तक्षशिला रजतपत्र अभिलेख

भूमिका

तक्षशिला रजतपत्र अभिलेख जॉन मार्शल को १९१४ में धर्मराजिका स्तूप के पश्चिम चिर नामक टीले से प्राप्त हुई है। इस चिर टीले से एक सेलखड़ी ( Steatite ) की मंजूषा के अन्दर दूसरी रजत-मंजूषा प्राप्त हुई है। इस चाँदी की मंजूषा के भीतर एक रजतपत्र ( चाँदी-पत्र ) और स्वर्ण-डिबिया थी। स्वर्ण-डिबिया में धातु-अवशेष ( अस्थि-अवशेष ) रखे थे। रजतपत्र पर प्राकृत भाषा और खरोष्ठी लिपि में यह लेख अंकित है।

तक्षशिला रजतपत्र अभिलेख : संक्षिप्त परिचय

नाम :- तक्षशिला रजतपत्र अभिलेख ( Taxila Silver Scroll Inscription )

स्थान :- तक्षशिला के धर्मराजिका स्तूप के चिर टीले से, रावलपिण्डी जनपद, पाकिस्तान

भाषा :- प्राकृत

लिपि :- खरोष्ठी

समय :- कुषाणकाल ( अनिर्दिष्ट सम्वत् १३६ )

विषय :- इन्तप्रिय के पुत्र द्वारा लोककल्याण और धर्म-अर्जन हेतु तक्षशिला धर्मराजिका स्तूप में बुद्ध के धातु अवशेष की स्थापना

तक्षशिला रजतपत्र अभिलेख : मूलपाठ

१. स १ [ + ] १०० [ + ] २० [ + ] १० [ + ] ४ [ + ] १ [ + ] १ अयस अषडस मसस दिवसे १० [ + ] ४ [ + ] इश दिवसे प्रदिस्तवित भगवतो धतु- [ ओ ] उर [ स ]-

२. केण इतव्हिअ-पुत्रण बहलिएण णोअचए णगरे वस्तवेण [ । ] तेण इमे प्रदिस्तवित भगवतो धतुओ धमर-

३. इए तक्षशिलए तणुवए बोसिसत्व-गहमि महरजस रजतिरजस देवपुत्र खुषणस अरोग-दक्षिणे

४. सर्वे-बुधण पुयए प्रचग-बुधण पुयए अरहतण पुयए सर्व-सत्वण पुयाए मत-पितु पुयए मित्रमच-ञति-स-

५. लोहितण पुयए अत्वणो अरोग-दक्षिणए णि [ व ] णए [ । ] होतु अ [ व ] दे सम-परिचगो [ । ]

  • लोतव्हिय भी पढ़ा गया है।

संस्कृत छाया

संवत्सरे १३६ अयस्य आषाढ़स्य मास्य दिवसे १५ अस्मिन्‌ दिवसे प्रतिष्ठापिता भागवत धातवः। उरशा देशीयेन इन्तप्रिय पुत्रेण बाहलिकेन नवाजये नगरे वास्तव्येन। तेन इमे प्रतिस्ठापिताः धर्मराजिके तक्षशिलायां तनुवके बोधिसत्त्वगृहे महराजस्य राजातिराजस्य देवपुत्रस्य कुषाणस्य आरोग्य दक्षिणायै सर्वबुद्धानां पूजायै प्रत्येकबुद्धानां पूजायै, अर्हतानां, पूजायै, सर्वसत्त्वानां पूजायै, मातापित्रोः पूजायै मित्रामात्य ज्ञाति-सलोहितानां पूजायै, आत्मन: आरोग्यदक्षिणायै निर्वाणाय। भवतु आयातः सम्यक्‌ परित्याग:।

हिन्दी अनुवाद

अय के सं [ वत्सर ] १३६ आषाढ़ मास का १५। इस दिन नवाजये ( णोअचए? ) निवासी उरशकी इन्तप्रिय के पुत्र बाहलिक द्वारा भगवान् [ बुद्ध ] के धातु ( अस्थि-अवशेष ) की स्थापना ( प्रतिष्ठा ) की गयी। उसके द्वारा भगवान् ( बुद्ध ) की धातु की प्रतिष्ठा तक्षशिला स्थित धर्मराजिका में स्व-निर्मित बोधिसत्त्व-गृह में महाराज रजतिराज देवपुत्र खुषण के आरोग्य-दक्षिणा ( स्वास्थ्य-कामना ) के लिए की गयी। सर्वबुद्धों की पूजा के निमित्त प्रत्येक बुद्धों की पूजा के निमित्त; अर्हतों की पूजा के निमित्त; माता-पिता की पूजा के निमित्त; मित्र-अमात्य ( बन्धु-बान्धवों ), जाति-बिरादरी के लोगों और रक्त सम्बन्धियों की पूजा के निमित्त, अपनी आरोग्य-दक्षिणा ( स्वास्थ्य-कामना ) के निमित्त यह सद्दान ( दक्षिणा ) निर्वाण प्रदान करे।

  • कुछ विद्वान उरशकी का तात्पर्य उरश देश-निवासी से लेते हैं। हो सकता है इन्तप्रिय उरश देश का मूल निवासी हो। उसका पुत्र बाहलिक नवाजये में आकर रहने लगा हो।
  • कुछ विद्वान बाहलिक का तात्पर्य बाह्लीक देश लेते हैं। यदि वस्तुतः ऐसा हो तो इन्तप्रिय के पुत्र का नाम क्या होगा और वह लेख में कहाँ है, यह विचारणीय हो जाता है।
  • धर्मराजिका से यहाँ तात्पर्य स्तूप से है, ऐसा विद्वानों का अनुमान है। दिव्यावदान में कहा गया है कि धर्मराज अशोक ने ८४,००० धर्म-राजिकाएँ स्थापित करायी थीं। इससे प्रकट होता है कि धर्मराजिका कदाचित् ऐसे स्तूपों को कहते थे जो बुद्ध ( धर्मराज ) के अस्थि-अवशेषों पर निर्मित की गयी थीं।

तक्षशिला रजतपत्र अभिलेख : महत्त्व

धार्मिक महत्त्व

बुद्ध के अवशेष की प्रतिष्ठा के उल्लेख के कारण इस अभिलेख का धार्मिक दृष्टि से जो महत्त्व है। साथ ही इसमें बौद्धधर्म से सम्बंधित कुछ पारिभाषिक शब्दों का प्रयोग तक्षशिला रजतपत्र अभिलेख का महत्त्व और बढ़ा देता है। ये शब्द हैं :-

  • बोधिसत्व,
  • सर्व बुद्ध,
  • प्रत्येक बुद्ध और
  • अर्हत।

इससे ज्ञात होता है कि बौद्ध धर्म में इनकी कल्पना इस अभिलेख के काल तक की जा चुकी थी।

बोधिसत्व :- बुद्ध प्राप्ति की राह में लगे हुए बोधिसत्व कहलाते हैं। इनका स्थान गृहस्थ से ऊपर और बुद्ध से नीचे होता है।

सर्व बुद्ध :- इसका अर्थ है मानुषी बुद्ध। इनकी संख्या आठ बतायी गयी है — शिखिन, कश्यप, कनकमुनि, क्रकुच्छंद, प्रभूतरत्न, रत्नसम्भव, विश्वभू और विपश्चिय। भरहुत स्तूप पर सप्त मानुषी बुद्धों का प्रतीकात्मक अंकन सात वृक्षों के रूप में मिलता है।

प्रत्येक बुद्ध :- वे जो बिना बुद्ध के सहयोग के बुद्धत्व को उपलब्ध होने में सक्षम होते हैं। साथ ही वे किसी अन्य को बुद्ध बनने में सहायक भी नहीं बनते प्रत्येक बुद्ध कहलाते हैं।

अर्हत :- ये रागद्वेष रहित व सर्वत्र पूजनीय होते हैं।

इसके अतिरिक्त इसमें बोधिसत्त्व-गृह ( बोधिसत्व गहमि ) का उल्लेख विचारणीय है। बौद्धधर्म के अनुसार अस्थि-अवशेष मंजूषा में रख कर स्तूपों में प्रतिष्ठापित किये जाते थे। किन्तु यहाँ उनके बोधिसत्त्व-गृह में प्रतिष्ठापित किये जाने का उल्लेख है। मंजूषा, जिस पर यह लेख अंकित है वह किसी स्तूप में नहीं, वरन् एक कमरे में पीछे की दीवार के निकट जमीन में एक फुट नीचे मिला था। इससे ज्ञात होता है कि अस्थि-अवशेष स्तूप से भिन्न कमरे जैसे किसी वास्तु में भी प्रतिष्ठापित किये जाते थे। परन्तु ऐसी बात किसी अन्य सूत्र से ज्ञात नहीं होती। यहाँ इस वस्तु को बोधिसत्त्व-गृह कहा गया है। बोधिसत्त्व बुद्धत्व प्राप्ति से पूर्व की स्थिति है। बोधिसत्त्वों की मूर्तियाँ कुषाण काल में प्राप्त होती हैं। सम्भव है, बोधिसत्त्व की इन मूर्तियों को जिस स्थान पर प्रतिष्ठित करते रहे हों उन्हें बोधिसत्व-गृह कहते हों और ऐसे ही किसी गृह में यह अस्थि-मंजूषा प्रतिष्ठापित की गयी हो।

बौद्धस्तूप के निर्माण का यहाँ उल्लेख है।इसके लिए ‘धमरइए’ शब्द का प्रयोग मिलता है।इसका अर्थ है धर्मराजिका स्तूप। परन्तु वोजेल ने इसका अर्थ किया है धर्मराजा अशोक द्वारा बनवाये गये स्तूपों में से एक। दूसरी ओर कोनो ने धर्मराजबुद्ध के अवशेष रखे जाने के लिए बने स्तूप के संदर्भ में इसका अर्थ लिया है।

राजनीतिक महत्त्व

इन धर्म-सम्बन्धी तथ्यों की अपेक्षा तक्षशिला रजतपत्र अभिलेख की चर्चा लेख में अंकित संवत्सर के साथ प्रयुक्त ‘अयस’ शब्द को लेकर की जाती रही है। जॉन मार्शल का कहना था कि ‘अयस’ अय का षष्ठी विभक्ति का रूप है और इसका प्रयोग यह व्यक्त करने के लिए किया गया है कि इस संवत्सर की स्थापना अय ( Azes ) ने की थी। इसे रैप्सन और रामप्रसाद चन्दा भी स्वीकार करते थे। परन्तु इस अवधारणा को स्वीकार करने के प्रति प्रमुख आपत्ति यह की जाती रही कि इस काल के अभिलेखों से जो परम्परा परिलक्षित होती है, उसमें संवत्सर के साथ तत्कालीन ( समसामयिक ) शासन का नाम षष्ठी विभक्तियुक्त मिलता है। उसको दृष्टिगत रखते हुए अयस का तात्पर्य होगा कि अय ( Azes ) संवत् १३६ में शासन कर रहा था और उसके साथ ही पंक्ति में उल्लिखित महाराज रजतिराज देवपुत्र खुषण भी शासक था। अय और खुषण का एक समय में एक साथ स्थान पर शासक होना सम्भव नहीं है।

अतः अन्य विद्वानों ने इसकी व्याख्या दूसरी तरह से करने की चेष्टा की थी। ल्यूडर ने यह मत प्रकट किया था कि इसका रूप अयस है और उसका अभिप्राय अय संवत्सर है। इसकी इस दिवसे के साथ तुलना की जा सकती है जिसका प्रयोग मास और दिवस के बाद इसी अभिलेख में हुआ है। लेकिन इस तरह का प्रयोग अन्यत्र ज्ञात नहीं है। अतः स्टेन कोनो ने इस आषाढ़ मास के विशेषण के रूप में ग्रहण किया और कहा कि इसका तात्पर्य ‘आद्यस्य’ है और इसका अर्थ होगा कि उस वर्ष दो आषाढ़ मास थे। यहाँ तात्पर्य पहले मास से है । उनके इस कथन में तब तक कुछ सार समझा जाता था जब तक कलवान का ताम्रलेख नहीं मिला था। इस ताम्रलेख में संवत्सरये १३४ अजस श्रवणस मसस दिवसे त्रेविशेका उल्लेख है। इसमें ‘अजस’ का प्रयोग उसी प्रकार हुआ है जिस प्रकार इस लेख में अयस का। य और ज परस्पर परिवर्तनीय हैं। अत: दोनों लेखों में अयस और अजस का तात्पर्य एक ही होगा। अस्तु, कोनो की धारणा के अनुसार कहना होगा कि संवत् १३४ में दो श्रावण और दो वर्ष बाद १३६ में दो आषाढ़ थे। यह भारतीय पंचांगों की दृष्टि से असम्भव है। अतः बनर्जीशास्त्री ने यह मत प्रतिपादित किया कि अयस का तात्पर्य आर्यस्य है। उन्होंने अनेक सूत्रों से स्पष्ट करने का प्रयास किया कि आषाढ़ और श्रावण मासों की विशेष महत्ता थी। अभिधानराजेन्द्र कोष में इन दोनों मासों को आर्याषाढ़ कहा गया है। तदनुसार इस शब्द से संवत्सर के स्वरूप पर कोई प्रकाश नहीं पड़ता और उनकी गुत्थी नहीं सुलझती।

बाजौर अस्थि-मंजूषा अभिलेख के प्रकाश में आ जाने के बाद ये सारी कल्पनाएँ निस्सार हो गयीं और यह स्पष्ट हो गया कि जान मार्शल, रैप्सन और रामप्रसाद ने अय नामक शासक के साथ सम्बन्ध जोड़ने की जो बात कही थी, वही ठीक है। इस संवत्सर की गणना अय ( प्रथम ) के काल से आरम्भ हुई थी।

अभिलेख की अन्य उल्लेखनीय बात ‘महाराज रजतिराज देवपुत्र खुषण’ का उल्लेख है । महाराज रजतिराज देवपुत्र कुषाण-शासकों का सुप्रसिद्ध विरुद है जो प्रायः अभिलेखों में पाया जाता है। खुषण शब्द भी ‘कुषाण’ की ओर ही संकेत करता है।’ सामान्यतः विरुद के बाद शासक का नाम पाया जाता है, ऐसी अवस्था में खुषण शासक का नाम समझा जा सकता है। पर कुषाण-शासक का नाम न होकर वंश अथवा कुल का नाम है। ऐसी अवस्था में यह प्रयोग कुछ आश्चर्यजनक है। इसका एक ही समाधान हो सकता है कि अभिलेख को लिखवानेवाला व्यक्ति शासक के नाम से अपरिचित रहा होगा। वस्तुस्थिति जो भी हो, यदि इस अभिलेख में अभिप्राय किसी कुषाण-शासक से है तो यह निर्णय करना सहज नहीं है कि ज्ञात कुषाण-शासकों में से वह कौन था।

लेख के अन्त में नन्दिपद सदृश एक चिह्न है जो कुजुल कडफिसेस, विम कडफिसेस और झियोनिस के सिक्कों पर भी मिलता है। यह चिह्न यदि किसी प्रकार ‘खुषण’ शासक के पहचानने में सहायक हो सकता है तो उसे इन्हीं शासकों में से किसी को मानना होगा। स्टेन कोनो अभिलेख में इस चिह्न के अंकन को कुषाण राज्य के तक्षशिला तक विस्तार के सम्बद्ध अनुमानित करते हैं ।

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