स्कंदगुप्त का जूनागढ़ अभिलेख

भूमिका

स्कंदगुप्त का जूनागढ़ अभिलेख सौराष्ट्र में जूनागढ़ से एक मील पूरब स्थित गिरनार नामक पर्वत के उस प्रस्तर खण्ड पर यह लेख अंकित है, जिस पर महाक्षत्रप रुद्रमदामान का प्रख्यात अभिलेख है। इसके ज्ञात होने की सूचना सर्वप्रथम १८३८ ई० में जेम्स प्रिंसेप ने प्रकाशित की थी। १८४३ ई० में रायल एशियाटिक सोसाइटी की बम्बई शाखा के सम्मुख इसकी एक प्रतिलिपि प्रस्तुत की गयी, जिसे जनरल सर जार्ज लीग्रैण्ड जेकब तथा एन० एल० वेस्टरगार्ड ने तैयार की थी। यह प्रतिलिपि १८४४ ई० में प्रकाशित हुई। १८६३ ई० में भाऊ दाजी ने अंग्रेजी अनुवाद के साथ इस लेख का अपना पाठ प्रस्तुत किया। तत्पश्चात् एगलिंग ने उनके पाठ में संशोधन किया। अन्त में जे० एफ० फ्लीट ने इसे सम्पादित कर Corpus apInscriptionum Indicarum में प्रकाशित किया।

संक्षिप्त परिचय

नाम :- स्कंदगुप्त का जूनागढ़ अभिलेख [ Junagarh Inscription of Skandgupta ]

स्थान :- जूनागढ़, गुजरात

भाषा :- संस्कृत

लिपि :- दक्षिणी ब्राह्मी

समय :- गुप्त सम्वत् १३६, १३७ और १३८ ( ४५५, ४५६ और ४५७ ई० ), स्कंदगुप्त का शासनकाल

विषय :- पुरपाल चक्रपालित द्वारा सुदर्शन झील के बाँध का पुनर्निर्माण, भगवान विष्णु के मंदिर का निर्माण।

मूलपाठ

१. ॐ सिद्धम्॥

श्रियमभिमतभोग्यां नैककालापनीतां त्रिदश[प]ति-सुखार्थं यो बलेराजहार[।]

कमल-निलयनायाः शाश्वतं धाम लक्ष्म्याः

२. स जयति विजितार्त्तिर्विष्णुरवन्त जिष्णुः [॥ १]

तदनु जयति शश्वत् श्री-[पति]क्षिप्त-वक्षाः स्वभुज-जनित-वीर्यो

राजराजाधिराजः [I]

नरपति-

३. भुजगानां मानदर्प्पोत्फणानां प्रतिकृति-गरूणा[ज्ञां] निर्व्विषीं चावकर्ता [॥ २]

नृपति-गुण-निकेतः स्कन्दगुप्तः पृथु-श्रीः चतुरु[दधि-जल ]ान्तां

स्फीत-पर्यन्त-देशा[।]

४. अवनिमवनतारिर्यः चकारात्म-संस्थां

पितरि सुरसखित्वं [प्राप्त]वत्यात्म शक्त्या[॥ ३]

अपि च जितमेव तेन प्रथयन्ति यशांसि यस्य रिपवो(ऽ)पि [।]

आमूल-भग्न-दर्प्पा नि[र्वचन] [सर्व]देशेषु [॥४]

  • भंडारकर महोदय ने इसको नि[वर्तिता] पढ़ा है।

५. क्रमेण बुद्ध्या निपुणं प्रधा[र्य] ध्यात्वा च कृत्स्नान्गुण-[दोष हेतून्] [।]

व्यपेत्य सर्व्वन्मनुजेन्द्र-पुत्रांल्लक्ष्मीः [स्वयं] यं वरयांचकर [॥ ५]

[त]स्मिन्नृपे शासति नैव कश्चिद्ध[र्म्मा]दपेतो मनुजः प्रजासु।

६. [आर्त्तो]दरिद्रो व्यसनी कदर्यो दण्डेन वा यो भृश-पीडितः स्यात् [॥ ६]

एवं स जित्वा पृथिवीं समग्रां भग्नाग्र-द[र्पान्] द्विषतश्च कृत्वा।

सर्व्वेषु देशेषु विधाय गोप्तृन् संचिन्तया[मा]स-बहु प्रकारम् [॥ ७]

स्यात्को(ऽ)नुरूपो

७.              मतिमान्विनितो मेघा स्मृतिभ्यामनपे [त-भा]वः [।]

सत्यार्जवौदार्य-नयोपप[न्नो]।     [माधुर्य]-दाक्षिण्य[य]शोन्वितश्च [॥ ८]

भक्तो(ऽ)नुरक्तो नृ-[विशे]ष-युक्तः सर्व्वोपधाभिश्च विशुद्ध-बुद्धिः।

आनृण्य-भावोपगतान्तरात्माः सर्व्वस्य लोकस्य हिते प्रवृत्तः [॥ ९]

८. न्यायार्जने(ऽ)र्थस्य च कः समर्थः स्यादर्जितस्याप्यथ रक्षणे च।

गोपायितस्यापि [चा] वृद्धि-हेतौ वृद्धस्य पात्र-प्रतिपादनाय [॥ १०]

सर्व्वेषु भृत्येष्वपि संहतेषु यो मे प्रशिष्यान्निखिलान्सुराष्ट्रान्।

आं ज्ञातमेकः खलु पर्णदत्तो भारस्य तस्योद्वहने समर्थः [॥ ११]

९. एवं विनिश्चत्य नृपाधिपेन नैकानहो-रात्र-गणन्स्व-मत्या।

यः    नियुक्तो(ऽ)र्थनया कथंचित् सम्यक्सुराष्ट्रावनि-पालनाय [॥ १२]

नियुज्य देवा वरुणं प्रतीच्यां स्वस्था यथा नोन्मनसो बभूवुः [।]

पूर्व्वेतरस्यां दिशि पर्णदत्तं नियुज्य राजा धृतिमांस्तथाभूत् [॥ १३]

१०. तस्यात्मजो ह्यात्मज-भाव-युक्तो द्विधेव चात्मात्म-वशेन नीतः।

सर्व्वात्मनात्मेव च रक्षणीयो नित्यात्मवानात्मज-कान्त-रूपः [॥ १४]

रूपानुरूपैर्ललितैर्विचित्रैः नित्य-प्रमोदान्वित-सर्वभावः।

प्रबुद्ध-पद्माकर-पद्मवक्तो नृणां शरण्यः शरणागतानाम् [॥ १५]

११. अभवद्भुवि चक्रपालितो(ऽ)साविति नाम्ना प्रथितः प्रियो जनस्य।

स्वगुणैरनुपस्कृतैरुदात्तैः पितरं यश्य विशेषयांचकार [॥ १६]

क्षमा प्रभुत्वं विनयोनयश्च शौर्यं विना शौर्य-महार्चनं च।

दाक्ष्यं दमो दानमदीनता च दक्षिण्यमानृण्यमशून्यता च [॥ १७]

सौदर्यमार्येतर-निग्रहश्च अविस्मयो धैर्य्यमुदीर्णता च।

  • भंडारकर महोदय ने इसको ‘वा(?)क्यं’ पढ़ा है।

१२. इत्येवमेते(ऽ) तिशयेन यस्मिन्नविप्रवासेन गुणा वसन्ति [॥ १८]

न विद्यते(ऽ) सौ सकले(ऽ)पि लोके यत्रोपमा तस्य गुणैः क्रियेत।

स एव कार्त्स्न्येन गुणान्वितानां बभूव नृणामुपमान-भूतः [॥ १९]

इत्येवमेतानधिकानतो(ऽ) न्यान्गुणान्प[री]क्ष्य स्वयमेव पित्रा।

यः संनियुक्तो नगरस्य रक्षां विशिष्य पूर्वान्प्रचकार सम्यक् [॥२०]

१३. आश्रित्य वीर्य [स्वभु]ज-द्वयस्य स्वस्यैव नरस्य दर्प।

नोद्वेजयामास कंचिदेवमस्मिन्पुरे चैव शशास दुष्टाः [॥ २१]

विस्रब्धमल्पेन शशाप्म यो(ऽ)स्मिन् कालेन लोकेषु सनागरेषु।

यो लालयामास च पौरवर्गान् [स्वस्येव ] पुत्रान्सुपरीक्ष्य दोषान् [॥ २२]

संरंजयां प्रकृतीर्बभूव पूर्व्व-स्मिताभाषण-मान-दानैः।

१४. निर्यन्त्रणान्योन्य-गृह-प्रवेशेः संवर्द्धित-प्रीति-गृहोपचारैः [॥ २३]

ब्राह्मण्य-भावेन परेण युक्तः[श]क्तः शुचिर्दानपरो यथावत्।

प्राप्यान्स काले विषयान्सिषेवे धर्मार्थयोश्चा[प्य]विरोधनेन [॥ २४]

[यो— …  — — …  … पर्णदत्ता]त्स न्यायवानत्र किमस्ति चित्रं।

मुक्ता-कलापाम्बुज-पद्म-शीताच्चन्द्रात्किमुष्णं भविता कदाचित् [॥ २५]

१५. अथा क्रमेणाम्बुद-काल आग[ते] [नि]दाघ कालं प्रविदार्य तोयदैः।

ववर्ष तोयं बहु संततं चिरं सुदर्शनं येन बिभेद चात्वरात् [॥ २६]

संवत्सराणामधिके शते तु त्रिंशद्भिरन्यैरपि षड्भिरेव।

रात्रौ दिने प्रौष्ठपदस्य षष्ठे गुप्त-प्रकाले गणनां विधाय [॥ २७]

१६. इमाश्च या रैवकाताद्विनिर्गताः पालासिनीयं शिकता-विलाशिनी।

समुद्र-कान्ताः चिर-बन्धनोषिताः पुनः पतिं शास्त्र-यथोचितं ययुः [॥ २८]

अवेक्ष्य वर्षागमजं महोद्भ्रमं महोदधेरूर्जयता प्रियेप्सुना।

अनेक-तीरान्तज-पुष्प-शोभितो

१७.                     नदीमयो हस्त इव प्रसारितः [॥ २९]

विषाद्य[मानाः] खलु सर्वतो [ज]नाः कथं-कथं कार्यमिति प्रवादिनः।

मिथो हि पूर्वापर-रात्रमुत्थिता विचिन्तयां चापि बभूवुरुत्सुकाः [॥ ३०]

अपीह लोके सकले सुदर्शनं पुमां हि दुर्दर्शनतां गत क्षणात्।

१८. भवेन्नु सो(ऽ)म्भोनिधि तुल्य दर्शनं सदर्शन— …  …  — …  — … — [॥ ३१]

…  — … —  — … वणे स भूत्वा पितुः परां भक्तिमपि प्रदर्श्य [।]

धर्म पुरो-धाय शुभानुबन्धं राज्ञो हितार्थं नगरस्य चैव [॥ ३२]

संवत्सराणामधिके शते तु

१९.                   त्रिंशद्भिरन्यैरपि सप्तभिश्च।

[गुप्त- प्रकाले] [नय]-शास्त्र-वेत्ता [विश्वे](ऽ) प्यनुज्ञात-महाप्रभावः [॥ ३३]

आज्य-प्रणामैः विबुधानथेष्ट्वा धनैर्द्विजातीनपि तर्पयित्वा।

पौरांस्तथाभ्यर्च्य यथार्हमानैः भृत्यांश्च पूज्यान्सुहृदश्च दानैः [॥ ३४]

२०. ग्रैष्मस्य मासस्य तु पूर्व-प[क्षे] …  — … —  — [प्र]थमे(ऽ)ह्नि सम्यक्।

मास-द्वेनादरवान्य भूत्वा धनस्य कृत्वा व्ययमप्रमेयम् [॥ ३५]

आयामतो हस्त-शतं समग्रं विस्तारतः षष्टिरथापि चाष्टौ।

२१. उत्सेधतो(ऽ)न्यत् पुरुषाणि [सप्त ?]  …  —  …  — [ह]स्त-शत-द्वयस्य [॥ ३६]

बबन्ध यत्रान्महता नृदेवान[भ्यर्च्य ?] सभ्यग्धटितोपलेन।

अ-जाति-दुष्टम्प्रथितं तटाकं सुदर्शनं शाश्वत-कल्प-कालम् [॥ ३७]

२२. अपि च सुदृढ-सेतु-प्रान्त(?) -विन्यस्त-शोभ-रथचरणसमाह्व क्रौंचहंसास-धूतम्।

विमल-सलिल —  —  — …  —  — … भुवित  …  …  …  —  —  — द[—]

                                        (ऽ)र्कः शशी च [॥ ३८]

२३. नहरमपि च भूयाद्वृद्धिमत्पौर-जुष्टं द्विजबहुशतगीत-ब्रह्म-निनंष्ट-पाप।

शतमपि च समानामीति-दुर्भिक्ष-[मुक्त] …  …  …  …  …  …  —  —  —

                                   …  —  —  …  —  — [॥ ३९]

[इति] [सु]दर्शन-तटाक-संस्कार-ग्रन्थ रचना [स]माप्त

X                           X                         X

२४. दृप्तारि-दर्प-प्रणुदः पृथु-श्रियः स्व-वङ्श-केतोः सकलावनी-पतेः।

राजाधिराज्याद्भुत-पुण्य-[कर्मणः] …  — …  —  — …  …  — …  — …  — [॥ ४०]

—  — …  —  — …  …  — …  — …  — …  — …  —  — …  …  — —   [।]

द्वीपस्य गोप्ता महतां च नेता दण्ड-स्थि[ता] नां

२५.                                     द्विषतां दमाय [॥ ४१]

तस्यात्मजेनात्मगुणान्वितेन गोविन्द-पादार्पित-जीवितेन।

—  — …  —  — …  …  — …  — …  — …  — …  —  — …  …  — —   [॥ ४२]

—  — …  —  — …  …  — …  — …  — ग्धं विष्णोश्च पादकमले समवाप्य

तत्र।

२६. अर्थव्ययेन

           महता महता च काले नात्म-प्रभाव-नत-पौर जनेन तेन [॥ ४३]

चक्रं विभर्ति रिपु — … …  — … — …  …  — …  — …  — …  —  — [।]

—  — … — — — … — … — — … — — तस्यस्वतंत्र-विधि-कारण-मानुषस्य [॥ ४४ ]

२७. कारितमवक्र-मतिना चक्रभृतः चक्रपालितेन गृहं।

वर्षशते(ऽ)ष्टात्रिंशे गुप्तानां काल-[क्रग-गणिते] [॥ ४५]

—  — …  —  — …  …  — …  — …  — …  —

                            …. … … … …  — … — …  — — [।]

२८. — [स]र्थमुत्थितमिवोर्जयतो(ऽ)चलस्य कुर्वत्प्रभुत्वमिव भाति पुरस्य मूर्ध्नि [॥ ४६]

अन्यच्य मूर्ध्दिनि सु —  — …  —  — …  …  — …  — …  — …  —

                                 …  …  — …  — …  — …  — [।]

—  — …  —  — …  … रुद्ध विहंग मार्गं विभ्राजते …  …  … — … …

                                               — … — — [॥ ४७ ]

हिन्दी अनुवाद

ॐ। सिद्धि प्राप्त हो। समर्थ जनों के द्वारा भोग्या, चिरकाल से अपहृत लक्ष्मी को सुरपति (इन्द्र) के सुखार्थ बलि से छीन लेनेवाले, कमल में निवास करनेवाली लक्ष्मी के चिरन्तन विश्रामस्थल, सकल दुःखों के निवारक, निरन्तर जयी भगवान् विष्णु की जय। १

अब! [राज]लक्ष्मी द्वारा निरन्तर आलिंगित वक्षस्थलवाले, अपने भुजबल से अर्जित विक्रमवाले, मान और अहंकार से अपने फर्णों के उठानेवाले नरपतियों को विष-शून्य कर देनेवाली गरुड़ [लांछित] आज्ञा प्रदान करनेवाले, महाराजाधिराज [स्कन्दगुप्त] की जय। २

राजोचित गुणों के आगार, विपुल राज्यश्रीवाले, शत्रुओं को पराजित करनेवाले, स्कन्दगुप्त ने अपने पिता के दिवंगत (देवताओं के मित्र) होने पर अपनी शक्ति से चतुःसमुद्रपर्यन्त वसुन्धरा पर अपना एकाधिपत्य स्थापित कर लिया। ३

यही नहीं सर्व देशवासी [शत्रु] भी अपना दर्प और अहंकार चूर हो जाने के कारण [मूक भाव से] उसका (स्कन्दगुप्त का) यशोगान कर स्वीकार करते हैं कि वह विजयी है। ४

यथासमय (क्रमेण) राजलक्ष्मी ने भी अपने विवेक से भलीभाँति सोच-विचार कर गुणों के सभी पहलुओं का चिन्तन करके, अन्य सभी राज पुत्रों की उपेक्षा कर स्कन्दगुप्त का स्वेच्छया वरण किया। ५

उस राजा [स्कन्दगुप्त] के शासन काल में प्रजा का कोई भी व्यक्ति अपने धर्म से च्युत नहीं होता, कोई दरिद्र, दुर्व्यसनी और कदर्य से पीड़ित नहीं है और न किसी दण्डनीय को अनावश्यक पीड़ित किया जाता है। ६

इस प्रकार समस्त भूमण्डल पर विजय प्राप्त कर और शत्रुओं के गर्व चूर कर लेने के बाद अपने सभी देशों में गोप्ता नियुक्त करने के पश्चात् वे (स्कन्दगुप्त) सोचने लगे कि [मेरे राज-कर्मचारियों में] कौन ऐसा है जो [मेरे] अनुरूप बुद्धिमान्, नम्र, प्रज्ञ एवं स्मरण-शक्ति से युक्त, सत्यता, सरलता, उदारता और विनम्रता-सम्पन्न, मधुरता, दक्षता और यशस्विता प्रभृति गुणों से सम्पन्न है; [ऐसा कौन है] जो [राज्य के] प्रति निष्ठ, अनुरागी, विशिष्ट सहायक-समुदाय से सम्पन्न, सभी बातों को देखते हुए परिष्कृत बुद्धिवाला, प्रत्युपकार की भावना से प्रेरित और समस्त प्रजावर्ग के कल्याण में तत्पर हो; जो न्यायपूर्ण भाव से धनोपार्जन में दक्ष, उपार्जित धन के संरक्षण में कुशल, संरक्षित धन के संवर्धन में समर्थ हो और सम्वर्धित सम्पत्ति को सत्पात्रों में वितरण करने के लिये तत्पर रहे। समस्त अनुचर वर्ग में ऐसा कौन है जो समूचे सुराष्ट्र प्रदेश का योग्यतापूर्वक शासन कर सके! अच्छा समझा! केवल पर्णदत्त ही इस भार को सफलतापूर्वक बहन करने में समर्थ हो सकता है। कई दिनों तक इस प्रकार, ऊहापोह करने के बाद [स्कन्दगुप्त ने] सुराष्ट्र प्रदेश के परिपालन के लिये पर्णदत्त को नियुक्त किया। ७-१२

जिस तरह पश्चिम दिशा में वरुणदेव को नियुक्त कर देवता लोग प्रकृतिस्थ और निश्चिन्त हैं, उसी प्रकार राज्य के पश्चिमी प्रदेश (सुराष्ट्र) में पर्णदत्त को नियुक्त कर [स्कन्दगुप्त भी] निश्चिन्त हो गये। १३

आदर्श पुत्र के गुणों से युक्त जितेन्द्रिय, पिता का प्रतिरूप, सभी आत्माओं में अपनी आत्मा के समान रक्षणीय, कामदेव के समान सुन्दर [उस पर्णदत्त का पुत्र चक्रपालित था]। १४

वह सदैव प्रसन्न रहनेवाला तथा अपने रूप के अनुकूल ही ललित एवं विविध भावनाओं से युक्त, कमलवत् प्रफुल्ल-मुख और शरण में आये हुए लोगों का वह शरण-स्थल था। १५

वह चक्रपालित भू-मण्डल में सब जनों का प्रिय बना और अपने उदात्त एवं निष्कलंक गुणों के कारण वह अपने पिता से भी आगे बढ़ गया। १६

क्षमा, प्रभुत्व, विनय, नय, शौर्य, वीरों के प्रति आदरभाव, दक्षता, संयम, दान, विशालता, सौन्दर्य, अनौचित्य पर निग्रह, अविस्मय, धैर्य एवं उदारता [प्रभृति] गुण उसमें समाहित थे। १७-१८

सम्पूर्ण विश्व में ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं है, जिसके गुणों के साथ चक्रपालित के गुणों की तुलना की जा सके। वह स्वयं विश्व में गुणवान् व्यक्तियों के लिये उपमान स्वरूप है। १९

इन गुणों तथा इनसे भी बढ़कर अन्य गुणों की स्वयं परीक्षा कर उसके पिता ने ही उसे नगर (गिरिनगर = आधुनिक गिरनार) की रक्षा के निमित्त नियुक्त किया। उसने अपने उत्तरदायित्व का निर्वाह अपने पूर्ववर्तियों से भी बढ़कर अच्छे ढंग से किया। २०

वह बिना किसी अन्य व्यक्ति की सहायता के स्वयं अपने दोनों बाहुओं के बल से नगर के किसी व्यक्ति को सताये बिना दुष्टों का दमन करता रहा। २१

अल्प काल में ही वह पूर्ण विश्वास के साथ लोक और नगर निवासियों पर शासन करने लगा और हर वर्ग के पुर-वासियों के [गुण और] दोषों से परिचित होकर पुत्रवत् पालन करता रहा। २२

प्रजाजनों को ही नहीं, अपने मैत्रिवर्ग को भी और भरे मधुर वचन, सम्मानसूचक उपहारों आदि से तथा उनके घरों में प्रतिबन्धरहित आ-जाकर तथा प्रेम बढ़ाकर अपने व्यवहारों से प्रसन्न रखता रहा। २३

वह सात्विक भाव से सम्पन्न, मृदु, पवित्र और दानशीलता के साथ धर्म और अर्थ का ताल-मेल रखता हुआ विषय-भोग करता रहा। २४

न्यायमूर्ति पर्णदत्त का आत्मज चक्रपालित भी यदि उसकी भाँति न्यायप्रिय हो तो आश्चर्य जैसी कोई बात नहीं। भला मुक्ता-कलाप और जल-कमल के समान शीतल शीतांशु से कभी उष्णता सम्भव है! २५

आगे! काल-चक्र के क्रम में, [एक समय] बादलों द्वारा ग्रीष्म ऋतु को विदीर्ण कर वर्षा ऋतु के आने पर बहुत समय तक लगातार घनघोर वर्षा होती रही; फलस्वरूप अचानक सुदर्शन झील टूट। २६

[यह घटना] गुप्त-सम्वत् की गणना के अनुसार १३६वें संवत्सर के भाद्रपद की षष्ठी-तिथि की रात में घटी। २७

रैवतक पर्वत से निकलनेवाली समुद्र-पत्नी-स्वरूपा पलाशिनी, सिकता और विलासिनी नामक नदियाँ, जो सुदर्शन झील द्वारा बाँधकर रखी गयी थीं, मुक्त होकर शास्त्रविहित ढंग से पातिव्रत्य-पालन के निमित्त अपने पति [समुद्र] से जा मिलीं। २८

वर्षाधिक्य के कारण महोदधि (समुद्र) की प्रिया (पलाशिनी नदी) की तीव्र व्याकुलता देखकर उर्जयत् पर्वत भी तटवर्ती वृक्षों के च्युत-पुष्पों से पूरित नदीरूपी अपने हाथ से समुद्र को सहारा देने लगा। २९

जलाप्लावन से सभी लोग दुःखी हो उठे। क्या होगा? क्या किया जाय? इस प्रकार उस रात के पिछले पहर सभी लोग चिन्ताग्रस्त हो गये। ३०

तब तक किसी ने भी कल्पना न की थी कि एक ही क्षण में सुदर्शन झील टूटकर दुदर्शन हो जायेगा और अपार सागर के समान दिखायी देने लगेगा। ३१

राजा और नगर के कल्याण के निमित्त अपने पिता पर्णदत्त के प्रति पूर्ण निष्ठा प्रदर्शित करते हुए, शुभ फल देनेवाले धर्म का ध्यान कर नीति-शास्त्र के मर्मज्ञ और विश्वविख्यात प्रतापी चक्रपालित ने गुप्त सम्वत् के १३७वें वर्ष में घृत और स्तुतियों के द्वारा देवताओं को आहुति-प्रदान और प्रणति समर्पण कर, नाना प्रकार के धन से विप्रवरों को तृप्त करके, यथायोग्य सम्मान और दान आदि से नागरिकों, सेवकों, गुरुजनों और मित्रों की अभ्यर्थना करके, अपरिमित धन व्यय कर दो महीने के घोर प्रयास से ज्येष्ठ कृष्ण प्रतिपदा के दिन [सुदर्शन झील की] मरम्मत करायी। ३२-३५

सुदर्शन झील की दरार बन्द करने और मरम्मत के परिणामस्वरूप वह अब एक सौ हाथ लम्बा, अड़सठ हाथ चौड़ी, सात पुरुष के बराबर ऊँची और दो सौ हाथ गहरी बन गयी। ३६

उसने (चक्रपालित) मनुष्यों और देवों (अथवा ब्राह्मणों) की अर्चना करके, अच्छी तरह गढ़े गये पत्थरों से, स्वभावतः निर्दुष्ट और विश्वविख्यात, सुदर्शन झील को, अकथनीय यत्नपूर्वक, सर्वदा के लिए स्थायी बना दिया। ३७

तदन्तर, सुदृढ़ बाँध (सेतु), सीढ़ियों के कारण सुन्दर किनारोंवाली तथा चक्रवाक, कौञ्च और हंस के पंखों से कम्पित निर्मल जलवाली सुदर्शन झील इस पृथ्वी पर तब तक स्थायित्व प्राप्त करे जब तक गगन मण्डल में सूर्य और चन्द्र विद्यमान रहें। ३८

शताधिक ब्राह्मणों के अनवरत साम-गान से पूर्णतः पापरहित, अकाल एवं अवर्षण आदि इतियों से मुक्त होकर सुदर्शन झील समीपवर्ती नगर के उन्नतिशील प्रजावर्ग से सैकड़ों वर्ष तक समृद्ध होता रहे। ३९

इस प्रकार सुदर्शन झील के जीर्णोद्धार सम्बन्धी यह ग्रन्थ समाप्त होता है।

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जिसने शत्रुओं के गर्व को चूर कर दिया था, जिसका प्रताप महान् है, जो अपने वंश का केतु और जो सम्पूर्ण पृथ्वी का स्वामी है तथा जिसके धार्मिक कार्य उसके राजाधिराज होने से भी अधिक आश्चर्यजनक हैं ……..। ……. उस द्वीप का गोप्ता एवं महान् पुरुषों का नेता था; भयंकर सेनाओं वाले शत्रुओं के दमन के लिये जो पर्याप्त था; उसका पुत्र अपने विशेष गुणों से युक्त था। उसने गोविन्द के पैरों की पूजा में अपना जीवन समर्पित कर दिया था। ……….. । ४०-४२

विष्णु के चरण-कमलों में उसने अपने-आपको तल्लीन कर दिया था। उसने बहुत-सा अर्थ-व्यय और समय लगा छोटे-बड़े (महता-अमहता) पुरवासियों को अपने मत में कर चक्रधारी विष्णु के [मन्दिर का निर्माण कराया] ………. अपने अन्तःकरण के अनुसार कार्य करने वाले मनुष्य (चक्रपालित) द्वारा बनवाये गृह (मन्दिर) में चक्र-भृत [की मूर्ति अथवा मन्दिर] [की स्थापना] के समय गुप्त सम्वत् में गणना करने पर एक सौ अड़तीस (१३८) वर्ष व्यतीत हो गये थे। ४३-४५

…………… लगता था मानो यह [मन्दिर] ऊर्जयत् [पर्वत] के साथ ही ऊपर उठ आया हो। नगर के शीर्ष-बिन्दु पर स्वामित्व करता-सा वह देवालय सुशोभित था।

और एक दूसरा भी …….. शीर्ष-स्थान पर ……. पक्षियों के मार्ग का अवरोध करता हुआ ……… सुशोभित था ………. ।

ऐतिहासिक महत्त्व

जूनागढ़ स्थित गिरनार पर्वत से ही हमको सम्राट अशोक के बृहद् चतुर्दश शिला प्रज्ञापन और रुद्रदामन का गिरनार अभिलेख मिलता है। रुद्रदामन के अभिलेख से हमें एक महत्त्वपूर्ण जो सूचना मिलती है वह है सुदर्शन झील का निर्माण और पुनर्निर्माण। इस इतिहास प्रसिद्ध झील का निर्माण चन्द्रगुप्त मौर्य के शासनकाल में किया गया था और इससे नहरें/नालियाँ सम्राट अशोक के समय में निकाली गयी थीं। पुनः जब वर्षा जलाधिक्य से यह झील क्षतिग्रस्त हो गयी तो रूद्रदामन ने इसका पुनर्निर्माण करवाया था। ये समस्त जानकारी हमें रुद्रदामन के जूनागढ़ अभिलेख से प्राप्त होती है।

स्कंदगुप्त का जूनागढ़ अभिलेख से यह सूचना प्राप्त होती है कि उसके शासनकाल में गुप्त सम्वत् १३६ ( ४५५ ई० ) में भाद्रपद की षष्ठी की रात्रि में घनघोर वर्षा होने से सुदर्शन झील का बाँध पुनः टूट गया और जलप्लावन उत्पन्न हो गया। उस समय चक्रपालित ने, जो सुराष्ट्र के गोप्ता पर्णदत्त का पुत्र था और पिता की ओर से गिरिनगर के प्रशासन के लिये नियुक्त था, टूटी हुई दरार को बन्द कराकर एक नया बाँध बनवाया जो १०० हाथ लम्बा ६८ हाथ चौड़ा और सात पोरिसा (ऊँचाई नापने के लिए पुरुष की ऊँचाई के बराबर का नाप। ऊँचा था। इस लेख में झील के इसी पुनर्निर्माण का वर्णन है इसे इसके रचयिता ने सुदर्शन तटाक-संस्कार-ग्रन्थ नाम दिया है।

इस सुदर्शन-तटाक (झील) की अवस्थिति की खोज का प्रयास सर्वप्रथम भगवानलाल इन्द्रजी ने किया था। उनकी धारणा थी कि वह गिरनार पर्वत से पूर्व उस स्थान पर रहा होगा जो अब भवनाथून मकुन (दर्रा) कहा जाता है। उसे उन्होंने तथाकथित दामोदर कुण्ड से कुछ ऊपर मुसलमान फकीर जरस की दरगाह के सामने बताया था। तदनन्तर ए० जमशेदजी ने इस सम्बन्ध में खोज करने की चेष्टा की। फिर शम्भुप्रसाद देसाई ने अपने सौराष्ट्र के इतिहास में यह अनुमान प्रकट किया कि यह झील त्रिपुरसुन्दरीदेवी के मन्दिर और त्रिवेणी संगम के बीच, जहाँ पलाशिनी और सोनरेखा (सुवर्ण-सिक्ता) नदियाँ मिलती हैं, स्थित था। कुछ दिनों पूर्व आर० एन० मेहता ने इस क्षेत्र का विस्तृत सर्वेक्षण किया। इस सर्वेक्षण में उन्हें त्रिवेणी संगम से लगभग दो सौ मीटर आगे बढ़ने पर नदी के दाहिने किनारे पर मिट्टी के बाँध के अवशेष मिले जो जोगानियों पर्वत को जोड़ते हैं। इसी प्रकार बायें किनारे पर आगे बढ़कर १० मीटर ऊँचे बाँध के अवशेष मिले जो तल में १०० मीटर और सिरे पर ११ मीटर चौड़े हैं। यह बाँध उत्तर-दक्षिण जाकर पूरब की ओर मुड़ जाता है और दाहिने तटवाले बाँध की अवशेष के सीध में पड़ता है। उनका अनुमान है कि स्कन्दगुप्त के काल में इसी बाँध को बनाया गया होगा। इसके पानी का निकास अभिलेख के पास ही है जो पानी के स्तर से ऊपर अंकित किया गया था। आर० एन० मेहता का कहना है कि यह झील ओझट नदी की शाखाओं के ऊपर बनायी गयी है। सम्भवतः यह ओझट, ऊर्जयत है जिसका उल्लेख पर्वत के रूप में हुआ है। यह नदी कदाचित् ऊर्जयत पर्वत से निकलती रही होगी।

सुदर्शन-तटाक-संस्कार-ग्रन्थ की समाप्ति के बाद भी तीन पंक्तियाँ लिखी गयी हैं। ये पंक्तियाँ काफी क्षतिग्रस्त हैं जो कुछ उपलब्ध है उनसे अनुमान किया जा सकता है कि गुप्त सम्वत् १३८ ( ४५७ ई० ) में चक्रपालित ऊर्जयत पर्वत पर भगवान विष्णु का कोई मन्दिर निर्मित करवायाथा।

स्कंदगुप्त का जूनागढ़ अभिलेख सुदर्शन झील की मरम्मत और विष्णु मन्दिर के निर्माण की सूचना प्रस्तुत करने के साथ के जन-जीवन पर भी प्रकाश डालता है।

श्लोक-३ में स्कन्दगुप्त के सम्बन्ध में कहा गया है कि पिता (कुमारगुप्त प्रथम) के दिवंगत होने पर उसने अपनी शक्ति से समग्र देश पर अपना एकाधिपत्य स्थापित कर लिया इन शब्दों का सामान्य भाव यही है कि उसने अपने पिता से दाय स्वरूप प्राप्त विस्तृत राज्य का शासन-भार योग्यतापूर्वक सँभाल लिया।

श्लोक-४ का अन्तिम भाग मूल रूप में अत्यन्त अस्पष्ट है इस अंश का पाठ जे० एफ० फ्लीट ने अनुमान के सहारे निर्वचना म्लेच्छ देशेषु और भण्डारकर ने निवृत्ता म्लेच्छ देशेषु दिया है। उनका अनुमान किसी प्रकार निःसन्दिग्ध नहीं कहा जा सकता। सभी विद्वानों ने इन पाठों को आँख मूँदकर स्वीकार कर लिया है और इसके सहारे उन सबकी धारणा है कि म्लेच्छ देश के शत्रुओं के दर्प का उन्मूलन कर स्कन्दगुप्त ने उन्हें अपनी विजय स्वीकार करने पर बाध्य किया था। इसके साथ ही उनकी यह भी धारणा है कि म्लेच्छों से तात्पर्य यहाँ भितरी अभिलेख में उल्लिखित हूणों से है। वस्तुतः, जैसा कि सोहोनी ने कहा है, देशेषु से पूर्व म्लेच्छ पाठ का कोई आधार नहीं है। विदेशियों के लिये म्लेच्छ शब्द का प्रयोग गुप्त-काल में होने लगा था, किसी सूत्र से ज्ञात नहीं होता। यह प्रयोग बहुत बाद का है। सोहोनी ने देशेषु से पूर्व सर्व होने की कल्पना की है। उनकी यह कल्पना अधिक तर्कसंगत जान पड़ती है। इस रूप में इस श्लोक में भी स्कन्दगुप्त की सामान्यरूपेण प्रशंसा मात्र है, उसमें उसके किसी विजय का संकेत नहीं है। किन्तु यदि यहाँ संकेत किसी शत्रु-देश विशेष से ही रहा हो, तो वह शत्रु हूण ही थे, जैसा कि अब तक समझा जाता है, निश्चयात्मक रूप से नहीं कहा जा सकता। ये विदेशी शत्रु हूण न होकर किदार कुषाण भी हो सकते हैं। स्कन्दगुप्त के समय वे पंजाब में उपस्थित थे, ऐसा अनुमान पाकिस्तान स्थित शेखूपुरा जिले में मिले सोने के सिक्कों के एक निखात से होता है जिसमें स्कन्दगुप्त के सिक्के के साथ किदार-कुषाण सिक्के मिले हैं। वस्तुस्थिति जो भी हो, लेख का यह स्थल नये सिरे से अध्ययन और विवेचन की अपेक्षा रखता है।

अभिलेख का स्कन्दगुप्त के जीवन से सम्बद्ध महत्त्वपूर्ण अंश केवल श्लोक-५ है जिसमें कहा गया है कि लक्ष्मी ने समस्त गुण-दोष की पूरी तरह छानबीन करने के बाद अन्य राज-पुत्रों को ठुकराकर स्कन्दगुप्त का वरण किया (क्रमेण बुद्धया निपुणं प्रधार्य ध्यात्वा च कृत्स्नान्गुण-दोष हेतून्। व्यपेत्य सर्वमनुजेन्द्र-पुत्रां लक्ष्मीः स्वयं यं वरयांच-कार।) इसका स्पष्ट भाव है कि राज्याधिकार प्राप्त करने के लिए स्कन्दगुप्त को अन्य राजकुमारों से संघर्ष करना पड़ा था। यदि स्कन्दगुप्त ने स्वाधिकार से, बिना किसी कठिनाई के राजगद्दी प्राप्त की होती तो उसे लक्ष्मी ने स्वयं उसका वरण किया (लक्ष्मीः स्वयं यं वरयांचकार) कहने की आवश्यकता न होती। जिस राजकुमार से स्कन्दगुप्त को संघर्ष करना पड़ा, वह सम्भवतः घटोत्कचगुप्त रहा होगा, जिसके कुमारगुप्त (प्रथम) का पुत्र होने की सम्भावना है। उसके कुछ सिक्के भी प्राप्त हैं जो इस बात के प्रतीक हैं कि वह कुमारगुप्त (प्रथम) के बाद कुछ काल के लिए निश्चयरूपेण राज्य-सिंहासन पर आसीन रहा होगा।

यह अभिलेख स्कन्दगुप्त की शासन व्यवस्था के सम्बन्ध में भी मुखर है। इसमें कहा गया है कि “उसकी प्रजा का कोई व्यक्ति अपने धर्म से च्युत नहीं होता, कोई दरिद्र, दुर्व्यसनी और कदर्य से पीड़ित नहीं है और न किसी दण्डनीय को अनावश्यक पीड़ित किया जाता।” — [नैव कश्चिद्धर्मादपेतो मनुजः प्रजासु आर्तो दरिद्रो व्यसनी कदर्यो दण्डेन वा या भृश पीड़ितः स्यात्] वह साम्राज्य की शान्ति, सुरक्षा और लोक-समृद्धि के प्रति काफी सजग था, यह अनुमान भी लेख में उल्लिखित प्रान्तिक अधिकारियों (गोप्ता) के लिये निर्धारित प्रतिमानों से किया जा सकता है। उनके लिये आवश्यक था कि वे उपयुक्त, मेधावी, विनम्र, मानवोचित गुणों से युक्त, ईमानदारी में खरे, अन्तरात्मा में कर्तव्य और दायित्व के प्रति सजग, सर्व-लोक-हितैषी, अर्थ के न्यायपूर्ण अर्जन, समुचित संरक्षण और वृद्धि, वृद्धि होने पर समुचित कार्यों में व्यय करने में समर्थ हों। स्कन्दगुप्त ने पर्णदत्त को सुराष्ट्र का गोप्ता नियुक्त करते समय इन्हीं बातों का ध्यान रक्खा था, यह इस लेख में उल्लिखित है।

संक्षेप में इससे निम्न ऐतिहासिक तथ्य ज्ञात होते हैं :

  • यह वैष्णव धर्म प्रधान काल था क्योंकि विष्णु की पूजा से स्कंदगुप्त का जूनागढ़ अभिलेख प्रारम्भ होता है।
  • स्कन्दगुप्त गुणों की खान था तथा हूणों को इस लेख की रचना के पूर्व जीत चुका था क्योंकि मलेच्छ देश में इसका गुणगान होता था। इसका विस्तृत उल्लेख भीतरी स्तम्भ लेख में मिलता है।
  • स्कंदगुप्त ने सभी प्रान्तों के लिये योग्य अधिकारी नियुक्त किये थे। अधिकारियों की योग्यता का मानदण्ड था मतिवान, विनीत, सत्यवादिता, उदारता, दानशीलता, भक्ति, शुद्ध बुद्धि, लोकहितैषी, न्यायी, उचित धनार्जन, अभिवृद्धि का चिन्तक तथा उचित व्यय के लिये सोचना, अकृतघ्न, कृतज्ञ न होना आदि।
  • सुराष्ट्र के ‘गोप्ता’ की नियुक्ति के लिये स्कंदगुप्त बहुत चिन्तित थे। इसीलिए बहुत सोच तथा परखकर पर्णदत्त को यहाँ नियुक्त किया गया था। लगता है यह हूणों के राज्य का सीमावर्ती क्षेत्र रहा होगा तथा उसकी सुरक्षा की समस्या को लेकर राजा का मन इतना उद्वेलित रहता था कि इस पद पर केन्द्र द्वारा नियुक्ति होती थी।
  • यह छूट थी कि ‘गोप्ता’ ( प्रांतपाल ) अपने प्रान्त में इच्छानुसार योग्यता का परीक्षण कर अधिकारियों को नियुक्त करें। तभी पर्णदत्त ने अपने क्षेत्र सुराष्ट्र नगर में योग्य अधिकारी की खोज में अपने पुत्र की गुणवत्ता परख कर नियुक्त किया। इससे शासन व्यवस्था का ज्ञान प्राप्त होता है। चक्रपालित के गुणों की चर्चा श्लोक सं० १४ से २५ में है। ये गुण हैं रक्षा, आत्मनियन्त्रण, प्रसन्नता, उदात्त भाव, क्षमा, प्रभुत्व, विनय, दान, मुक्ति, संयम, ऋण, उपकार, धैर्य, अविस्मय, विज्ञापन रहित दक्षता, दुष्टदमन, वात्सल्य आदि। इन्हीं गुणों वाले व्यक्ति को राजकार्य में नियुक्त किया जाता होगा।
  • प्रसिद्ध ऐतिहासिक सुदर्शन झील की स्कंदगुप्त का जूनागढ़ अभिलेख में विस्तृत चर्चा मिलती है। इस झील का प्रयोजन था सिंचाई। इसी के लिये इसके किनारे पर तटबन्ध बनाया गया था। पाटलिपुत्र से केन्द्र सरकार इसको सुरक्षित रखने के लिये इतने दूरस्थ प्रांत में भी व्यवस्था करती थी। रुद्रदामन के जूनागढ़ अभिलेख से ज्ञात होता है कि मौर्यवंशीय शासक चन्द्रगुप्त मौर्य ने जन-कल्याण एवं सिंचाई के लिये सर्वप्रथम सुदर्शन झील का निर्माण अपने सुराष्ट्र के प्रान्तपति पुष्यगुप्त की देखरेख में कराया था। इसकी पूर्णता उनके पौत्र सम्राट अशोक की आज्ञा द्वारा उसके प्रान्तपति यवन तुशाष्प द्वारा हुई थी। परन्तु रुद्रदामन के अधीन इस प्रदेश में उर्जयत पर्वत से निकलने वाली स्वर्णसिक्ता, पलाशिनी तथा अन्य नदियों की धारायें भारी वर्षा के कारण वेगशाली होकर उसके तटबन्ध को तोड़ दीं। इसने इसे पुनर्निमित कराया। इसमें बहुत अधिक पैसा खर्च हुआ। प्रस्तुत वर्णन से स्कन्दगुप्त के काल (गुप्त संम्वत् १३६ = ) ४५५ ई० में यह पुनः टूट गया जिसे वहाँ के पुरपाल या पुरपति चक्रपालित ने स्कन्दगुप्त के आदेशानुसार ( गुप्त सम्वत् १३७ = ) ४५६ ई० में बनवाया था। अतः गुप्त शासक अपने राज्य के सुदूर प्रान्त में भी सिंचाई तथा जनकल्याणार्थ सजग रहते थे। इसके बाद इस झील का इतिहास ज्ञात नहीं है। इस तरह सुदर्शन झील का इतिहास साढ़े सात शताब्दियों वर्ष से अधिक का है
  • उस समय के आर्थिक संकट का ज्ञान स्कंदगुप्त का जूनागढ़ अभिलेख से मिलता है। भयंकर वर्षा और बाढ़ का संकेत ऊपर किया गया है जो कृषि के लिए घातक थे। प्रायः यह विभीषिका आती रही होगी। दूसरी ओर चक्रपालित का ३९वें श्लोक में यह कामना कि शताब्दियों तक यह नगर दुर्भिक्ष और सूखे से बचा रहे, इंगित करता है कि यहाँ और भी भयंकर विभिषिकाएँ थीं। इनसे निपटना राज्य का कार्य था। इसी से जहाँ सिंचाई के लिये यह तटाक राज्य द्वारा बनवाया गया था वहीं इसकी मरम्मत भी राज्य ही कराता था।
  • स्कंदगुप्त का जूनागढ़ अभिलेख में कलात्मक रुचि का भी विवरण मिलता है। तभी ऊपर की बाँध की चर्चा में श्लोक ३८ में झील के भीतर उतरने के लिये सीढ़ियों तथा ऊपर पक्के घाट का वर्णन है। यह नाप-जोखकर तैयार किया जाता था। यहाँ बाँध का माप हाथ और पुरुष में दिया गया है। ये मापन की इकाइयाँ रही होंगी।
  • मन्दिरों का निर्माण भी किया जाता था। यहाँ रैवतक पर्वत पर बने गुप्त सम्वत् १३८ = ४५७ ई० के भगवान विष्णु मन्दिर का उल्लेख है।
  • स्कंदगुप्त का जूनागढ़ अभिलेख में गुप्त सम्वत् में तीन तिथियाँ दी गयी हैं — १३६ तथा १३७ दोनों तिथियाँ सुदर्शन झील से सम्बन्धित हैं जबकि १३८ तिथि भगवान विष्णु मन्दिर से सम्बन्धित है।
  • राजत्व का आदर्श था वात्सल्य। चक्रपालित अपने पुरवासियों को उनके गुण-दोष की भली प्रकार परीक्षा कर अपने पुत्र की तरह मानता था। (यां लालयामास च पौरवर्गान, स्वस्येव पुत्रान्सुपरीक्ष्य दोषान्॥)। यही आदर्श अशोक के अभिलेखों में भी वर्णित है
  • सर्वप्रथम स्कंदगुप्त का जूनागढ़ अभिलेख में ही गुप्त काल में गणना किये जाने का ज्ञान श्लोक संख्या ४५ में ‘गुप्तानां काल’ तथा श्लोक २७ में ‘गुप्तां प्रकाले गणना विधाय’ प्राप्त होता है। स्पष्ट है कि नई गणना की विधि गुप्त सम्वत् थी।

रुद्रदामन का जूनागढ़ शिलालेख

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