मन्दसौर अभिलेख – ४६७ ई० ( मालव सम्वत् ५२४ )

भूमिका

मालव अभिलेख – ४६७ ई० एक शिलापट्ट पर अंकित है। इसे म० ब० गर्दे को १९२३ ई० के ग्रीष्म में मन्दसौर (मध्य प्रदेश) स्थित दुर्ग के पूर्वी दीवाल के भीतरी भाग में जड़ा हुआ मिला था। इसको म० ब० गर्दे ने ही प्रकाशित किया है। वर्तमान में यह ग्वालियर संग्रहालय में सुरक्षित रखा गया है।

संक्षिप्त परिचय

नाम :- मन्दसौर अभिलेख – ४६७ ई० [ Mandsaur inscription – 467 AD ]

स्थान :- मन्दसौर, मध्य प्रदेश

भाषा :- संस्कृत

लिपि :- ब्राह्मी

समय :- गुप्तकाल, मालव सम्वत् ५५४ ( ४६७ ई० )

विषय :- गोविन्दगुप्त की जानकारी मिलती है। साथ ही दत्तभट्ट द्वारा बौद्ध भिक्षुओं के लिये एक स्तूप, एक कुँआ, प्याऊ, उद्यान का निर्माण।

रचयिता :- कवि रविल

मूलपाठ

१. सिद्धम् [ । ] ये [ ने ] दमुद्भव-निरोध-परम्परायां भग्नं जगद्विविध-दुख-निरन्तरायाम् ( । ) तित्त्रासुना त्रिपदरो निरदेशि धर्म्मस्तस्मै नमोस्तु सुगताय गताय शान्तिम् ( ॥ ) [ १ ]

२. गुप्तान्वय व्योमनि चन्द्रकल्पः श्री चन्द्रगुप्त-प्रथिताभिधानः ( । ) आसीन्नृपो लोक-विलोचनानां नवोदितश्चन्द्र इवापहर्त्ता ( ॥ ) [ २ ] भुवः पतीनां भुवि भूपतित्वमाच्छिद्य

३. धी विक्क्रम-साधनेन ( । ) नाद्यापि मोक्षं समुपेति येन स्व-वंश्य-पाशैरवपाशिता भूः ( ॥ ) [ ३ ] गोविन्दवख्यात-गुण-प्रभावो गोविन्दगुप्तोर्ज्जितनामधेयम् ( । ) वसुन्धरेश-

४. स्तनयं प्रजज्ञे स दित्यदित्योस्तनयैस्सरूपम् ( ॥ ) [ ४ ] यस्मिन्नृपैरस्तमित-प्रतापैश्शिरोभिरालिङ्गित-पादपद्मे। विचारदोलां विबुधाधिपोपि शंकापरीतः

५. समुपारुरोह ( ॥ ) [ ५ ] सेनापतिस्तस्य बभूव नाम्ना वाय्वादिना रक्षित-पश्चिमेन ( । ) यस्यारिसेनास्समुपेत्य सेनां न कस्यचिल्लोचनमार्ग्गमीयुः ( ॥ ) [ ६ ]

६. शौचानुराग-व्यवसाय-मेधादाक्ष्य-क्षमादगुणराशिमेकः ( । ) यशश्च यश्चन्द्रमरीचि-गौरं दधार धाराधर-धीर-घोषः ( ॥ ) [ ७ ] उदीच्य भूभृत्कुल-चन्द्रिकायां स राजपुत्र्यां

७. जनयां बभूव। नाम्नात्मजं दत्तभटं गुणानां कीर्त्तेश्च योभून्निलयः पितेव ( ॥ )  [ ८ ] दाने धनेशं धियि वाचि चेशं रतो स्मरं संयति पाशपाणिम् ( । ) यमर्त्थि-

८. विद्वत्प्रमदारिवर्गास्सम्भावयांचुक्क्रुरनेकधैकम् ( ॥ ) [ ९ ] गुप्तान्वयारि-द्रुम-धूम-केतुः प्रभाकरो भूमिपतिर्य्यमेनम् ( । ) स्वेषाम्बलानां बलदेववीर्य्यं गुणा-

९. नुरागादधिपं चकार ( ॥ ) [ १० ] चिकीर्षुणा प्रत्युपकार-लेशं तैनेष पित्रोः शुभयोग सिद्ध्ये। स्तूप-प्रपारामवरैरुपेतः कूपोर्ण्णवागाधजलो व्यखानि ( ॥ )  [ ११ ] यश्मि-

१०. न्सुहृत्संगम-शीतलञ्च मनो मुनीनामिव निर्म्मलं च। वचो गुरुणामिव चाम्बु पत्थ्यं पेपीयमानः सुखमेति लोकः ( ॥ ) [ १२ ] शरन्निशानाथ-करामलायाः

११. विख्यायके मालववंशकीर्तेः। शरद्गणे पंचशते व्यतीते त्रि-घातिताष्टा-भ्यधिके क्कमेण ( ॥ )  [ १३ ] भृङ्गाङ्ग-भारालस-बाल-पद्मे काले प्रपन्ने रमणीय-साले।

१२. गतासु देशान्तरित प्रियासु प्रियासु काम-ज्वलनाहुतित्वम् ( ॥ ) [ १४ ] नात्युष्ण-शीतानिल-कम्पितेषु प्रवृत्त-मत्तान्यमृत-स्वनेषु। प्रियाधरोष्ठारुण-पल्लवेषु

१३. नवां वहत्सूपवनेषुकान्तिम् ( ॥ ) [ १५ ] यो धातुमात्रे हत-धातु-दोषः सर्व्व-क्रिया-सिद्धिमुवाच तस्य। कुन्देन्दु-शुभ्रोब्भ्र-विघृष्ट-यष्टिरयं कृतो धातुवरः स-कूपः॥ [ १६ ]

१४. अनेक-सरिदंगनांग-परिभोग-नित्योत्सवो महार्ण्णव इवाम्बुनो निचय एष मा भूत्क्षयी। सुरासुर-नरोरगेन्द्र-महितोप्ययं धातुधृक्परैतु सम-

१५. कालताममरभूधरार्केन्दुभिः ( ॥ ) [ १७ ] स्तूप-कूप-प्रपरामा ये चेते परिकीर्त्तिता ( । ) लोकोत्तर-विहारस्य सीम्नि तेभ्यन्तरीकृताः॥ [ १८ ] रविलस्य कृतिः।

हिन्दी अनुवाद

१. सिद्धम्। जन्म-मरण की निरन्तर चली आती परम्परा के कारण नाना प्रकार के दुःखों में डूबे हुए जगत् के उद्धार के लिये जिसने तीन पदोंवाले धर्म की स्थापना की और शान्ति प्राप्त की, उस सुगत (भगवान् बुद्ध) को नमस्कार।

२. आकाश में चन्द्रमा के समान गुप्त वंश में श्री चन्द्रगुप्त नाम का एक राजा हुए जो नवोदित चन्द्रमा की तरह लोगों की आँखों को आकृष्ट करते रहे।

३. उसने अपने विक्रम और बुद्धि से [ अनेक ] राजाओं के राजतत्व को छीन लिया था, उसने अपने वंश के पाश में पृथिवी को बाँध रखा था, जिससे वह ( पृथ्वी ) अब तक मुक्त नहीं हो सकी है।

४. वह वसुन्धरेश ( राजा ) ( चन्द्रगुप्त ) अपने गुणों के कारण गोविन्द ( विष्णु ) के समान प्रख्यात था उसने एक पुत्र को जन्म दिया जिसका नाम गोविन्दगुप्त था जो दिति और अदिति के पुत्रों के समान था।

५. जिस समय राजा लोग अपनी शक्तिसे च्युत होकर उसके ( गोविन्दगुप्त के ) पाद-पद्मों में शिर झुकाते थे, उस समय देवताओं के स्वामी ( इन्द्र ) भी भयभीत होकर शंकाओं के झूले पर झूलने लगते थे। (अर्थात् यह सोचकर परेशान हो जाते थे कि कहीं वह राजा उसे भी सिंहासन से च्युत न कर दे)।

६. इस राजा के एक सेनापति था, जिसका नाम वायुरक्षित था। उसकी सेना को निकट आते देखकर शत्रु सेना भाग खड़ी होती थी।

७. उस ( सेनापति ) की ( कड़कती हुई ) आवाज मेघ गर्जन के समान थी; उसमें अनेक गुण थे, यथा— शौच, अनुराग, व्यवसाय, मेघा, दक्षता, क्षमा आदि उसे चन्द्र-किरणों के समान ख्याति भी प्राप्त थी।

८. उदीच्य राजवंश की चन्द्रिका के समान उसके एक पुत्र हुआ जिसका नाम दत्तभट्ट था। वह भी गुण और कीर्ति में अपने पिता के समान था।

९. धन चाहनेवाले उसकी दानशीलता के कारण उसे धनेश ( कुबेर ) समझते थे; विद्वत्वर्ग में वह अपनी बुद्धि के कारण बृहस्पति माना जाता था; रति ( कला ) के लिये वह युवतियों में कामदेव समझा जाता था। शत्रु लोग उसे युद्ध में यम कहते थे।

१०. उस ( दत्तभट्ट ) को, जो बलदेव के समान बली था। उसके गुणों को देखकर, भूमिपति प्रभाकर ने, जो गुप्त वंश के शत्रुओं के लिये दावाग्नि समझा जाता था, अपनी सेना का अधिनायक नियुक्त किया।

११. इस ( दत्तभट्ट ) ने अपने पितरों के किंचित् मात्रा में प्रत्युपकारस्वरूप, एवं उनके शुभ योग ( स्वर्ग-सुख ) के निमित्त स्तूप, प्रपा, आराम सहित, जल से भरा हुआ एक कूप बनवाया।

१२. उसके शीतल जल को पीकर लोग वैसे ही आनन्द का अनुभव करते हैं जैसा आनन्द प्रिय मित्रों के मिलने से मिलता है। [ उसका जल ] गुरु के वचन के समान निर्मल और बड़ों के कथन के समान गुरुत्वपूर्ण है।

१३. शरद चन्द्र की निर्मल चाँदनी की तरह निर्मल मालव वंश की कीर्ति को जब ५२४ वर्ष बीत गये, [ तब ]

१४. ऐसी ऋतु में, जब भौंरों के भार से नव-पद्म दबे होते हैं; शाल के वृक्ष रमणीय लगते हैं; जब देशान्तर गये प्रियतम के विरह के कारण पत्नियाँ काम ज्वाला में जलती रहती हैं;

१५. जब न उष्ण और न शीतल वायु से कम्पित होते [ वृक्षों ] से बगीचे में नव-सौन्दर्य प्रस्फुटित होता है; जब कोयल अपनी मत्त करनेवाली वाणी आरम्भ करती होती है; जब प्रिया के अधर की तरह लाल दिखायी पड़नेवाली कोमल पत्तियाँ प्रस्फुरित होती हैं;

१६. कूपसहित स्तूप का निर्माण [ उस बुद्ध की स्मृति में ] किया गया जिसने समस्त धातुओं के दुष्प्रभावों से मुक्त होकर सर्व क्रियाओं के सिद्धि की व्याख्या की। यह स्तूप कुन्द पुष्प श्वेत है और उसका शिखर आकाश को छूता हुआ है और चन्द्रमा जैसा

१७. [ कामना है कि ] जलाशय ( कूप ) जो निरन्तर अनेकानेक नारियों के, [ जो वहाँ स्नान करने आती हैं ] संस्पर्श का आनन्द लेता रहता है, [ उस ] समुद्र की भाँति ही भरा रहे, जो अनेक नदियों के, जो उसकी पत्नियाँ हैं, संसर्ग का आनन्द भोग करता रहता है। [ कामना है कि ] स्तूप की पूजा सुर, असुर, नर, नाग और देव [ निरन्तर ] करते रहें और वह तब तक स्थायी बना रहे जब तक आकाश, पर्वत, सूर्य और चन्द्र रहें।

१८. स्तूप, कूप, प्रपा और आराम, जिसकी [ ऊपर ] चर्चा की गयी है, लोकोत्तर-विहार की सीमान्तर्गत हैं। यह रविल की रचना है।

टिप्पणी

अलंकारपूर्ण भाषा में रविल नामक कवि ने इस अभिलेख की काव्य के रूप में रचना की है। इसका उद्देश्य इस बात की उद्घोषणा मात्र है कि मालव सम्वत् ५२४ ( ४६७ ई० ) में दत्तभट्ट नामक व्यक्ति ने अपने पितरों के प्रति अपना कर्तव्य पूरा करने एवं उनके स्वर्ग में सुख-शान्ति प्राप्त करने के निमित्त हीनयान बौद्धधर्म से सम्बद्ध लोकोत्तरवादिन् भिक्षुओं के विहार ( लोकोत्तर-विहार ) में एक स्तूप, कूप ( कुआँ ) प्रपा ( पौशाला ), आराम ( वाटिका अथवा विहार ) का निर्माण कराया। इस प्रकार यह अभिलेख उक्तनिर्माण की विज्ञप्ति मात्र है।

गुप्तकालीन अभिलेखों की काल-गणना में प्रायः गुप्त-सम्वत् का प्रयोग पाया जाता है यहाँ काल-गणना में ‘मालव-वंश कीर्तेः’ (मालव-वंश की कीर्तिवाला) विशेषण का प्रयोग हुआ है मन्दसौर से ही प्राप्त एक अन्य गुप्त कालीन अभिलेख में ‘मालवानां गण-स्थित्या’ ( मालवों के गण द्वारा स्थित-स्थापित ) [ सम्वत् ] के रूप में कालगणना की गयी है। राजस्थान प्रदेश में मालव नामक एक गण निवास करता था, यह बात नगरी (चित्तौड़) और उसके आसपास से मिले ताँबे के सिक्कों से ज्ञात होती है उन सिक्कों पर मालवानां गणस्य जय लेख मिलता है। इन सिक्कों के परिप्रेक्ष्य में यह सहज अनुमान किया जा सकता है कि मालव-गण से सम्बन्धित कोई सम्वत् प्रचलित था या उसे उन्होंने स्थापित किया था या उसकी गणना मालव-गण की स्थापना के समय से की जाती थी। इस सम्वत् के विषय में विद्वानों की धारणा है कि उसका नाम पहले कृत था। कहा जाता है कि इसका आविष्कार या तो ज्योतिषियों ने किया था या फिर इसकी स्थापना कृत नामक किसी व्यक्ति ने की थी। इस प्रकार की कल्पना बड़वा से प्राप्त एक यूप-लेख के आधार पर की जाती है, जिस पर काल-गणना में कृतेहि शब्द का प्रयोग हुआ है। अनेक विद्वानों की यह भी धारणा है कि यह सम्वत् मूलतः शक-पह्लव संवत् है; और जब मालव लोग पंजाब स्थित अपने मूल स्थान——झँग प्रदेश को छोड़कर राजस्थान आये तो वह उनके स्थान इस प्रदेश में आया। इस संवत् का सम्बन्ध किसी रूप में शक-पहलवों से है, यह मतभेद का विषय है। यह सम्वत् मालवों के साथ किसी रूप में राजस्थान आया यह भी कहना सम्भव नहीं है। अभी तक मालव नाम के उल्लेख के साथ जो प्राचीनतम् लेख ज्ञात हुए हैं, उनमें से एक भी राजस्थान से प्राप्त नहीं हैं। प्रायः वे सभी मालव-प्रदेश के ही हैं। कुल मिलाकर मालव सम्वत् को ही कृत सम्वत् और विक्रम सम्वत् कहा जाता है। इसकी गणना जैन स्रोतों के अनुसार महावीर स्वामी के निर्वाण की तिथि को आधार बनाकर की जाती है। बताया गया है कि महावीर स्वामी के निर्वाण के और कृत ( मालव / विक्रम ) सम्वत् में ४७० वर्ष का अंतर है। महावीर स्वामी की निर्माण तिथि ५२७ ई० है अतः मालव सम्वत् का प्रारम्भ ५२७ – ४७० = ५७ ई०पू० में हुई।

यह भी समझा जाता है कि मालव सम्वत् पीछे चलकर विक्रम सम्वत् कहा जाने लगा; और आज उसका वही नाम प्रचलित है। इस सम्बन्ध में लोगों की धारणा है कि विक्रमादित्य के उज्जयिनी नरेश होने की जो अनुश्रुति है। उनका सम्बन्ध चन्द्रगुप्त (द्वितीय) से है, जिसका विरुद विक्रमादित्य था उन्हीं के नाम पर इस सम्वत् को विक्रम सम्वत् कहा जाने लगा था।

तथ्य जो भी हो, मालव और विक्रम एक ही सम्वत् के दो नाम हैं, इसका ज्ञान हमें तेरहवीं शती ई० के चाहमान नरेशों के कतिपय अभिलेखों से ही होता है। पृथ्वीराज (द्वितीय) के राज्य काल के मेनालगढ़ (उदयपुर) स्तम्भ लेख में कालगणना में मालवेश-गत-वत्सर का, उसके चचा विग्रहराज के दिल्ली स्थित अशोक स्तंभ पर (जो फीरोजशाह की लाट के नाम से प्रसिद्ध है) अंकित अभिलेख में सम्वत् श्री विक्रमादित्य का और उसके एक-दूसरे चर्चे के लेख में प्रसिद्धमगमद्देवः काले विक्रम भास्वतः का प्रयोग हुआ है। ये तीनों लेख एक ही वंश के और तीन क्रमागत राजाओं के हैं और उन पर जो तिथियाँ हैं वे एक-दूसरे के अति निकट हैं। इस आधार पर अनुमान किया जा सकता है कि उनके उल्लेख का तात्पर्य एक ही संवत् से है। किन्तु मालव और विक्रम दोनों के पर्याय होने की बात, इससे पूर्व भी लोक-प्रचलित थी, प्रमाण आपेक्ष्य है।

मालव और विक्रम सम्वत् एक हैं और विक्रम संवत् वही है, जिसमें आज काल-गणना प्रचलित है, इस आधार पर यह माना जाता है कि इस संवत् का आरम्भ ५७ ई० पू० में हुआ था। तदनुसार इस अभिलेख के काल—मालव संवत् ५२४ की गणना गुप्त-संवत् १४८ [ ५२४ – ( ५७ + ३१९ ) ] के रूप में की जा सकती है। सम्भवतः इस समय स्कंदगुप्त ( ≈ ४५५ से ४६७ ई० ) या पुरुगुप्त ( ≈ ४६७ से ४७६ ई० ) शासक रहे होंगे; अतः इस अभिलेख को उसके काल के अन्तर्गत रखा जाना चाहिए।

ऐतिहासिक दृष्टि से अभिलेख का महत्त्व दत्तभट्ट सम्बन्धी दी गयी सूचनाओं में ही निहित है। इसमें बताया गया है कि गुप्त वंश में चन्द्रगुप्त नामक नरेश के गोविन्दगुप्त नामक एक पुत्र थे। उस गोविन्दगुप्त के वायुरक्षित नामक सेनापति का पुत्र दत्तभट्ट था। इस सूचना के आधार पर विद्वानों ने गोविन्दगुप्त के सम्बन्ध में नाना प्रकार के अनुमान प्रस्तुत किये हैं। गोविन्दगुप्त चन्द्रगुप्त (द्वितीय) का ध्रुवस्वामिनी से जन्मे पुत्र थे, यह बात ध्रुवस्वामिनी के बसाढ़ ( वैशाली ) से प्राप्त मिट्टी की मुहर से भी ज्ञात होती है और अन्य सूत्रों से यह बात भी ज्ञात है कि ध्रुवस्वामिनी चन्द्रगुप्त ( द्वितीय ) की पत्नी तथा कुमारगुप्त ( प्रथम ) की माता थी। इस प्रकार चन्द्रगुप्त (द्वितीय) के दो पुत्र गोविन्दगुप्त और कुमारगुप्त ( प्रथम ) थे। बताया जाता है कि गोविन्दगुप्त ज्येष्ठ और कुमारगुप्त कनिष्ठ पुत्र थे। किन्तु गोविन्दगुप्त के राज्याधिकारी होने की बात स्पष्ट रूप से किसी भी सूत्र से ज्ञात नहीं है इस अभिलेख में उसके सम्बन्ध में कहा गया है कि ‘अधीनस्थ नृप उसके पाद-पद्म को शिर झुकते थे’ ( नृपैरस्तमित-प्रतापैश्शिरोभिरालिंगत-पावपद्मे ) और ‘इन्द्र भी उसकी शक्ति से आतंकित था’  ( विचारदोलां विबुधाधिपोम्प्रि शंकापरीतः समुपारुरोह )। इन वाक्यों से स्पष्ट झलकता है कि गोविन्दगुप्त ने कुछ काल तक सम्राट् पद का उपभोग किया था।

परन्तु कुछ विद्वान् अभिलेख के इन वाक्यों को गम्भीरतापूर्वक ग्रहण नहीं करते हैं। वे इस अभिलेख के मालव-प्रदेश में प्राप्त होने के कारण कल्पना करते हैं कि गोविन्दगुप्त अपने भाई कुमारगुप्त (प्रथम) के शासन-काल में उपरिक मात्र था। अधिक कल्पनाशील विद्वानों की धारणा है कि गोविन्दगुप्त अपने भाई ( कुमारगुप्त ) अथवा भतीजे ( स्कन्दगुप्त ) के निधन के पश्चात् मालव का स्वतन्त्र शासक हो गया था।

दिनेशचन्द्र सरकार ने, जो इस मत के प्रधान पोषक हैं, इस बात की ओर ध्यान आकृष्ट करने की चेष्टा की है कि अधीनस्थ सामन्त भी अपने से छोटे करद राजाओं द्वारा पूजित होते थे इस प्रसंग में उन्होंने निर्मण्ड अभिलेख का उल्लेख किया है जिसमें महासामन्त महाराज वरुणसेन के सम्बन्ध में, जो स्वयं सम्राट् नहीं था, कहा गया है कि वह अनेक सामन्तों द्वारा पूजित था। उन्होंने इस बात के भी उदाहरण प्रस्तुत किये हैं जिनमें मात्र सामन्त-पद-भोक्ता भी इन्द्रतुल्य अथवा उससे भी बड़े कहे गये हैं। उन्होंने इस बात की ओर भी इंगित किया है कि कभी-कभी युवराज भी सत्तारूढ़ शासक के समान ही सम्राट योग्य सम्मान का उपभोग किया करते थे। अतः दिनेशचन्द्र सरकार का मत है कि इस अभिलेख के उपर्युक्त वाक्यों का कोई विशेष महत्त्व नहीं है।

इस सम्बन्ध में मुख्य रूप से द्रष्टव्य यह है कि मालव के साथ गोविन्दगुप्त का सम्बन्ध जोड़नेवाला किसी प्रकार का कोई ठोस प्रमाण उपलब्ध नहीं है। मात्र इतने से ही कि दत्तभट्ट मन्दसौर के भूमि-पति प्रभाकर का सेनापति था, यह नहीं कहा जा सकता कि दत्तभट्ट के पिता अथवा उसके पिता के स्वामी गोविन्दगुप्त का भी मालव के साथ कोई निकट का प्रशासनिक सम्बन्ध था। मालव के साथ गुप्तों का सम्बन्ध जोड़ते समय लोग यह तथ्य भूल जाते हैं कि मन्दसौर के निकट से चार अभिलेख ऐसे प्राप्त हुए हैं जिनसे स्पष्ट ज्ञात होता है कि इस भू-भाग पर उन दिनों वर्मन-नामान्त स्थानीय वंश के शासकों का अधिकार था। इस वंश के प्रथम दो शासक —— जयवर्मन और उसके पुत्र सिंहवर्मन चतुर्थ शताब्दी के उत्तरार्ध में स्वतन्त्र शासक थे सिंहवर्मन का पुत्र नरवर्मन ४०४ ई० में और उसका पुत्र विश्ववर्मन ४२३ ई० में वहाँ के शासक थे इन राजाओं के अभिलेखों में ऐसी कोई बात नहीं कही गयी है जिससे कहा जा सके कि उन्होंने कभी गुप्त सम्राटों का प्रभुत्व स्वीकार किया था। उनके अभिलेख उनके वैभव की चर्चा स्वतन्त्र शासक के रूप में ही करते हैं; उनके अभिलेखों में किसी गुप्त सम्राट् का कोई प्रच्छन्न संकेत भी नहीं है। विश्ववर्मन के पुत्र बन्धुवर्मन के समय में पहली बार एक अभिलेख ( मन्दसौर अभिलेख, मालव सम्वत् ४९३, ५२९ ) ऐसा मिलता है जिसमें कुमारगुप्त ( प्रथम ) का उल्लेख चतुस्समुद्रान्त पृथिवी के शासक के रूप में हुआ है। यह अभिलेख मालव संवत् ४९३ (४३६ ई०) का है तदनन्तर गुप्त संवत् १३६ ( ४५५ ई० ) के गिरिनार ( जूनगढ़ ) शिला-खण्ड लेख से पश्चिमी भारत पर गुप्तों का शासन प्रकट होता है।

गोविन्दगुप्त के युवराज की हैसियत से साम्राज्य के किसी प्रदेश के उपरिक होने की कल्पना अपने पिता चन्द्रगुप्त ( द्वितीय ) के शासन-काल में ही जा सकती थी; किन्तु मालव के इस भू-भाग पर कुमारगुप्त ( प्रथम ) के शासन काल में ही, ४२३ ई० के बाद और ४३६ ई० से पूर्व किसी समय, गुप्तों का अधिकार हुआ था। अतः चन्द्रगुप्त के शासन काल में गोविन्दगुप्त के वहाँ का उपरिक होने की बात उठती ही नहीं। कुमारगुप्त ( प्रथम ) के शासन काल में छोटे भाई के अधीन उसके उपरिक होने की कल्पना अपने-आपमें संदेहास्यास्पद है।

इस प्रसंग में यह भी द्रष्टव्य है कि प्रभाकर को, जिसका सेनापति दत्तभट्ट था, गुप्तान्वयारि द्रुम-धूमकेतु ( गुप्तों के शत्रु-रूपी वृक्ष के लिए दावाग्नि ) कहा गया है। यह इस बात का द्योतक है कि वह गुप्त शासकों के अधीन कोई सामन्त या उपरिक न होकर भूमि पति ( सम्भवतः विषय-पति ) मात्र था। इससे प्रकट होता है कि मन्दसौर प्रदेश की स्थिति विषय से अधिक नहीं थी वहाँ की व्यवस्था के लिये कदापि कोई कभी युवराज नियुक्त नहीं किया गया होगा। बन्धुवर्मन के क्रम में ही गुप्तों की ओर से प्रभाकर को यहाँ का प्रशासक होने की कल्पना की जा सकती है।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि इस अभिलेख में ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे गोविन्दगुप्त का सम्बन्ध मालव से जोड़ा जा सके अथवा यह कल्पना की जा सके कि वह सामान्य शासनाधिकारी मात्र थे अथवा वे सम्राट् नहीं थे और उनका प्रभुत्व सामन्तों पर नहीं था। बसाढ़-मुद्रालेख से गोविन्दगुप्त के युवराज होने की बात प्रकट है ही अतः उसके अपने पिता के बाद तत्काल सत्तारूढ़ होने की सहज कल्पना की जा सकती है प्रस्तुत अभिलेख से यह स्पष्ट है कि उसके अंकित किये जाने के समय गोविन्दगुप्त जीवित न थे। उनके शासन की चर्चा भूत-कालिक रूप में की गयी है। स्पष्ट है कि उनका शासन-काल अल्पकालीन रहा होगा। सम्भवतः उसे उसके छोटे भाई कुमारगुप्त ( प्रथम ) ने अपदस्थ कर दिया और वे मारे गये प्रस्तुत अभिलेख में गोविन्दगुप्त की शक्ति से इन्द्र के आतंकित होने की जो बात कही गयी है, उसे मात्र कवि की कल्पना और अतिशयोक्तिपूर्ण चाटुकारिता नहीं कह सकते क्योंकि कवि को गोविन्द के निधनोपरान्त इस प्रकार की चाटुकारिता करने से कोई लाभ न था। अतः उसने जो कुछ कहा है वह उसने साभिप्राय और सार्थक ही कहा होगा; हमें उसने इस वाक्य में प्रच्छन्न रूप से कुमारगुप्त ( प्रथम ) का संकेत दिखायी पड़ता है। कहना न होगा कि कुमारगुप्त ने महेन्द्र विरुद धारण किया था । तुमेन अभिलेख में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि कुमारगुप्त ( प्रथम ) पृथिवी की, जिसे उन्होंने बलपूर्वक प्राप्त किया था, रक्षा साध्वी-पत्नी की तरह करते थे। ( रक्ष साध्वीमिव धर्मपत्नीम् वीर्य्याग्रहस्तैरुपगुह्य भूमिम्। )।

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