धनैदह ताम्रपत्र ( गुप्त सम्वत् ११३ )

परिचय

धनैदह ताम्रपत्र १९०८ ई० में राजशाही ( बंगलादेश ) जनपद के अन्तर्गत नाडोर तहसील के धनैदह ग्राम में अत्यन्त खण्डित अवस्था में एक पतला ताम्र-फलक प्राप्त हुआ था। यह लेख उसी पर अंकित है। इस ताम्र फलक को राजशाही के बारेन्द्र रिसर्च सोसाइटी के निदेशक अक्षयकुमार मैत्रेय ने खान बहादुर मुहम्मद इर्शाद अली खाँ से प्राप्त किया था और उसी सोसाइटी के संग्रह में है। यह अभिलेख ताम्रपट के एक ओर अंकित और घिसा है। इसका दाहिना आधा भाग और ऊपर का दाहिना और नीचे का बायाँ कोना अनुपलब्ध है। इसे पहले राखालदास बनर्जी ने, तत्पश्चात् राधागोविन्द बसाक ने प्रकाशित किया।

संक्षिप्त परिचय

नाम :- धनैदह ताम्रपत्र [ Dhanaidah Copper Plate ]

स्थान :- धनैदह गाँव, नाडोर तहसील, राजशाही जनपद, बाँग्ला देश

भाषा :- संस्कृत।

लिपि :- ब्राह्मी ( उत्तरी रूप )।

समय :- गुप्त सम्वत् – ११३ या ४३२ ई० ( ११३ + ३१९ ), कुमारगुप्त प्रथम का शासनकाल।

विषय :- इसमें कुमारगुप्त के लिये परमभागवत, महाराजाधिराज के साथ ‘परमदैवत’ विरुद द्रष्टव्य है। इसमें अक्षयनीवि दान का विवरण मिलता है।

मूलपाठ

१. …… [ स ] म्वत्सर-श [ ते ] त्रयोदशोत्तरे

२. [ सं १०० + १० +३ ] ……. [ अस्यान्दि ] वस-पूर्व्वायां परमदैवत-पर-

३. [ म-भट्टारक-महाराजाधिराज-श्रीकुमारगुप्ते पृथिवीपती ] ………. कुटु [ म्बि ] ……. ब्राह्मण-शिवशर्म्म-मह-

४. …….. वकीर्ति-क्षेमदत्त-गोष्ठक-वर्ग्गपाल-पिङ्गल-शुङ्कुक-काल-

५. …….. विष्णु-[ देव ] शर्म्म-विष्णुभद्र-खासक-रामक-गोपाल-

६. ……… श्रीभद्र-सोमपाल-रामाद्यः ग्रामाष्टकुलाधिकरणञ्च

७. ……… विष्णुना (ऽ) विज्ञापिता इह खादाट ( ? ) पार-विषये ( ऽ ) नु-वृत्तमर्य्यादास्थि [ ति ]-

८. …….. नीवीधर्म्म [ ा ] क्षयेण लभ्य [ ते ] [ । ] [ त ] दर्हथ ममाद्यनेनैवक्क्रमे-दा [ तुं ]

९. ……… समेत्या ( ? )  भिहितैः सर्व्वमेव …… ज्ञा ( ? ) कर-प्रतिवेशि ( ? ) कुटुम्बि-भिरवस्थाप्य क-

१०. …… रि-कन-यदितो- [ त ] दवधृतमिति यतस्तथेति प्रतिपाद्य

११. ……. [ अष्टक-न ] वक-नला [ भ्या ] मपविञ्छ्य क्षेत्रकुल्यवापमेकं दत्तं [ । ] ततः आयुक्तक-

१२. ……… भ्रा ( ? ) तृकटक-वास्तव्य-छन्दोग-ब्राह्मण-वराहस्वामिनो दत्तं ( । ) त [ द्धव ]-

१३. भूम्या दा [ नाक्षे ] पे च गुणागुणमनुचिन्त्य शरीर का [ ा ] ञ्चन-कस्य चि-

१४. [ र चञ्चलत्वं ] ………. [ ॥ ] [ उ ] क्तञ्च भगवता द्वैपायनेन [ । ] स्वदत्ताम्पर-दत्ताम्वा

१५. [ यो हरेत वसुन्धरां [ । ]

[ स विष्टायां कृमिर्भूत्वा पितृ ] [ भिः ] सह पच्यते [ ॥ ] षष्टि वर्ष-सहस्रानि स्वर्ग्गे मोदति [ भू ] मिदः [ । ]

१६. [ आक्षेप्ता चनुमन्ता च तान्येव नरके वसेत्॥ ]

[ पू ] र्व्वदतां द्विजातिभ्यो यत्नाद्रक्ष युधिष्ठिर [ ॥ ]

[ महीं [ मही मताञ्छ्रेष्ठ ]

१७. [ दानाच्छ्रेयोऽनुपालनं ] [ ॥ ]

…….. यं …. श्रीभद्रेन उत्कोर्ण्ण स्थम्भेश्वरदासे [ न ]

हिन्दी अनुवाद

संवत् एक सौ तेरह ( ११३ )।

इस दिन ( समय ) परमदैवत [ परमभट्टारक महाराजाधिराज श्री कुमारगुप्त पृथ्वीपति [ हैं ]।

कुटुम्बिक ….. ब्राह्मण शिवशर्मा, नागशर्मा, मह [ त्तर ] [ दे ] वकीर्ति, क्षेमदत्त, गोष्ठक, वर्ग्गपाल, पिंगल, शुंकक, काल ……  विष्णु, [ देव ] शर्मन, विष्णुभद्र, खासक, रामक, गोपाल ….. श्रीभद्र, सोमपाल, राम आदि ग्राम के अष्ट-कुलिक भी। …… विष्णुन ( ? ) यह विज्ञापित करते हैं —

खादापार विषय से सम्बद्ध मर्यादा के अनुसार निर्धारित अक्षयनी-विधर्म [ के अनुकूल ] [ जो भूमि है ]। उसे नियमानुसार दिया जा रहा है।

…… निकट के सभी कर-प्रतिवेशी कुटुम्बिक हैं, उन्हें सूचित किया जाता है —

……यह स्वीकार किया गया।

एक कुल्यवाप भूमि, ८ x ९ नल नापकर दिया गया। उसे आयुक्तक भ्रातृकटक निवासी छान्दोग ब्राह्मण वराहस्वामी को दिया गया।

भूमि दान के गुण-अवगुण पर विचार कर, शरीर और धन ( कांचन ) की चंचलता ( नश्वरता ) को सोचकर यह दान दिया गया।

भगवान् द्वैपायन ( व्यास ) ने कहा है —

जो अपने अथवा दूसरों द्वारा दिये गये दान का अपहरण करेगा, वह पितरोंसहित विष्ठा का कीड़ा बनकर रहेगा।

भूमि दान करनेवाला हजार वर्ष तक स्वर्ग का सुख भोग और उसका अपहरण करनेवाला उतने ही काल तक नरक-वास करता है।

पूर्व में ब्राह्मणों को दिये गये दान की युधिष्ठिर ने भी रक्षा की; क्योंकि दान देने से अधिक श्रेष्ठ दान की रक्षा करना है।

…… इसे श्रीभद्र ने लिखा और स्तम्भेश्वरदास ने उत्कीर्ण किया।

टिप्पणी

यह अभिलेख सामान्य शासन-पत्रों से सर्वथा भिन्त्र एक विक्रय-पत्र है। इसमें दान देने के निमित्त भूमि क्रय किये जाने का उल्लेख है। लेख क्षतिग्रस्त होने के कारण विक्रय-पत्र का प्रारूप पूर्णतया समझा नहीं जा सका है। केवल इतना ही अनुमान किया जा सकता है कि विष्णु नामक किसी आयुक्तक ने ग्राम के कुटुम्बिकों, महत्तरों तथा अधिकरण के सम्मुख खादा ( ट ) पार विषय में प्रचलित दर पर एक कुल्यवाप भूमि अक्षय नीविधर्म के अनुसार क्रय करने का प्रतिवेदन प्रस्तुत किया जिसे उन लोगों ने स्वीकार किया। और इस प्रकार उक्त क्रीत भूमि को उसने वराहस्वामिन नामक सामवेदी ब्राह्मण को दान में दिया। अन्त में दान की महत्त्व व्यक्त करनेवाली धर्म-वाक्य की पंक्तियाँ उद्धृत की गयी हैं।

अभिलेख में जो धर्म-वाक्य उद्धृत हैं उन्हें भगवान् द्वैपायन ( व्यास ) द्वारा कथित बताया गया है। ये या इसी प्रकार के अन्य वाक्य प्रायः गुप्त एवं मध्यकालीन दान-पत्रों में अंकित पाये जाते हैं। इन वाक्यों के वास्तविक उद्गम के सम्बन्ध में कुछ भी निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता। यदि ये वाक्य वस्तुतः व्यासकथित है तो उन्होंने इन्हें कहाँ और किस प्रसंग में कहा था, इसकी कोई जानकारी अब तक प्राप्त नहीं हो सकी है। इन वाक्यों का उद्गम जो भी हो, इन दान-पत्रों में उल्लेख करने का उद्देश्य दान-दाता द्वारा इस बात पर बल देना है कि दान की महत्त्व बहुत बड़ा है; दिये हुए दान की रक्षा की जानी चाहिए। दान-दाता के वंशज एवं अन्य लोग दिये गये दान की उपेक्षा न करें इसलिए उन्हें इन वाक्यों द्वारा भय दिखाया और उपदेश दिया जाता रहा है।

धनैदह ताम्रपत्र में भूमि के प्रसंग में अक्षय नीविधर्म का उल्लेख हुआ है। व्यावहारिक अर्थ में नीवि का तात्पर्य परिपण अथवा मूल-धन है। भूमि के प्रसंग में इसका तात्पर्य उस पद्धति से है जिसके अनुसार भूमि प्राप्त करनेवाला व्यक्ति प्रदत्त भूमि की आय अथवा उपज का उपयोग कर सकता था। सामान्यतः उपयोग का यह अधिकार उसे उसके जीवनकाल तक ही होता था। किन्तु अक्षय नीवि-धर्म के अनुसार प्राप्तकर्ता और उसके उत्तराधिकारी इस भूमि का उपयोग निरन्तर कर सकते थे। राज्य अथवा राजा उसे वापस नहीं ले सकता था परन्तु प्राप्त कर्ता को भी इस बात का अधिकार न था कि उस भूमि को वह बिना राजा या राज्य की अनुमति के किसी दूसरे को हस्तान्तरित कर सके। इस पद्धति का संकेत इस अभिलेख से प्राप्त होता है किन्तु इसके उल्लेख का प्रसंग स्पष्ट नहीं है।

इस अभिलेख में भूमि के नाप के विस्तार के रूप में प्रयुक्त कुल्यवाप शब्द भी ध्यातव्य है। इसका शाब्दिक अर्थ उतनी भूमि है जितने में एक कुल्य बीज बोया जा सके। भूमि विस्तार के रूप में एक कुल्यवाप आठ द्रोण-वाप और एक द्रोण-वाप चार आढ़-बाप का होता था। कुल्य, द्रोण, आदि सभी अनाज नापने के पात्रों के नाम हैं और आज भी बंगाल के लोक-जीवन की शब्दावली में वे जीवित हैं; किन्तु उनका माप सर्वत्र एक-सा नहीं है। भूमि विस्तार की दृष्टि से इस अभिलेख में एक कुल्यवाप सम्भवतः आठ नल लम्बे और नौ नल चौड़े अर्थात् ७२ वर्ग-नल भूमि को कहते थे; परन्तु नल की लम्बाई कितनी होती थी, इसका स्पष्ट नहीं है।

धनैदह ताम्रपत्र में प्रयुक्त एक अन्य शब्द अष्ट-कुलाधिकरण भी द्रष्टव्य है। कुल का अर्थ परिवार और अधिकरण का तात्पर्य शासन, शासक अथवा शासन परिषद् माना जाता है। इस प्रकार इस शब्द का तात्पर्य आठ परिवारों से संघटित परिषद् होगा। विद्वानों का मत है कि यह किसी शासनिक पद का नाम है।

  • राधागोबिन्द बसाक का कहना है कि यह ग्राम के अन्तर्गत आठ कुलों पर अधिकार रखनेवाला अधिकारी था।
  • राखालदास बनर्जी का कहना है कि यह आठ ग्रामों पर अधिकार रखनेवाला अधिकारी रहा होगा।
  • न० न० दासगुप्त का मत है कि यह ग्राम के अन्तर्गत न्याय करनेवाली संस्था थी जिसमें आठ न्यायाधिकारी होते थे।
  • बी० आर० आर० दीक्षितार की धारणा है कि इस अधिकरण का सम्बन्ध ग्राम की भू-व्यवस्था से था। उन्होंने कुल का तात्पर्य उस भू-क्षेत्र से लिया है जो छह बैलवाले दो हलों से जोता जा सके। इस प्रकार उनके मतानुसार यह अधिकरण गाँव के उतने भू-भाग पर नियन्त्रण रखता था जो सोलह हलों से जोता जा सके।
  • अभिलेखों के परीक्षण से ज्ञात होता है कि इस अधिकरण का सम्बन्ध न्याय से कदापि न था।
  • दामोदरपुर से मिले ताम्र-शासनों में अष्टाकुलाधिकरण का उल्लेख ग्रामिक तथा महत्तरों के साथ हुआ है। अतः कहा गया है कि इन लोगों ने भूमि क्रय किये जाने की सूचना ग्रामवासियों की दी। इससे ध्वनित होता है कि यह ग्रामिक और महत्तर की तरह ही ग्राम-शासन-व्यवस्था में कोई महत्त्वपूर्ण पद अथवा संस्था थी और भूमि के क्रय विक्रय और प्रबन्ध में उसका महत्त्वपूर्ण हाथ होता था।

अन्त में कुमारगुप्त के लिए धनैदह ताम्रपत्र में प्रयुक्त परम-देवता शब्द भी ध्यातव्य है राजा में देवत्व की कल्पना इस विरुद में ध्वनित होती है।

कुमारगुप्त ( प्रथम ) का बिलसड़ स्तम्भलेख – गुप्त सम्वत् ९६ ( ४१५ ई० )

गढ़वा अभिलेख

कुमारगुप्त प्रथम का उदयगिरि गुहाभिलेख (तृतीय), गुप्त सम्वत् १०६

मथुरा जैन-मूर्ति-लेख : गुप्त सम्वत् १०७ ( ४२६ ई० )

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