शंकरगढ़ ताम्र-लेख; गुप्त सम्वत् १६६ (४८५ ई०)

भूमिका

शंकरगढ़ ताम्र-लेख जून १९७७ में मध्य प्रदेश के सिद्दी जनपद के गोपद बनास (Gopad Banas ) तहसील के शंकरपुर ग्राम में एक विद्यार्थी को प्राप्त हुआ था। यह लेख २४ x ११ सेंटीमीटर आकार के ताम्रपत्र के एक ओर अंकित है। दाहिने ओर का ऊपर और नीचे का कोना क्षतिग्रस्त है; जिसके कारण प्रथम पंक्ति के चार तथा द्वितीय पंक्ति का एक तथा अन्तिम पंक्ति के दो-तीन अक्षर अनुपलब्ध हैं। बायीं ओर ५वीं और छठीं पंक्ति के बीच मुद्रा पिरोने के लिये एक छिद्र है। इसको बालचन्द्र जैन ने सम्पादित करके प्रकाशित किया है।

संक्षिप्त परिचय

नाम :- शंकरगढ़ ताम्र-लेख [ Shankargarh Copper-plate Inscription ]

स्थान :- गोपद बनास ( Gopad Banas ) तहसील, सीधी जनपद ( Sidhi District ); मध्य प्रदेश।

भाषा :- संस्कृत

लिपि :- उत्तर ब्राह्मी

समय :- गुप्त सम्वत् १६६ (४८५ ई०); बुधगुप्त का शासनकाल

विषय :- अग्रहार दान से सम्बन्धित

मूलपाठ

१. सिद्धम् [।] संवत्सर-शतेषट्-षष्ट्युत्तरे महा-माघ संवत्सरे श्रावण[पंच]-

२. म्याम् परमदेव-बुधगुप्ते राजनि [।] अस्यां दिवस-पूर्वायां श्रीमहाराज-

३. सालन-कुलोद्भवेन श्री महाराज गीतवर्म-पौत्रेण श्री-महाराज-विजयवर्म्म सुते[न्]

४. महादेव्यां शर्वस्वामिन्यां-उत्पन्नेन श्री-महाराज-हरिवर्म्मणा। अस्य ब्राह्मण-कौत्स-

५. सगोत्र-गोस्वामिनेतच्चित्रपल्य ताम्रपट्टेनाग्रहारोति श्रृष्टः अकरः अचाट-भट-प्रा-

६. वेश्यः [।] चन्द्र-तारार्क-समकालीयः [।] उक्तञ्च भगवता व्यासेन[:] [।] स्वदत्ता-

परदत्तां-वा यो

७.                  हरेत वसुन्धरां[।]

स विष्ठायां क्रिमिर्भूत्वा पितृभिः सह पच्यते [।]

बहुभिर्वसुधा

८.               भुक्तराजभिः सगरादिभिः [।]

यस्य यस्य यदा भूमिस्तस्य तस्य तदा फलम् [॥]

९. कुमारामात्य-भगवद्रुद्रछदिभोगिक महाप्रतिहारलवणः बपिद्रा भोगिके[न]

१०. दूतकेन [।] लिखितम् रुयष्टराजेन नागशर्म-सुतेन॥

हिन्दी अनुवाद

सिद्धि हो। संवत्सर एक सौ छासठ (१६६) महामाघ संवत्सर के श्रावण की पंचमी को परमदेव बुधगुप्त के राज्य में।

इस पूर्वकथित तिथि को श्री महाराज सालन [के] कुल में उत्पन्न श्री महाराज गीतवर्मा के पौत्र, श्रीमहाराज विजयवर्मा के पुत्र, महादेवी शर्वस्वामिनी से उत्पन्न श्री महाराज हरिवर्मा ने इस ताम्रपट्ट द्वारा कौत्स गोत्रीय ब्राह्मण गोस्वामी के लिये चित्रपल्य नामक ग्राम की अग्रहार के रूप में सृष्टि की (अर्थात् इस ताम्रपट्ट द्वारा अग्रहारस्वरूप चित्रपल्य नामक ग्राम ब्राह्मण गोस्वामी को प्रदान किया)। वह करमुक्त (अकरः) है; और उसमें चाट-भाट का प्रवेश निषिद्ध है। जब तक चन्द्र, तारे और सूर्य विद्यमान रहें, तब तक वह उसका उपयोग करते रहें।

भगवत्व्यास ने कहा है— स्वदत्त और परदत्त भूमि का जो हरण करता है, वह पितरोंसहित विष्ठा का कीड़ा बनता है। [जो इसकी रक्षा करता है] वह सगर आदि की तरह पृथ्वी का बहुत काल तक भोग करता है। जो पृथ्वी के साथ जैसा व्यवहार करता है, उसका वैसा ही फल मिलता है। दूतक रुद्रछदि के भोगिक कुमारामात्य भगवत और बपिद्रा के भोगिक महाप्रतिहार लवण के [आदेश से], नागशर्मण के पुत्र रुयष्ट्रराज ने लिखा।

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