शिनकोट मंजूषा अभिलेख

भूमिका

शिनकोट मंजूषा अभिलेख अफगानिस्तान ( वर्तमान पाकिस्तान ) में बहने वाली पंजकोर और स्वात नदियों के संगम से लगभग २० मील ( ≈ ३२ किलोमीटर  ) पश्चिमोत्तर में बाजौर के समीप शिनकोट से मिला है। यह अभिलेख एक शेलखड़ी ( steatite ) की मंजूषा के भीतर, बाहर और उसके ढक्कन पर अंकित है।

शिनकोट मंजूषा अभिलेख खरोष्ठी लिपि और प्राकृत भाषा में दो खण्डों में अंकित लेख है। दोनों की लिपि एक सी नहीं है। एक अभिलेख के अक्षर बड़े हैं और उसकी खुदाई गहरी हुई है; दूसरे अभिलेख के अक्षर छोटे हैं और उसकी खुदाई हलकी है। लेखों में अक्षर स्वरूपों में भी यत्र-तत्र भिन्नता परिलक्षित होती है। ये तथ्य इस बात के द्योतक हैं कि दोनों लेख एक समय अंकित नहीं किये गये थे। एन० जी० मजूमदार ने, जिन्होंने इस लेख को सर्वप्रथम प्रकाशित किया था, लिपि भेद के आधार पर दोनों अभिलेखों के बीच पचास वर्ष का अन्तर अनुमानित किया है। उनके मतानुसार पहला लेख ई० पू० पहली शती का है।

शिनकोट मंजूषा अभिलेख : संक्षिप्त परिचय

नाम :- शिनकोट मंजूषा अभिलेख ( Shinkot Casket Inscription ), शिनकोट ( बाजौर ) शेलखड़ी अस्थिमंजूषा अभिलेख [ Sinkot ( Bajaur ) Steatite Casket Inscription ]

स्थान :- शिनकोट, बाजौर, उत्तर-पश्चिम फ्रंटियर ( N.F. Frontier ); पाकिस्तान

भाषा :- प्राकृत

लिपि :- खरोष्ठी

समय :- लगभग ११५ से ९० ई०पू० ( मिनाण्डरकालीन )

विषय :- मिनेंद्र के मित्र वियकमित्र के वंशज विजयमित्र द्वारा भगवान बुद्ध के धातु अवशेष की प्रतिष्ठा, पश्चिमोत्तर भारत में यूनानी राज्य की स्थापना और उनके बौद्ध धर्म मानने से भारतीयकरण की प्रक्रिया की जानकारी।

शिनकोट मंजूषा अभिलेख : मूलपाठ

खण्ड – १

(क) .….. मिनेद्रस महरजस कटिअस दिवस ४ [ + ]  ४ [ + ]  ४ [ + ] १  [ + ] १  प्र [ ण ] — [ स ] मे [ दि ]……

(ख) ……[ प्रति ] [ थवि ] त  [ । ]

(ग) प्रण-समे [ द ] [ शरिर ] [ भगव ] [ तो ] शकमुनिस [ । ]

(घ) वियकमित्रस अप्रचरजस [ । ]

  • ढक्कन के किनारे पर अंकित।
  • ढक्कन के बीच में अंकित।
  • ढक्कन के भीतरी भाग में अंकित।
  • मंजूषा के भीतर अंकित इसे स्टेन कोनो रख के पंक्ति २ के अन्तिम दो शब्दों-पञ्चवित्रये और इयो के बीच रखते और पढ़ते हैं।

खण्ड – २

(क)

१. विजय [ मित्रे ] ण

२. पते प्रदिथविदे [ । ]

(ख)

१. इमे शरिर पलुगभुद्रओं न सकरे अत्रित [ । ] स शरिअत्रि कलद्रे नो शघ्रों न पिंडोयकेयि पित्रि ग्रिणयत्रि [ । ]

२. तस ये पत्रे अपोमुअ वषये पंचमये ४ [ + ] १ वेश्रखस मसस दिवस पंचविश्रए इयो

३. प्रत्रिथवित्रे विजयमित्रेन अप्रचरजेन भग्रवतु शकिमुणिस समसंबुधस शरिर [ । ]

(ग)

विश्पिलेन अणंकतेन लिखित्रे [ । ]

  • ढक्कन के बीच में अंकित।
  • अभिलेख में अपोमुअ शब्द का प्रयोग वर्ष के पूर्व हुआ है। यह वर्ष का विशेषण होना चाहिए, जो व्यक्तिबोधक संज्ञा या सर्वनाम होगा । हमने इसे सर्वनाम के रूप में ‘अपने’ अर्थ में ग्रहण किया है।
  • मंजूषा के भीतर अङ्कित।
  • मंजूषा के पीछे अङ्कित।

संस्कृत छाया

[खण्ड-१] (क) संवत्सरे … मीनेन्द्रस्य महाराजस्य कार्तिकस्य [ मासस्य ] दिवसे १४ प्राण-समेतं शरीरं (ख) [ भगवतः शाक्यमुनेः। ]प्रतिष्ठापितम्। (ग) प्राणसमेतं शरीरं भगवतः शाक्यमुनेः। (घ) वीर्यकमित्रस्य अप्रत्यग्राजस्य [खण्ड-२] (क-१) विजयमित्रेण … (क-२) पात्र प्रतिष्ठापितम्।  (ख-१) इदं शरीरं प्रारूगण भूतकं न सत्कारैः आदृतम्। तत् शीर्यते कालतः, न श्रद्धालुः न च पिण्डोदकानि पितृन् ग्राह्यति। (ख-२) तस्य एतत पात्रं ५ वैशाखस्य मासस्य दिवसे २५ इह (ख-३)प्रतिष्ठापितं विजयमित्रेन। अप्रत्यग्रोजन, भगवतः शाक्यमुनेः सम्यक संबुद्धस्य नवं शवीरं अस्मिन पात्रे प्रतिष्ठापितम्। (ग) आज्ञाकारिणा विष्पिलेन लिखितम्॥

हिन्दी अनुवाद

खण्ड – १

(क) [ संवत्सर ]……….. मिनेन्द्र महाराज के कार्तिक [ मास ] के दिवस १४ को प्राण समेत (ख) [ भगवान् शाक्य मुनि का ] प्राण समेत [ शरीर ] प्रतिष्ठापित किया। (ग) प्राण समेत शरीर ( देहावशेष ) भगवत शाक्य मुनि का (घ) अप्रचराज वीर्यकमित्र का।

खण्ड – २

(क) विजयमित्र……ने पात्र प्रतिष्ठापित किया। (ख१) यह शरीर ( अस्थिपात्र ) प्ररुग्णभूत ( खण्डित ) होने [ के कारण ] सत्कार और आदर [ के योग्य ] नहीं [ रह गया था ]। उस काल में कोई [ व्यक्ति ऐसा भी न था ] जो श्रद्धालु हो और पित्रगणों को पिण्ड और उदक दे सके। तब उस पात्र को अपने ५वें वर्ष के वैशाख मास के २५वें दिवस को अप्रचराज विजयमित्र ने भगवान् शाक्यमुनि के सम्यक् सम्बुद्ध शरीर को प्रतिष्ठापित किया और इस पात्र में स्थापित किया। (ग) आज्ञाकारी विश्पिलेन ने इसे लिखा।

शिनकोट मंजूषा अभिलेख : महत्त्व

राजनीतिक दृष्टि से इस अभिनेख का विशेष महत्त्व है। यह मिनाण्डर नामक यूनानी शासक का एकमात्र उपलब्ध अभिलेख है। इससे विदित होता है :-

  • मिनाण्डर का अधिकार पश्चिमी सीमा पर स्वातघाटी में बाजौर के क़बायली भूभागों पर था। मिलिंदपण्हों के अनुसार मिनाण्डर की राजधानी स्यालकोट थी।
  • मिनाण्डर की मृत्यु के बाद इस क्षेत्र का शासन उसके सामन्तों के अधिकार में आ गयी।
  • विजयमित्र की पहचान इसके पुत्र इन्दुवर्मा के सिक्कों पर अंकित इस नाम से की गई है। सम्भवतः दोनों ही उसके सामन्त थे जो बुद्ध के अस्थि अवशेषों को एक पेटिका में सुरक्षित कर उस पर लेख लिखवाये थे।
  • शिनकोट मंजूषा अभिलेख और मिलिंदपण्हों मिनाण्डर को बौद्ध धर्मानुयायी बताता है।
  • यहाँ उल्लिखित ‘अप्रचरज’ एक सामन्त उपाधि होगी।
धार्मिक दृष्टि से भी इसकी महत्ता है :-
  • इसमें बुद्ध का उल्लेख है तथा इससे बौद्ध धर्म के प्रचार का ज्ञान मिलता है।
  • विदेशियों में भी इस धर्म का प्रचार था तभी यूनानी शासक मिलिन्द भी बौद्ध धर्मानुयायी हो गया था।
  • यहाँ उल्लिखित है कि ब्राह्मणों की भाँति बौद्ध भी अपने पितरों का श्राद्धकर्म करते थे। ‘शघ्रों न पिंडोयकेयि पित्रि ग्रिणयत्रि’ स्पष्ट है कि बौद्धों की जीवन विधि पर हिन्दु का प्रभाव पड़ने लगा था।

शिनकोट मंजूषा अभिलेख : विश्लेषण

यवन नरेश मिनेन्द्र अर्थात् मिनाण्डर ( Menander ) का उल्लेख करनेवाला अब तक ज्ञात यह एकमात्र अभिलेख है। इस अभिलेख के प्रथम अंश से यह प्रकट होता है कि उसके शासनकाल में भगवान् बुद्ध के अस्थि-अवशेष को मंजूषा में रखकर प्रतिष्ठित किया गया था। स्टेन कोनो का विचार है कि इसे स्वयं मिनेन्द्र ( मिनाण्डर ) ने प्रतिष्ठापित कराया था और शासन-काल उसके एक शताब्दी पश्चात् वियकमित्र ( विजयमित्र ) ने उसे पुनर्प्रतिष्ठित किया। किन्तु अन्य लोगों का मत है कि उसे मिनेन्द्र ने स्वयं प्रतिष्ठापित नहीं किया था, वरन् उसके शासन काल में वियकमित्र नामक किसी अप्रचराज ने प्रतिष्ठित किया था। जब यह भग्न हो गया तो उसकी दुबारा प्रतिष्ठा विजयमित्र नामक एक अन्य अप्रचराज ने की।

वियकमित्र और विजयमित्र को इस अभिलेख में अप्रचराज कहा गया है। एन० जी० मजूमदार की धारणा थी कि यह विरुद सम्भवतः अ-प्रत्यग-राज है जिसका तात्पर्य प्रतिद्वन्द्वी विद्वान् (one who has no adversory) है। एफ० डब्ल्यू० थामस इसका अर्थ पश्चिम नरेश (King of the west) मानते हैं। सर हेराल्ड वेली ने इसे अप्रच-राज माना है और अप्रच से तात्पर्य बाजौर से अनुमान किया है (अप्रच > अपच >अवहह > बज )। परन्तु भाषा-विज्ञान की दृष्टि से अप्रच से बाजौर का विकास मानना सहज नहीं है; फिरभी इतना तो स्पष्ट है ही कि अप्रच से तात्पर्य प्रदेश विशेष से ही जान पड़ता है। और उस प्रदेश के शासक अपने को अप्रचराज कहते थे।

मिनेन्द्र के शासन काल के उल्लेख से वियकमित्र के उसके अधीन सामन्त होने की कल्पना उभरती है परन्तु वह वस्तुतः सामन्त था यह बहुत स्पष्ट रूप से नहीं कहा जा सकता उसके स्वतन्त्र शासक होने की सम्भावना भी कम नहीं है। यदि उसका अपना स्वतः अस्तित्व न होता तो उसे अपने शासन-काल के उल्लेख की आवश्यकता न होती। अभिलेख में मिनेन्द्र के संवत्सर का उल्लेख इस प्रदेश में प्रचलित रहने के कारण किया जा सकता है।

कुछ विद्वानों ने वियकमित्र और विजयमित्र के एक ही व्यक्ति होने की सम्भावना व्यक्त की थी। किन्तु वे दोनों दो व्यक्ति थे और उनके बीच एक दीर्घ अन्तराल था। जैसाकि बाजौर अस्थि-मंजूषा अभिलेख, वर्ष २५ से स्पष्ट होता है।

इससे उत्तरी सीमा प्रदेश में मिनेन्द्र के शासन-काल और उसके बहुत काल तक बौद्ध-धर्म के प्रतिष्ठित रहने की बात ज्ञात होती है ।

धार्मिक दृष्टि से इस अभिलेख के खण्ड-२ में उल्लिखित ‘शध्रोपिंडोयकेयि पित्रि ग्रिणयति’ विशेष महत्त्व का है। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि ब्राह्मणों की तरह ही उन दिनों बौद्ध भी पितरों का श्राद्धकर्म (पिण्डदान, जलतर्पण) आदि किया थे।

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