भाब्रू शिलालेख

भूमिका

भाब्रू शिलालेख ( Bhabru Rock Edict ) अशोक के लघु शिलालेख ( Minor Rock Edict ) वर्ग का अभिलेख है। यह अभिलेख विराट नगर ( वैराठ या बैराठ ) के बीजक डूँगरी से मिला था।

इसको कैप्टन बर्ट द्वारा प्राप्त करने के बाद ‘भाब्रू शिविर’ में रखने के कारण इसका यह नाम ( भाब्रू अभिलेख – Bhabru Inscription ) पड़ गया। मूल स्थान के नाम पर इसको बैराठ शिलालेख या भाब्रू-बैराठ शिलालेख भी कहते है।

सन् १८४० ई० में अँग्रेज अधिकारी कैप्टन बर्ट ने इसको कोलकाता के एशियाटिक सोसाइटी बंगाल संग्रहालय में सुरक्षित रखवा दिया था।  इस आधार पर इसका एक अन्य नाम बैराठ कोलकाता अभिलेख भी पड़ गया।

इसमें बुद्ध, धम्म और संघ ( त्रिरत्न ) का एक साथ उल्लेख सम्राट अशोक का बौद्धावलम्बी होने का अभिलेखीय साक्ष्य प्रस्तुत करता है। इसमें अशोक को मगध का राजा कहकर प्रियदर्शी नाम से सम्बोधित किया गया है।

इसके साथ ही बौद्ध संघ के भिक्षु और भिक्षुणियों के आचरण सम्बन्धी दिशा-निर्देश भी मिलते हैं। इस लेख में सात पुस्तकों का उल्लेख है।

भाब्रू ( बैराट ) लघु शिलालेख : संक्षिप्त परिचय

नाम – भाब्रू शिलालेख, भाब्रू लघु शिलालेख, भाब्रू-बैराट लघु शिलालेख ( Bhabru Bairat Minor Rock Edit ), बैराठ-कोलकाता शिलालेख

स्थान – बैराट या बैराठ, जयपुर; राजस्थान

भाषा – प्राकृत

लिपि – ब्राह्मी

समय – अशोक के राज्याभिषेक का २२वाँ से २४वाँ वर्ष

विषय – अशोक का बौद्ध धर्मावलम्बी होने का अभिलेखीय प्रमाण; सात पुस्तकों का उल्लेख, भिक्षुओं व भिक्षुणियों के लिए दिशानिर्देश।

खोजकर्ता – कैप्टन बर्ट ( १८३७ ई० )

मूलपाठ

१ – प्रियदसि लाजा मागधे संघं अभिवादेतूनं आहा अपाबाधतं च फासुविहालतं चा [ । ]

२ – विदिते वे भंते आवतके हमा बुधसि धंमसि संघसी ति गालवे चं प्रसादे च [ । ] ए केचि भंते

३ – भगवता बुधेन भासिते सवे से सुभाषिते वा [ । ] ए चु खो भंते हमियाये दिसेया हेवं संधंमे

४ – चिलठितीके होसती ति अलहामि हकं तं वातवे [ । ] इमानि भंते धंमपलियायानि विनयसमुकसे

५ – अलियवसाणि अनागतभयानि मुनिगाथा मोनेयसूते उपतिसप्रसिनो ए चा लाघुलो-

६ – वादे मुसा-वादं अधिगिच्छ भगवता बुधेन भासिते [ । ] एतानि भंते धंमपलियायानि इछामि

७ – किंति बहुके भिखुपाये चा भिखुनिये चा अभिखिनं सुनेयु चा उपधालयेयू चा [ । ]

८ – हेवंमेवा उपासका चा उपासिका चा [ । ] एतेनि भंते इमं लिखापयामि अभिपेतं में जानंतू ति [ । ]

संस्कृत रूपान्तरण

प्रियदर्शी राजा मागधः सङ्घमभिवादनमाह अपावाधत्वं च पाशु विहारत्वं च। विदितं वो भदन्त यावदस्माकं बुद्धे धर्मे संघे इति गौरवं च प्रसादश्च। यत्किञ्चितद्भदत्ता भगवता बुद्धेन भाषितं सर्वे तत्सुभाषितं वा। यत्तु खुलु भदन्ता मया दश्यत एवं सद्धर्मश्चिरस्थितिको भविष्यतीत्यर्हाम्यहं तद्वर्तयितुम्। इमे भदन्ता धर्मपर्यायाः — विनयसमुत्कर्षः आर्यवंशः अनागतभयानि मुनिगाथा मौनेयसूत्रमुपतिष्यप्रश्न एवं राहुलोवादो मषावादमधिकृत्य भगवता बुद्धेन भाषितः। एतान्भदन्ता धर्मपर्यायानिच्छामि। किमिति? बहवो भिक्षुका भिक्षुक्यश्च अभीक्ष्णं श्रणुपुरवधारयेयुश्च। एवमेवोपासकाश्चोपासिकाश्च। एतेन भदन्ता इदं लेखयाभ्यभिप्रेतं मे जानन्त्विति।

हिन्दी अर्थान्तर

१ – प्रियदर्शी राजा ने मगध के संघ को अभिवादन कहा। उसके लिए वह बाधाओं का अन्त और सुख की स्थापना चाहता है।

२ – भंते या भदंते ( सम्मान्यजन )! आप लोगों को ज्ञात है कि कितना बुद्ध, धर्म और संघ के प्रति मेरा आदर और श्रद्धा है। भदन्त! जो कुछ भी

३ – भगवान बुद्ध ने कहा है वह सब सुभाषित है। भदन्त! मैंने जो कुछ भी धर्म के बारे देखा है एवं वह

४ – जिस प्रकार चिरस्थायी होगा वह मैं कहता हूँ। भदन्त! ये धर्मपर्याय ( धर्मग्रंथ ) हैं – विनय समुकस ( पालि — विनयसमुक्कंसः ; संस्कृत — विनय-समुत्कर्षः )

५ – अलियवस, अनाअगतभय, मुनिगाथा, मौनेयसुत्त, उपतिसपसि और राहुलवाद ( लाघुलोवादे) में

६ – मुसा-वादं ( मृषावाद) के ऊपर जो भागवान बुद्ध द्वारा कहा गया है। भदन्त! इन धर्म पर्यायों को चाहता हूँ

७ – कि बहुत से भिक्षु और भिक्षुणियाँ इन्हें निरन्तर सुने और इनुको उपधारण करें।

८ – इसी प्रकार उपासक और उपासिका भी। भदन्त! इसीलिए यह लिखवाता हूँ कि लोग मेरा अभिप्राय जानें।

  • अलियवस ( पालि – अरियवंसः संस्कृत – आर्यवंश ),
  • अनागतभय ( संस्कृत – अनागतभयानिसूत्र ),
  • मोनेयसूत, ( पालि – मोनेय्यसुत्त, संस्कृत – मौयेयसूत्रम् ),
  • उपतिसपसिन ( पालि – उपतिस्सपञ्ह, संस्कृत – उपतिष्य प्रश्न: ) और
  • लाघुलोवादे ( पालि – राहुलोवाद-सुत्त, संस्कृत – राहुलोवादः ) में
  • मुसा-वादं ( संस्कृत – मृषावादः )

भाब्रू शिलालेख  : विश्लेषण

यह अभिलेख ऐसा है जिसमें अशोक ने स्पष्ट रूप से बुद्ध, धर्म और संघ के प्रति अपनी निष्ठा की है। अशोक बौद्ध भिक्षुओं को यह बताने का प्रयास किये हैं कि धर्मग्रन्थ कौन से हैं जिनको भिक्षु-भिक्षुणियों को पढ़ना और तदनुसार आचरण करना चाहिए।

सम्राट अशोक की ओर से भिक्षुओं को दिये जाने वाले इस आदेश से ऐसा प्रकट होता है कि वह अपने को बौद्ध भिक्षुओं को अनुशासित करने का अधिकारी समझता था। यह धर्म पर अनुशासन का प्रतीक है। जो भारतीय परम्परा में अन्यत्र नहीं मिलता है।

भाब्रू-बैराठ शिलालेख में उल्लिखित ७ ग्रंथ

अशोक ने भिक्षु-भिक्षुणियों को जिन सात ग्रन्थों के अध्ययन का आदेश दिया है, वे कौन-कौन से हैं? इन विषय में विद्वानों में काफी मतभेद या विवाद है।

इन पर ( सात पुस्तकों )विस्तार के साथ Bimal Churn Law ने अपनी पुस्तक ‘A History Of Pali Literature’ ( Volume  – Two ) तथा Vidhushekhra Bhattacharya की पुस्तक ‘Buddhist Text As Recommended By Ashoka’ में किया है।

१ :- विनय समुकस / विनय समुकसे ( विनय समुत्कर्ष ) के सम्बन्ध में विद्वानों में घोर विवाद है। समझा जाता है कि उसका तात्पर्य धम्मचक्क पवत्तनसुत्त, पातिमोक्ख, तुट्टकसुत्त ( सुतनिपात ), सपुरिससुत्त ( मज्झिमनिकाय ), सिगालोवाद सुतन्त ( दीघनिकाय ) या अत्थवसवग्ग ( अंगुत्तरनिकाय ) में से किसी से है।

२ :- अलियवस –  सम्भवतः यह अंगुत्तरनिकाय का अरियवंस या अरियवास है। इस सुत्त में बुद्ध ने कहा है कि भिक्षुओं को कपड़े, खाने और रहने के प्रति असन्तोष नहीं प्रकट करना चाहिए। उन्हें जो भोजन व कपड़ा मिले उसी से वे सन्तुष्ट रहें और ध्यान करें।

३ :- अनागतभय – यह अंगुत्तरनिकाय का अनागतभयानि हो सकता है।

४ :- मुनिगाथा – कदाचित् यह सुत्तनिपात का मुनिसुत्त है, जिसमें बुद्ध ने मुनि की व्याख्या की है।

५ :- मौनेयसुत्त – कदाचित् इसका तात्पर्य सुत्तनिपात के नालकसुत्त से है। इसमें भिक्षुओं के आचरण का उल्लेख है।

६ :- उपतिसपसिन – इसे विद्वानों ने मज्झिमनिकाय का रथविनीतसुत्त अनुमान किया है। कुछ इसे सुत्तनिपात का सारिपुत्तसुत्त मानते हैं।

७ :- लाघुलोवाद – यह मज्झिमनिकाय का राहुलोवदासुत्त जान पड़ता है।

भाब्रू या बैराठ 

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