् विष्णु अपने कन्धों पर प्रस्फुटित पद्ममाला को धारण किये रहे तब तक इस भव्य भवन का भी अस्तित्व बना रहे। ४३

श्रेणी ( शिल्पी समाज ) के आदेश एवं श्रद्धा से वत्स भट्टि ने यत्न पूर्वक भगवान् सूर्य का यह मन्दिर बनवाया। उनके प्रति भक्तिभाव के कारण उसने इस पूर्वा ( प्रशस्ति ) की रचना की। ४४

[ प्रशस्ति और मन्दिर के ] रचयिता ( निर्माता ), लेखक, वाचक एवं श्रोताओं का कल्याण हो।

सिद्धि हो।

  • फ्लीट ने नर का तात्पर्य मनुष्य से न लेकर गन्धर्व और किन्नर प्रभृत कल्पनाजनित जीव (mythical being) लिया है। मोनियर विलियम्स के कोष में नर का यह अर्थ दिया हुआ है।
  • वलभी का तात्पर्य भण्डारकर ने छत (Terrace) के रूप में ग्रहण किया है।
  • सम्भवतः यहाँ तात्पर्य शिवना और सुमली नाम्नी नदियों से है। मन्दसोर (दशपुर) शिवना नदी के उत्तरी तट पर बसा हुआ है। मुमली नगर के उत्तर-पूर्व लगभग ५ किलोमीटर की दूरी पर शिवना में गिरनेवाली नदी है।
  • पंक्ति संख्या ३ में दशपुर से आनेवाले लोगों के लिए फ्लीट ने कल्पना की है कि ये रेशम कला में दक्ष अर्थात् बुनकर थे । ऐसी कल्पना उन्होंने पंक्ति १६ में तन्तुवायों के उल्लेख के कारण की है। किन्तु इस स्थल पर सामान्य रूप से शिल्पियों का उल्लेख है।
  • फ्लीट ने इस स्थल गन्ध को धानुर्वेद पढ़कर उसका अनुवाद कानों को मृदु लगनेवाली धनुर्विद्या में पारंगत किया है। किन्तु कानों को प्रिय संगीत होता है, धनुष का टंकार नहीं, अतः हमारी दृष्टि यहाँ तात्पर्य संगीतज्ञ से ही है।पंक्ति १६-१८ का फ्लीट ने जिस रूप में अनुवाद प्रस्तुत किया है, उससे ऐसा आभास होता है कि लाट देश से आनेवाले लोगों ने दशपुर आकर अपने व्यवसाय बदल लिये थे परन्तु यहाँ शिल्पियों का सामान्य रूप से परिचय है। व्यवसाय बदलने जैसी कोई बात नहीं है।

टिप्पणी

इस लेख में दशपुर ( मन्दसोर ) में रेशम के बुनकरों की श्रेणी द्वारा सूर्य-मन्दिर के निर्माण और पुनरुद्धार का वर्णन काव्यात्मक रूप में किया गया है। इस काव्य की रचना वत्सभट्टि नामक कवि ने की थी: इस कारण अनेक विद्वानों ने इसका परिचय वत्सभट्टि काव्य अथवा प्रशस्ति के रूप में प्रस्तुत किया है। कवि ने अपने इस काव्य को पूर्वा नाम दिया है।

फ्लीट ने पूर्वा का अर्थ प्रशस्ति किया है और इसे प्रशस्ति के प्रस्तरांकित लेखों के लिए प्रयुक्त होनेवाला परम्परागतात्मक पारिभाषिक शब्द बताया है। परन्तु पूर्वा को किसी भी प्रकार प्रशस्ति का पर्याय नहीं कहा जा सकता है। पूर्वा का सीधा-सादा अर्थ पूर्व-कथित अर्थात् इतिहास है। इस प्रकार काव्य के रूप में प्रस्तुत यह सूर्य-मन्दिर के निर्माण का इतिहास-वर्णन है।

वैदर्भी रीति का आश्रय लेकर कवि ने इस काव्य को प्रस्तुत किया है। किन्तु स्थान-स्थान पर इसमें गौड़ी-बन्ध भी सन्निविष्ट है; इसमें लम्बे समासों का प्रयोग हुआ है। ३३वाँ श्लोक तो समूचा समासयुक्त वाक्य है।

४४ श्लोकों के इस काव्य में कम-से-कम १२ छन्दों का प्रयोग कर कवि ने अपना काव्य-कौशल प्रदर्शित किया है। छन्दों की यह विविधता काव्य को जहाँ रोचकता प्रदान करती है, वहीं उसमें काव्य की दुर्बलता भी दिखायी पड़ती है। बार-बार के छन्द-परिवर्तन से लयगति निर्बल हो गयी है और छन्द-सौन्दर्य पूरी तरह निखार न ले सका है।

छन्द की तरह अलंकारों के प्रयोग में भी विविधता है। कवि ने शब्द और अर्थ दोनों प्रकार के अलंकारों का प्रयोग किया है।

कवि समकालिक कवियों की रचनाओं से अत्यधिक प्रभावित जान पड़ते हैं। दशपुर का जिस रूप में वत्सभट्टि ने वर्णन किया है उस पर स्पष्टतः कालिदास के अलका-वर्णन की छाया है।

चलत्पताकान्यबला-सनाथान्यत्पर्थशुक्लान्यधिकोत्रतानि।

तडिल्लता-चित्र-सिताभ्र-कूटतुल्योपमानानि गृहाणि यत्र॥ १०

कैलाश-तुंगशिखर-प्रतिमानि चान्यान्याभान्ति दीर्ग्घवलभीनि सवेदिकानि।

गान्धर्व्व-शब्द-मुखरानि निविष्ट-चित्त-कर्माणि लोक-कदली-वन शोभितानि॥ ११

इसमें उत्तर-मेघ के निम्नलिखित श्लोक से अद्भुत साम्य है —

विद्युदन्तं ललितः वनिता सेन्द्रचापं सचित्राः

संगीताय प्रहतमुरजाः स्निग्ध गम्भीर धोषम्।

अन्तस्तोयं मणिमय भवः तुंगमभ्रंलिहाग्राः।

प्रसादाः त्वां तुलयितुमल यत्र तैस्तैर्विशेषैः॥

इसी प्रकार ऋतु वर्णन सम्बन्धी श्लोक :-

रामा सनाथ भवनो-दर भास्करांशु वह्नि प्रताप सुभगे जललीन मीने।

चंद्रांशु हर्म्मतल चन्दन तालवृन्त हारोपभोग रहिते हिमदग्ध पद्मे॥ ३१

कालिदास के ऋतुसंहार के निम्नलिखित पंक्तियों के अति निकट है—

न चन्दनं चन्द्र मरीचि शीतलं, न हर्म्यपृष्ठं शरदिन्दु निर्मलम्।

न वायवः सांद्र तुषार शीतलाः जनस्य चित्तं रगभन्ति सांप्रतम्॥ ५ / ३

पुनश्च

स्पष्टैरशोकतरु-केतक-सिन्दुवार-लोलातिमुक्तकता-मदयन्तिकानां।

पुष्पोद्गर्मरभिनवैरधिगम्य नून-मैक्यं विजृम्भित-शरे हर-पूत-देहे॥ ४०

इस श्लोक में पाँच पुष्पों — अशोक, केवड़ा, सिन्दुवार, अतिमुक्तक और मदयन्तिका की तुलना कामदेव के पंच-वाणों से करने की प्रेरणा कवि को ऋतुसंहार की इन पंक्तियों से मिली जान पड़ती है —

सद्यः प्रवालोद्गमचारुपत्रे नीते समप्तिं नवचूतवाणे।

निवेशयामास मधुद्विरेफाः नामाक्षराणीप मनोभवस्य।

इसी तरह नदी वर्णन के प्रसंग —

रहसि कुचशालिनीभ्यां प्रीतिरतिभ्यां स्मराङ्गमिव

में सुबन्धु के वासवदत्ता के

रेवया प्रियतययेव प्रसारित-वीचिहस्तयोपगूढ

  • १. शार्दूलविक्रीडित (श्लोक १-२), वसन्ततिलका (श्लोक २, ५, ६, ११, १४, १८, २०, २२, २५, २७, ३०-३२, ४०), आर्या (श्लोक ४, १३, २१, ३३, ३८, ३६, ४१), उपेन्द्रवज्र (श्लोक ७-६, २४). उपगीति (श्लोक १०, १२), व्रतविलम्बित (श्लोक १५), हरिणी (श्लोक १६), इन्द्रवज्र (श्लोक १७,२६) मालिनी (श्लोक १६, ४३, वंशस्य (श्लोक २३), उपजाति (श्लोक २८), मन्दाक्रान्ता (२६), अनुष्टुभ (श्लोक ३४-३७, ४४) ।

और बृहत्संहिता के

रहसि मानसक्तया रेवया कान्तयोपगूढम्

से ही कामदेव के पत्नी की उत्प्रेक्षा करने की प्रेरणा प्राप्त हुई दिखायी देती है।

काव्य के रूप में संस्कृत साहित्य में इस रचना का महत्व जो भी हो, गुप्तकालीन इतिहास की दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण है। इस पूर्वा में कहा गया है कि मालव संवत् ४९३ पौष शुक्ल त्रयोदशी को, जिन दिनों पृथ्वी पर कुमारगुप्त का शासन था, इस सूर्य-मन्दिर का निर्माण हुआ था। तदनन्तर कुछ दिनों ( ३६ वर्ष ) बाद इस मन्दिर का कुछ भाग गिर गया तब उसका पुनर्निर्माण [ मालव ] सम्वत् ५२९ की फाल्गुन शुक्ल द्वितीया को किया गया।

पुनर्निर्माण की तिथि के साथ उसके न तो मालव संवत् होने का उल्लेख है और न तत्कालीन नरेश की चर्चा। साथ ही इतने विशाल मन्दिर का ३६ वर्ष के भीतर गिर जाना के० राम पिसरौटी को अविश्वसनीय जान पड़ा इसलिये उनकी उन्होंने अपना यह मत प्रकट किया है कि यह मन्दिर निर्माण के ५२९ वर्ष बाद अर्थात् ४९३ + ५२९ = १०२२ मालव सम्वत् ( ९६६ ई० ) ध्वस्त हुआ और पुनर्निर्मित किया गया। अपनी इस धारणा के पक्ष में उन्होंने जो तर्क प्रस्तुत किये हैं, उनके विवेचन में जाने की आवश्यकता नहीं है। सीधी सी बात तो यह है कि किसी भी प्रबुद्ध जन के गले यह बात नहीं उतरेगी कि अभिलेख की लिपि दसवीं शती ई० की है।

दूसरी बात यह कि मन्दिर का पुनर्निर्माण निर्माण करानेवाली श्रेणी ने ही कराया था। यह श्लोक २६, ३७ और ४४ से स्पष्ट है। यह कल्पनातीत है कि कोई श्रेणी मालव सम्वत् ४९३ से १०२३ तक ( ५२९ वर्ष तक ) बनी रही। इस प्रकार पिसरौटी की कल्पना स्वतः निरर्थक और हास्यास्पद है। स्वीकार यही करना होगा कि मन्दिर के पुनर्निर्माण की आवश्यकता केवल ३६ वर्ष बाद ही मालव सम्वत् ५२९ में ही हुई थी और तभी उसका पुनर्निर्माण हुआ था।

इस सम्बन्ध में अभिलेख में जो कुछ कहा गया है, उसका फ्लीट ने इस प्रकार अनुवाद प्रस्तुत किया है — अन्य राजाओं के काल में बहुत दिन बीत जाने पर मन्दिर का कुछ भाग गिर गया। निर्माण और पुनर्निर्माण के बीच के ३६ वर्ष के छोटे से अन्तराल को बहुत दिन कहने जैसी अत्युक्ति कदापि कोई कवि नहीं करेगा; और न इस अवधि के बीच अनेक राजाओं के होने की कल्पना की जा सकती है। स्पष्टतः फ्लीट का यह अनुवाद किसी भी रूप में बुद्धिगम्य नहीं कहा जा सकता। अतः दशरथ शर्मा ने इस अनुवाद के दोषों की ओर इंगित करते हुए उन्होंने अनुवाद किया है — बहुत दिन बीत जाने पर दूसरे राजाओं द्वारा इस भवन का एक भाग नष्ट कर दिया गया और इस प्रसंग में उन्होंने मध्य-भारत पर हूणों के आक्रमण की कल्पना की है। परन्तु हूणों द्वारा मन्दिर के ध्वस्त करने की कल्पना नहीं की जा सकती। वे भारत के भीतरी भाग में बुधगुप्त के काल अर्थात् गुप्त संवत् १७५ ( ४९३ ई० ) के बाद ही प्रविष्ट हुए थे अतः यहाँ अभिप्राय उनसे कदापि नहीं हो सकता। यदि ध्यानपूर्वक देखा जाय तो अभिलेख में कहीं भी कुछ ऐसा नहीं है जिससे किसी शासक द्वारा, वे हूण हो, किदार कुषाण हों अथवा कोई अन्य मन्दिर के ध्वस्त किये जाने की कल्पना उभरती हो। यहाँ व्यशीर्यते शब्द ध्यातव्य है। आप्टे के कोश के अनुसार विश्रि का अर्थ टुकड़े-टुकड़े होना या बिखर जाना होता है। तदनुसार व्यशीर्यते इसका तात्पर्य ध्वस्त की अपेक्षा टुकड़े ही होगा। इस दृष्टि से यह सहज अनुमान किया जा सकता है कि बिजली गिरने या किसी ऐसी ही दैवी आपदा से ही मन्दिर का एक भाग छिन्न-भिन्न हो गया होगा, तभी उसी श्रेणी के लोगों ने, जिन्होंने उसका निर्माण कराया था, पुनर्निर्माण कराया होगा। अस्तु, सूर्य-मन्दिर का निर्माण मालव सम्वत् ४९३ के पौष शुक्ल त्रयोदशी को ( जिन दिनों कुमारगुप्त शासक थे ) और पुनर्निर्माण [ मालव ] सम्वत् ५२९ के फाल्गुन शुक्ल द्वितीया को किया गया। इसमें कुमारगुप्त के पृथ्वी पर शासन करने का उल्लेख २३वें श्लोक में और उक्त दोनों तिथियों का उल्लेख क्रमशः ३४वें और ३९वें श्लोक में हुआ है। इस आधार पर समझा जाता है कि ये दोनों ही घटनाएँ कुमारगुप्त के शासन-काल में घटीं। इस लेख में उल्लिखित कुमारगुप्त गुप्त-वंशीय सम्राट् थे, ऐसा सभी विद्वानों का अनुमान रहा है। फ्लीट के समय तक गुप्त वंश में केवल एक ही कुमारगुप्त (कुमारगुप्त प्रथम) ज्ञात थे अतः यह अनुमान कर उन्होंने लेख में अंकित मालव संवत् को आधार मानकर गुप्त सम्वत् का आरम्भ निश्चित करने का प्रयास किया था। उस समय इस दृष्टि से इस लेख का विशेष महत्त्व था।

वर्तमान हमें अभिलेखों और सिक्कों से गुप्तवंश में कुमारगुप्त नाम के तीन शासक होने की बात ज्ञात है। अतः अभिलेख में जो भी सूचनाएँ उपलब्ध हैं, मात्र उनके आधार पर अभिलेख में उल्लिखित कुमारगुप्त इनमें से कौन है निश्चय नहीं किया जा सका है। परन्तु यह एक प्रकार से निश्चित हो गया है कि गुप्त-सम्वत् का आरम्भ ३१९ ई० में हुआ था। अतः इस लेख में अंकित मालव सम्वत् ४९३ और ५२९ का आकलन गुप्त-सम्वत् में क्रमशः ११६ और १५२ के रूप में किया जा सकता है।

उपलब्ध जानकारी के अनुसार कुमारगुप्त (प्रथम) का शासन-काल गुप्त सम्वत् ९३ ( बिलसड़ अभिलेख ) और १२९ ( मानकुँवर बुद्धमूर्ति लेख ) के बीच ही सीमित है। अतः कहना होगा कि सूर्य-मन्दिर के निर्माण के समय मालव-सम्वत् ४९३ में कुमारगुप्त (प्रथम) का शासन था। मन्दिर का पुनर्निर्माण उनके शासन काल में नहीं हुआ। पुनर्निर्माण-कालीन शासक के नाम का उल्लेख कवि ने नहीं किया है, अतः कुछ विद्वानों का अनुमान है कि इस समय भी कुमारगुप्त नामक शासक का ही शासन था, इसलिए कवि ने शासक का दुबारा नामोल्लेख की आवश्यकता नहीं समझी। उनके इस अनुमान को इस बात से बल मिलता है कि कुमारगुप्त नाम के एक दूसरे शासक का ज्ञान सारनाथ से प्राप्त एक बुद्ध मूर्ति के गुप्त संवत् १५४ के आसन-लेख से होता है। उसमें कहा गया है भूमिम् रक्षति कुमारगुप्त

सहज भाव से यह कहा जा सकता है कि इसी दूसरे कुमारगुप्त के शासन काल में सूर्य-मन्दिर का पुनर्निर्माण हुआ होगा। स्कन्दगुप्त के शासन की अन्तिम तिथि इन्दौर ताम्रलेख से गुप्त-सम्वत् १४६ ज्ञात होती है। अतः उसके बाद किसी समय भी कुमारगुप्त (द्वितीय) के शासनारूढ़ होने की सम्भावना का अनुमान किया जा सकता है। इस प्रकार इस अभिलेख से कुमारगुप्त (द्वितीय) के लिए एक नयी तिथि का परिचय मिलता है, ऐसा कहा जा सकता है।

स्कन्दगुप्त के जूनागढ़ अभिलेख से ज्ञात होता है कि देश के शासक को गोप्ता कहते थे। देश सम्भवतः गुप्त साम्राज्य के अन्तर्गत सबसे बड़ी इकाई को कहते थे। जूनागढ़ अभिलेख से यह भी ज्ञात होता है कि समुचित शासन, लोकहित और साम्राज्य की समृद्धि गोप्ता का मुख्य दायित्व था। आन्तरिक शान्ति रखने के अतिरिक्त उसे बाह्य आक्रमणों के प्रति भी सजग रहना पड़ता था।

कुमारगुप्त ( प्रथम ) के शासनकाल में दशपुर का गोप्ता विश्ववर्मा का पुत्र बन्धुवर्मा था, ऐसा इस अभिलेख में कहा गया है। मन्दसौर के क्षेत्र से चार अभिलेख प्राप्त हुए हैं जिनसे इस प्रदेश में वर्मन नामान्त स्थानीय वंश के शासकों का परिचय मिलता है। इस वंश के प्रथम दो शासक जयवर्मन और उसके पुत्र सिंहवर्मन चतुर्थ शती ई० के उत्तरार्ध में इस प्रदेश के स्वतन्त्र शासक थे। तदन्तर सिंहवर्मन के पुत्र नरवर्मन के ४०४ ई० और उनके पुत्र विश्ववर्मन के ४२३ ई० में शासक रहने का परिचय मिलता है। इन दोनों के अभिलेखों में ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे अनुमान किया जा सके कि वे किसी बड़े शासक के करद या सामन्त थे।

पहली बार प्रस्तुत अभिलेख में विश्ववर्मा के पुत्र बन्धुवर्मा का उल्लेख कुमारगुप्त प्रथम के गोप्ता के रूप में हुआ है। इससे अनुमान होता है कि ४२३ और ४३६ ई० के बीच किसी समय कुमारगुप्त ने इन शासकों को अपने अधीन किया था और उन्हें ही अपनी ओर से उनके ही प्रदेश का गोप्ता नियुक्त कर दिया था।

३५ वर्ष पश्चात् ४७१ ई० ( मालव संवत् ४२९ ) में जब सूर्य-मन्दिर का पुनर्निर्माण हुआ उस समय दशपुर का गोप्ता कौन था? इसका उल्लेख इस अभिलेख में नहीं है। किन्तु मन्दसौर से ही प्राप्त मालव सम्वत् ५२४ के एक अन्य लेख अभिलेख से होता है कि इस समय यहाँ का भूमिपति गोप्ता प्रभाकर था। उसे यह पद बन्धुवर्मन के बाद ही मिला होगा। बहुत सम्भव है वह बन्धुवर्मन का उत्तराधिकारी एवं पुत्र रहा हो।

फ्लीट के अनुवाद से ऐसा ध्वनित होता है कि लाट देश से दशपुर आनेवाले लोग केवल रेशमी वस्त्र बुननेवाले बुनकर ( तन्तुवाय ) थे। दशपुर में बस जाने के बाद उन्होंने विविध व्यवसाय अपना लिया ( पंक्ति ९ ) था। इस आधार पर दिनेशचन्द्र सरकार ने यह अभिमत प्रकट किया है कि पश्चिमी भारत में जातियों का स्वरूप रूढ़ि-बद्ध नहीं था। परन्तु पंक्ति में ऐसा कोई शब्द नहीं है जिससे प्रकट होता हो कि आनेवाले लोग केवल पट्टवाय थे। लाट से आनेवाले लोगों को मात्र शिल्पाः कहा गया है। अतः लाट से आनेवाले लोगों में अनेक वर्ग के शिल्पी थे। उनमें एक वर्ग अथवा श्रेणि पट्टवायों की थी, जिनका उल्लेख पंक्ति संख्या १६ में हुआ है और जिन्होंने मंदिर निर्माण कराया।

इसी तरह पंक्ति संख्या ९ में विविध व्यवसाय करनेवालों की जो चर्चा है, उसमें ऐसा कोई शब्द नहीं है, जिससे ध्वनित होता हो कि लाट विषय से आनेवाले शिल्पियों ने अपने व्यवसाय छोड़कर दूसरे व्यवसाय अपना लिये थे। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि कवि प्रवासी शिल्पियों के विविध व्यवसायों का परिचय दे रहा है या यह कह रहा है कि दशपुर में रहनेवाले विविध व्यवसाय करनेवाले लोग थे। अभिलेख में कहीं ऐसा कुछ नहीं है जिससे समाज के अस्थिर स्वरूप की किसी प्रकार की कोई कल्पना की जा सके।

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