चन्द्र का मेहरौली लौह स्तम्भ लेख

परिचय

मेहरौली लौह स्तम्भ लेख संघ राज्य क्षेत्र दिल्ली के दक्षिण दिल्ली जनपद के मेहरौली नामक गाँव से प्राप्त हुआ है। यह लौह स्तम्भ कुतुबमीनार के निकट स्थापित है। इसी लौह स्तम्भ पर ‘चन्द्र’ का अभिलेख अंकित है। चन्द्र का पहचान ‘चन्द्रगुप्त द्वितीय’ से की गयी है।

मेहरौली लौह स्तम्भ के तल का व्यास सोलह इंच और सिरे का व्यास बारह इंच और ऊँचाई २३ फुट ८ इंच है। इस लौह स्तम्भ पर लेख पत्थर के बने चबूतरे से सात फुट दो इंच ऊपर २ फुट ९ / इंच चौड़े और १० / इंच ऊँचे घेरे के बीच अंकित है।

१८३४ ई० में पहली बार जेम्स प्रिन्सेप महोदय ने इस लेख की लेफ्टिनेण्ट डब्लू० ईलियट द्वारा १८३१ ई० में तैयार की गयी नकल ( प्रतिलिपि ) प्रकाशित की थी। तदनन्तर १८३८ ई० में कैप्टेन टी० ए० बर्ट द्वारा प्रस्तुत छाप के आधार पर उन्होंने इसका अपना तैयार किया पाठ और अंग्रेजी अनुवाद प्रस्तुत किया। १८७१ ई० में भाऊ दाजी ने इसका एक संशोधित पाठ और अपना अनुवाद रायल एशियाटिक सोसाइटी की बम्बई शाखा के सम्मुख उपस्थित किया जो चार वर्ष पश्चात् १८७५ ई० में प्रकाशित हुआ। तदनन्तर फ्लीट ने इसका सम्पादन किया इस लेख के सम्बन्ध में अनेक लेखकों ने समय समय पर अपने विचार प्रकट किये हैं।

संक्षिप्त परिचय

नाम :- चन्द्र का मेहरौली लौह स्तम्भ लेख [ Mehrauli Iron Pillar Inscription of Chandra ]

स्थान :- मेहरौली गाँव, दक्षिण दिल्ली जनपद; संघ राज्य क्षेत्र दिल्ली।

भाषा :- संस्कृत।

लिपि :- ब्राह्मी।

समय :- चन्द्रगुप्त द्वितीय का शासनकाल ( ३७५ – ४१५ ई० )।

विषय :- चन्द्रगुप्त द्वितीय की उपलब्धियों का विवरण।

मूलपाठ

१. यस्योद्वर्त्तयतः प्रतीपमुरसा शत्रून्समेत्यागतान्वंगेष्वाव-वर्त्तिनो(ऽ) भिलिखिता खड्गेन कीर्त्तिर्भुजे [ । ]

२. तीर्त्वा सप्त मुखानि येन समरे सिन्धोर्ज्जिता वाह्लिका यस्याद्याप्यधिवास्यते जलनिधिर्व्वीर्य्यानिलैर्द्दक्षिणः [ ॥ ]

३. खिन्नस्येव विसृज्य गां नरपतेर्ग्गमाश्रितस्येतरां मूर्त्या कर्म्मंजिताबनिं गतवतः कीर्त्या स्थितस्य क्षितौ [ । ]

४. शान्तस्येव महावने हुतभुजो यस्य प्रतापो महान्नाद्याप्युत्सृजति प्रणाशित-रिपोर्य्यलस्य शेषः क्षितम् [ ॥ ]

५. प्राप्तेन स्व-भुजार्ज्जितंच सुचिरंचैकाधिराज्यं क्षितो चन्द्रास्वेन समग्रचन्द्र-सदृशीं वक्त्र-श्रियं विभ्रता [ । ]

६. तेनायं प्रणिधाय भूमि-पतिना भावेन विर्ष्णो मतिं प्रान्शुर्विष्णुपदे गिरौ भगवतो विष्णोर्ध्वजः स्थापितः [ ॥ ]

हिन्दी अनुवाद

१. बंगदेश में संघटित रूप से अपने विरुद्ध आये हुए शत्रुओं को अपने वक्ष द्वारा पीछे की ओर ढकेलते समय तलवार द्वारा जिसकी भुजा पर कीर्ति अंकित हुई है;

२. जिसने सिन्धु के सात मुखों को पार कर [ युद्ध में ] बाह्लीकों को जीता; जिसके शौर्यानिल से दक्षिणी समुद्र अब तक सुवासित है;

३. जो राज्य खिन्न ( विरक्त ) होकर पृथ्वी ( गो ) को त्याग कर अन्यत्र चला गया; जिसने अपने कर्म ( शौर्य ) से पृथ्वी को जीत लिया, जो पृथ्वी पर रहते हुए भी अपनी कीर्ति से ( स्वर्ग तक ) जा पहुँचा;

४. जिसका विशाल वन में शान्त हुई दावाग्नि के समान, आज भी शत्रुओं को विनष्ट करने वाले प्रयासों की स्मृति स्वरूप प्रताप इस पृथिवी का त्याग नहीं कर सकी है;

५-६. जिसने इस वसुन्धरा पर अपने भुज-बल से उपार्जित एकाधिराज्य ( एकछत्र राज्य ) का बहुत दिनों तक उपभोग किया, उस चन्द्र तुल्य मुख-श्री धारण करने वाले ‘चन्द्र’ नाम से प्रख्यात, शुद्ध हृदय वाले राजा ने विष्णु भगवान में श्रद्धा प्रकट कर विष्णुपद नामक पर्वत पर भगवान् विष्णु के इस उन्नत ध्वज की स्थापना की।

टिप्पणी

मेहरौली लौह स्तम्भ लेख में ‘चन्द्र’ नामक राजा की उपलब्धियों का वर्णन तीन श्लोकों में किया गया है जिसका सारांश इस प्रकार है :

‘जिसने बङ्गाल के युद्ध-क्षेत्र में मिलकर आये हुये अपने शत्रुओं के एक संघ को पराजित किया था, जिसकी भुजाओं पर तलवार द्वारा उसका यश लिखा गया था, जिसने सिन्धु नदी के सातों मुखों को पार कर युद्ध में बाह्लीकों को जीता था, जिसके प्रताप के सौरभ से दक्षिण का समुद्रतट अब भी सुवासित हो रहा था।’

अभिलेख के अनुसार जिस समय यह लिखा गया चन्द्र की मृत्यु हो चुकी थी, किन्तु ‘उसकी कीर्ति इस पृथ्वी पर फैली हुई थी।’ ‘उसने अपने बाहुबल से राज्य को प्राप्त किया था और चिरकाल तक शासन किया।’ ‘भगवान विष्णु के प्रति श्रद्धा के कारण विष्णुपद नामक पर्वत पर उसने विष्णुध्वज की स्थापना की थी।’

मेहरौली लौह स्तम्भ लेख के सम्बन्ध में निम्न समस्याएँ हैं :

  • इसमें कोई तिथि अंकित नहीं है।
  • राजा का पूरा नाम नहीं मिलता है।
  • इसमें राजा की कोई वंशावली नहीं दी गयी है।

फलस्वरूप इस राजा के समीकरण के प्रश्न पर विद्वानों में गहरा मतभेद रहा है। प्राचीन भारतीय इतिहास में चन्द्रगुप्त मौर्य से लेकर चन्द्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य तक ‘चन्द्र’ नामधारी जितने भी शासक हुये हैं उन सबके साथ मेहरौली लेख के चन्द्र का समीकरण स्थापित करने का विद्वानों ने अलग-अलग प्रयास किया है।

एच० सी० सेठ इस चन्द्र की पहचान चन्द्रगुप्त मौर्य से करते हैं परन्तु चन्द्रगुप्त मौर्य वैष्णव मतानुयायी नहीं थे। इस लेख की लिपि भी गुप्तकाल की है।

रायचौधरी ने इस राजा की पहचान पुराणों में वर्णित नागवंशी शासक ‘चन्द्रांश’ से किया है किन्तु चन्द्रांश कोई इतना प्रतापी राजा नहीं था जो मेहरौली के चन्द्र की उपलब्धियों का श्रेय प्राप्त कर सके।

हर प्रसाद शास्त्री ने इस राजा को सुसुनिया (प० बंगाल) के लेख का ‘चन्द्रवर्मा’ बताया है किन्तु यह समीकरण भी मान्य नहीं है क्योंकि चन्द्रवर्मा एक अत्यन्त साधारण राजा था जिसे समुद्रगुप्त ने बड़ी आसानी से उन्मूलित कर दिया था।

रमेशचन्द्र मजूमदार के मतानुसार मेहरौली के लेख का ‘चन्द्र’ कुषाण नरेश ‘कनिष्क’ के साथ समीकृत किया जाना चाहिए क्योंकि उसी का बल्ख पर अधिकार था तथा खोतानी पाण्डुलिपि में उसे ‘चन्द्र कनिष्क’ कहा गया है। परन्तु हम जानते हैं कि कनिष्क बौद्ध मतानुयायी थे तथा उसके राज्य का विस्तार दक्षिण में नहीं था। अतः यह समीकरण भी मान्य नहीं हो सकता।

इसी प्रकार फ्लीट, आयंगर, बसाक जैसे कुछ विद्वानों ने ‘चन्द्र’ को ‘चन्द्रगुप्त प्रथम’ बताया है। किन्तु यह भी असंगत है क्योंकि चन्द्रगुप्त प्रथम का राज्य विस्तार अत्यन्त संकुचित था। पुनश्च बंगाल अथवा दक्षिण की ओर उसका कोई प्रभाव नहीं था।

कुछ विद्वानों ने ‘चन्द्र’ की पहचान ‘समुद्रगुप्त’ से कर डाली है।* परन्तु समुद्रगुप्त के साथ पहचान के विरुद्ध सबसे बड़ी आपत्ति तो यही है कि इस लेख में अश्वमेध यज्ञ का उल्लेख नहीं मिलता जबकि यह मरणोत्तर है। पुनश्च समुद्रगुप्त का एक नाम ‘चन्द्र’ रहा हो, इसका भी कोई स्पष्ट ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है।

  • A History of Imperial Guptas – S. R. Goyal; p. 201-208*

इस तरह ये सभी समीकरण एक न एक दृष्टि से असंगत एवं दोषपूर्ण प्रतीत होते हैं। इस विषय में उपलब्ध सभी प्रमाणों का अवलोकन करने के पश्चात् मेहरौली लेख के चन्द्र का समीकरण चन्द्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य के साथ करना सर्वाधिक तर्कसंगत एवं सन्तोषजनक प्रतीत होता है।

‘चन्द्र’ और चन्द्रगुप्त द्वितीय ‘विक्रमादित्य’

मैहरौली स्तम्भलेख लेख की पंक्तियों का ध्यानपूर्वक अनुशीलन करने के पश्चात् हमें ‘चन्द्र’ नामक शासक की निम्नलिखित उपलब्धियों का पता चलता है —

( १ ) बंगाल के युद्ध क्षेत्र में ‘चन्द्र’ ने शत्रुओं के एक संघ को पराजित किया था।

( २ ) सिन्धु के सातों मुखों को पार करके ‘चन्द्र’ ने बाह्लीकों को जीता था।

( ३ ) दक्षिण भारत में ‘चन्द्र’ की ख्याति फैली हुई थी।

( ४ ) ‘चन्द्र’ भगवान विष्णु के परम भक्त थे।

अब यदि हम उपर्युक्त विशेषताओं को चन्द्रगुप्त द्वितीय के पक्ष में लागू करें तो वे सर्वथा तर्कसंगत प्रतीत होती हैं।

बंगाल विजय

समुद्रगुप्त के प्रयाग प्रशस्ति से ज्ञात होता है कि उसने ‘चन्द्रवर्मा’ को हराकर बंगाल का पश्चिमी भाग जीत लिया था। समुद्रगुप्त द्वारा विजित इस स्थान को मोटेतौर पर वर्तमान बाँकुड़ा जनपद के आसपास के क्षेत्र से की जाती है। कुमारगुप्त प्रथम के लेखों से ज्ञात होता है कि उत्तरी बंगाल पर भी उसका अधिकार था और यहाँ पुण्ड्रवर्धन गुप्तों का एक प्रान्त ( भुक्ति ) था। हमें यह भी ज्ञात है कि स्वयं कुमारगुप्त प्रथम ने कोई विजय नहीं की थी। ऐसी स्थिति में यही मानना तर्कसंगत प्रतीत होता है कि उत्तरी बंगाल का क्षेत्र चन्द्रगुप्त द्वितीय ने ही जीतकर गुप्त साम्राज्य में मिलाया था।

समुद्रगुप्त के समय गुप्तों की पूर्वी तथा उत्तरी-पूर्वी सीमाओं पर पाँच राज्य थे — समतट, डवाक, कामरूप, कर्तृपुर और नेपाल। इन्होंने उसकी अधीनता मान ली थी। ऐसा प्रतीत होता है कि ‘रामगुप्त’ के निर्बल शासन में ये राज्य पुनः स्वतन्त्र हो गये और उन्होंने अपना एक संघ बना लिया। इसी संघ को बंगाल के किसी युद्ध-क्षेत्र में परास्त कर चन्द्रगुप्त ने उत्तरी बंगाल को जीत लिया और इसी घटना का उल्लेख काव्यात्मक ढंग से मेहरौली लेख में किया गया है। सम्भवतः यह विजय उसके राज्य-काल के अन्त में की गयी थी और यही कारण है कि इसकी पुष्टि किसी अभिलेख अथवा सिक्के से नहीं हो पाती है।

बाह्लीक विजय

जहाँ तक ‘वाह्लीक’ की पहचान का प्रश्न है, इससे तात्पर्य निश्चय ही बल्ख (बैक्ट्रिया) से है। परन्तु यहाँ इससे तात्पर्य बैक्ट्रिया देश से कदापि नहीं है।

भण्डारकर महोदय ने रामायण और महाभारत से प्रमाण प्रस्तुत करते हुये यह सिद्ध कर दिया है कि प्राचीन काल में पंजाब को व्यास नदी के आस-पास का क्षेत्र भी ‘बाह्लीक’ नाम से प्रसिद्ध था।

  • रामायण* के अनुसार वशिष्ठ ने भरत को बुलाने के लिये कैकय देश को जो दूत-मण्डल भेजा था वह ‘बाह्लीक’ प्रदेश के बीच से होकर गया था। वहाँ पर उसने सुदामन पर्वत, विष्णुपद, विपाशा एवं शाल्मली नदी के भी दर्शन किये थे। स्पष्ट है कि वहाँ पंजाब को व्यास नदी के समीपवर्ती क्षेत्र को ही बाह्लीक कहा गया है।

ययुर्मध्येन वाह्लिकान् सुदामनम् च पर्वतम्।

विष्णोः पदं प्रेक्षमाणा विपाशां चापि शाल्मलिम्॥*

महाभारत में इस क्षेत्र को ‘वाहीक’ कहा गया है। टालमी ने भी इसे ‘बाहीक’ कहा है जिसका अर्थ है ‘पाँच नदियों की भूमि’।

प्रश्न यह उठता है कि पंजाब की भूमि को क्यों बाह्लीक कहा गया?

इतिहासकारों के अनुसार इसका प्रमुख कारण यह था कि यहाँ पर कुषाणों का निवास था जो पहले बल्ख पर शासन कर चुके थे तथा फिर पंजाब में आकर बस गये थे। अतः कुषाणों को भी ‘बाह्लीक’ कहा जाने लगा। मेहरौली लौह स्तम्भ लेख के ‘बाह्लीक’ का तात्पर्य ‘परवर्ती कुषाणों’ (Later Kushumnas) से है जो गुप्तों के समय में पंजाब में शासन करते थे। समुद्रगुप्त को उन्होंने अपना राजा मान लिया था। रामगुप्त के शासनकालकाल में शकों के साथ-साथ उन्होंने भी अपने को स्वतन्त्र कर दिया। चन्द्रगुप्त ने शकों का उन्मूलन करने के बाद पंजाब में जाकर कुषाणों को भी परास्त किया और इसी को ‘बाह्लिक-विजय’ की संज्ञा दी गयी है।

सिन्धु के सात मुखों से तात्पर्य उसके मुहाने से है जहाँ उसको सात पृथक-पृथक धारायें थीं सिन्धु के मुहाने से होते हुये ही उसने पंजाब में प्रवेश किया होगा तथा बाह्लीकों (कुषाणों) को परास्त किया होगा।

सुधाकर चट्टोपाध्याय के अनुसार मेहरौली लौह स्तम्भलेख परोक्ष रूप से चन्द्रगुप्त को शक विजय की भी सूचना देता है। शकक्षत्रप रुद्रदामन ने निचली सिन्धुघाटी (सौवीर) को कुषाणों से जीता था। इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि परवर्ती कुषाणों में से किसी ने पुन: इस भाग को शकों से जीता हो। अतः यहाँ गुप्तकाल तक शक सत्ता बनी रही। चूँकि चन्द्रगुप्त ने शकों के राज्य को जीता, वह स्वाभाविक रूप से सिन्धु के सातों मुखों को पार कर गया। निचली सिन्धु घाटी से ही उसने पंजाब में प्रवेश किया होगा।

दक्षिण समुद्र तक ख्याति

चन्द्रगुप्त द्वितीय की ख्याति दक्षिण भारत में भी पर्याप्त रूप से फैली हुई थी। दक्षिण के वाकाटक एवं कदम्ब कुलों में अपना वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित कर उसने उन्हें अपने प्रभाव क्षेत्र में कर लिया था। चन्द्रगुप्त द्वितीय की सुपुत्री प्रभावती गुप्ता के शासन काल में तो वाकाटक लोग पूर्णतया गुप्तों के प्रभाव में आ गये थे।

भोज के ग्रन्थ ‘शृंगारप्रकाश’ से ज्ञात होता है कि चन्द्रगुप्त ने कालिदास को अपना राजदूत बनाकर कुन्तलनरेश काकुत्सवर्मा की राजसभा में भेजा था। कालिदास ने लौटकर यह सूचना दी कि ‘कुन्तल नरेश’ अपना राज्य-भार आपके (चन्द्रगुप्त) ऊपर सौंपकर मुक्त होकर भोग-विलास में निमग्न हैं।*

पिवति मधुसुगन्धीन्याननानि प्रियाणां,

त्वयि विनित भारः कुन्तलानामधीशः।*

क्षेमेन्द्र ने कालिदास द्वारा विरचित एक श्लोक का उद्धरण दिया है जिससे लगता है कि कुन्तल प्रदेश का शासन वस्तुतः चन्द्रगुप्त द्वितीय ही चलाते थे।*

इह निवसति मेरुः शेखरः क्ष्माधारणाम्,

इह विनिहित भारा सागराः सप्तचान्ये।

इह महिपतिभोगस्तम्भ विभ्राज्यमानं,

धरणितलमिहैवस्थानमस्मद्विधानम्।*

 —औचित्यविचारचर्चा।

इस विवरणों से इतना तो स्पष्ट है ही कि दक्षिण के कुन्तलप्रदेश पर चन्द्रगुप्त का प्रभाव था। ऐसा प्रतीत होता है कि इन्हीं प्रभावों को ध्यान में रखकर मेहरौली स्तम्भलेख लेख के रचयिता ने काव्यात्मक ढंग से यह लिखा है कि ‘चन्द्र के प्रताप के सौरभ से दक्षिण के समुद्र तट आज भी सुवासित हो रहे हैं।’

अन्य विशेषतायें

मेहरौली लौह स्तम्भ लेख की अन्य विशेषतायें भी चन्द्रगुप्त के पक्ष में सही लगती है।

  • इसके अनुसार ‘चन्द्र’ ने अपने बाहुबल द्वारा अपना राज्य प्राप्त किया था।
  • ‘चन्द्र’ ने चिरकाल तक शासन किया।
  • ‘चन्द्र’ भगवान विष्णु का महान् भक्त थे।

हम जानते हैं कि रामगुप्त के समय में किस प्रकार गुप्त साम्राज्य संकटग्रस्त हो गया था। यदि चन्द्रगुप्त ने शकपति की हत्या नहीं की होती तो गुप्त राज्य शकों के अधिकार में चला जाता। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि चन्द्रगुप्त ने अपने बाहुबल से ही अपना राज्य प्राप्त किया था।

उन्होंने लगभग ४० वर्षों (३७५ – ४१५ ई०) तक शासन किया और इस प्रकार उनका शासन चिरकालीन रहा।

वे भगवान विष्णु का अनन्य भक्त थे। उनकी सर्वप्रिय उपाधि ‘परमभागवत’ की थी।

निष्कर्ष

इस तरह मेहरौली लौह स्तम्भ लेख के ‘चन्द्र’ की सभी विशेषतायें चन्द्रगुप्त द्वितीय के व्यक्तित्व एवं चरित्र में देखी जा सकती है। लेख की लिपि भी गुप्तकालीन है। ऐसा प्रतीत होता है कि उसकी मृत्यु के बाद कुमारगुप्त प्रथम ने पिता को स्मृति में इस लेख को उत्कीर्ण करवाया था। लिपि की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर ही इसमें चन्द्रगुप्त के नाम का केवल प्रथमार्ध ‘चन्द्र’ ही प्रयुक्त किया गया है। चन्द्रगुप्त द्वितीय की कुछ मुद्राओं पर भी केवल ‘चन्द्र’ नाम ही प्राप्त है। अतः मेहरौली लेख को चन्द्रगुप्त द्वितीय का मानने में अब संदेह का कोई स्थान नहीं रह जाता।

चन्द्रगुप्त द्वितीय का मथुरा स्तम्भलेख ( Mathura Pillar Inscription of Chandragupta II )

चन्द्रगुप्त द्वितीय का उदयगिरि गुहा अभिलेख ( प्रथम )

चन्द्रगुप्त द्वितीय का उदयगिरि गुहालेख ( द्वितीय )

चन्द्रगुप्त द्वितीय का साँची अभिलेख ( गुप्त सम्वत् – ९३ या ४१२ ई० )

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