बुधगुप्त का सारनाथ बुद्ध-मूर्ति-लेख; गुप्त सम्वत् १५७ ( ४७६-७७ ई० )

भूमिका

बुधगुप्त कालीन सारनाथ बुद्ध-मूर्ति-लेख १९१४-१५ ई० में पुरातात्त्विक स्थल सारनाथ के उत्खनन के समय मिली है। सारनाथ को प्राचीन काल में ऋषिपत्तन और मृगदाव भी कहा जाता था। भगवान बुद्ध ने अपना पहला धर्मोपदेशक यहीं दिया था। सारनाथ से ही इसी अभिलेख के साथ में कुमारगुप्त (द्वितीय) के लेख वाली मूर्ति भी मिली है। ये अब सारनाथ संग्रहालय में हैं। इन दोनों ही मूर्तियों पर समान रूप से एक ही लेख है। यह लेख दोनों मूर्तियों पर खण्डित है। पर दोनों लेखों को साथ देखने पर पूरा लेख संरक्षित किया जा सकता है। इन लेखों को एच० हारग्रीव्ज महोदय ने प्रकाशित किया।

संक्षिप्त परिचय

नाम :- बुधगुप्त का सारनाथ बुद्ध-मूर्ति-लेख [ Sarnath Buddha Idol Inscription of Budhagupta ]

स्थान :- सारनाथ, वाराणसी जनपद; उत्तर प्रदेश

भाषा :- संस्कृत

लिपि :- उत्तरवर्ती ब्राह्मी

समय :- गुप्त सम्वत् १५७ (४७६-७७ ई०); बुधगुप्त का शासनकाल

विषय :- यह भिक्षु अभयमित्र द्वारा भगवान बुद्ध की मूर्ति निर्माण एवं प्रतिष्ठापन का घोषणापत्र है।

मूलपाठ

१. गुप्ता [नां] समतिक्कान्तो सप्तपंचाशदुत्तरे [।] शते समानां पृथिवीं बुधगुप्ते प्रशासति [॥] [वैशाख-मास-सप्तम्यां मूलेश्म-प्रगते]

२. मया [।] कारिताभयमित्रेण प्रतिमा शाक्य-भिक्षुणा ॥ इमामु[द्दण्ड-सच्छ]त्र

पद्मास[न-विभूषितां] [।] [देवपुत्रवतो दिव्यां]

३. चित्रवि[न्या]स-चित्रितां ॥ यदस्ति पुण्यं प्रतिमां कारयित्वा ममास्तु तत् [माता-

[पित्रोर्गुरूणां च लोकस्य च समाप्तये ॥]

हिन्दी अनुवाद

गुप्त शासकों के वर्ष १५७ बीत जाने पर, जिन दिनों बुधगुप्त का पृथ्वी पर शासन है, वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की सप्तमी को मूल नक्षत्र में, अभयमित्र ने शाक्य-भिक्षु (बुद्ध) की प्रतिमा स्थापित की जो दण्ड, छत्र से विभूषित कमलासन है। यह दैव-पुत्रों के समान दिव्य है और चित्रविन्यास के अनुसार चित्रित है (अर्थात् इसका निर्माण शिल्पशास्त्रों में निर्धारित प्रतिमा-मान के अनुसार हुआ है)।

इस प्रतिमा के निर्माण से जो पुण्य लाभ मुझे हो वह सब माता, पिता, गुरु तथा लोक को समर्पित है।

टिप्पणी

यह छत्र-दण्ड युक्त पद्मासन बुद्धमूर्ति के, जिस पर यह लेख अंकित है, निर्माण एवं प्रतिष्ठापन का सामान्य घोषणापत्र है। इस मूर्ति की भी स्थापना कुमारगुप्त द्वितीय कालीन सारनाथ बुद्ध-मूर्ति अभिलेख की ही तरह भिक्षु अभयमित्र ने की थी। परन्तु यह उससे लगभग तीन वर्ष बाद की है। इस लेख का ऐतिहासिक महत्त्व बुधगुप्त के नाम और उनके शासन-काल के उल्लेख में निहित है। यह बुधगुप्त के शासन काल की अभिव्यक्ति करनेवाला अद्यतम लेख है अर्थात् बुधगुप्त का शासनारम्भ गुप्त सम्वत् १५७ ( ४७६-७७ ई० ) माना जा सकता है।

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