स्कंदगुप्त का भीतरी स्तम्भलेख

भूमिका

स्कंदगुप्त का भितरी स्तम्भलेख या भीतरी स्तम्भलेख उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जनपद के अन्तर्गत सैदपुर से पाँच मील उत्तर-पूर्व स्थित भितरी नामक ग्राम में खड़े लाल पत्थर के एक स्तम्भ पर उत्कीर्ण है। यह स्तम्भ सम्भवतः उस मन्दिर के आगे लगा ध्वज था जिसके छेंकन आदि के कुछ भाग काशी विश्वविद्यालय द्वारा कराये गये उत्खनन में कुछ वर्ष पूर्व प्रकाश में आये हैं। १८३४ ई० में ट्रेगियर महोदय ने सर्वप्रथम देखा था। उस समय अभिलेखवाला अंश मिट्टी के नीचे दबा था। एलेक्जेंडर कनिंघम द्वारा जब उसके चारों ओर की मिट्टी हटायी गयी, तो यह लेख प्रकाश में आया। १८३६ ई० में उन्होंने इसके प्राप्त होने की सूचना प्रकाशित की। १८६७ ई० में रेवरेण्ड डब्लू एच० मिल ने इसे अंग्रेजी अनुवाद सहित प्रकाशित किया। १८७१ ई० में कनिंघम ने, १८७५ ई० में भाऊ दाजी ने और १८८५ ई० में भगवानलाल इन्द्रजी ने अपने-अपने पाठ और अनुवाद प्रकाशित किये। तदुपरांत जे० एफ० फ्लीट ने उसे सम्पादित कर Corpus Inscriptionum Indicarum में प्रकाशित किया। बाद में भण्डारकर ने उसका पुनर्परीक्षण किया है।

संक्षिप्त परिचय

नाम :- स्कंदगुप्त का भीतरी स्तम्भलेख या भितरी स्तम्भलेख [ Bhitari Stone Pillar of Skandgupta ]

स्थान :- गाजीपुर जनपद; उत्तर प्रदेश

भाषा :-  संस्कृत

लिपि :- उत्तरी ब्राह्मी

समय :- गुप्त सम्वत् १४८ ( ४६७ ई० ), स्कंदगुप्त का शासनकाल

विषय :- स्कंदगुप्त की उपलब्धियों का विवरण

मूलपाठ

१. [सिद्धम् ॥] [सर्व]रा[जो]च्छेतुः पृथिव्यामप्रतिरथस्य चतुरुदधिसलिला-स्वादित-यशसो धनद-वरुणेन्द्रान्तक-स[मस्य]

२. कृतान्त-परशोः न्यायागतानेक-गो-हिरण्य [को]टि-प्रदस्य चिरोत्सन्नाश्वमेधाहर्त्तुर्महाराज श्रीगुप्तप्रपौत्र [स्य]

३. महाराज-श्रीघटोत्कचपौत्रस्य महाराजाधिराज-श्रीचन्द्रगुप्त-पुत्रस्य लिच्छवि-दौहित्रस्य महादेव्यां कुमार-देव्या-

४. मुत्पन्नस्य महाराजाधिराज-श्रीसमुद्रगुप्तस्य पुत्रस्तत्परिगृहीतो महादेव्यान्दत्तदेव्यामुत्पन्नः स्वयं चाप्रतिरथः

५. परम-भागवतो-महाराजाधिराज-श्रीचन्द्रगुप्तस्तस्य पुत्रस्तत्पादानुद्धयातो महादेव्यां ध्रुवदेव्यामुत्पन्नः परम-

६. [भा]गवतो महाराजाधिरा[ज]-श्रीकुमारगुप्तस्तस्य[।]

प्रथित-पृथुमति-प्रभाव-शक्तेः पृथु-यशसः पृथिवी-पतेः पृथुश्रीः [।]

७. पि[तृ]-प-[रि]-गत-पादपद्म-वर्ती प्रथित-यशाः [पृ]थिवीपतिः सुतोऽयम् [॥ १]

[ज]गति भु[ज]-बलाढ्यो गुप्त वंशै[क]वीरः प्रथित-विपुल-

८.                                    नामा नामतः स्कन्दगुप्तः [।]

सुचरित-चरितानां येन वृत्तेन-वृत्तं न विहितमथात्मा तान-[धीदा?]-विनतिः [॥ २]

विनय-

९. बल-सुनीतैर्व्विक्क्रमेण-क्क्रमेण प्रतिदिनमभियोगादीप्सितं ये[न]ल[ब्ध्वा] [।]

स्वभिमत-विजिगीषा-प्रोद्यतानां परेषां प्रणि-हित इव ले[भे सं]विधानोपदेशः [II ३]

१०. विचलित-कुल-लक्ष्मी-स्तम्भनायोद्यतेन क्षितितल-शयनीये येन नीता त्रियामा [।]

समु-

११.         दित ब[ल]कोशन्-राष्ट्र-मित्राणियक्त्वा

                                क्षितिप-चरण-पीठे स्थापितो वाम-पादः [॥ ४]

प्रसभमनुपमर्द्रिर्धस्त-शस्त्र-प्रतापैर्विन[य] [स]मु [चितैश्च] क्षान्ति-शौयैर्न्निरूढम् [।]

१२. चरितममलकीर्त्तेर्गीयते यस्य शुभ्रं दिशि दिशि परितुष्टैराकुमारं मनुष्यैः [॥ ५]

पितरि दिवमुपेते

१३.       विप्लुतां वंश-लक्ष्मीं भुज-बल-विजितारिर्य्यः प्रतिष्ठा[प्य भूयः] [।]

जितमिति परितोषान्मातरं सास्र नेत्रां हतिरिपुरिव कृष्णो देवकीमभ्यु[पे-

१४.                                            [तः] [॥ ६]

[स्वै]र्द्द[ण्डैः] [द्विषदो व्यापेत्य] चलितं वंशं प्रतिष्ठाप्य यो

बाहुभ्यामवनिं विजित्य हि जितेष्वार्त्तेषु कृत्वा दयाम् [।]

नोत्सिक्तो [न] च विस्मितः प्रतिदिनं

१५. [संवर्द्धमान]-द्युति-गतिश्च स्तुतिभिश्च-वृत्तकथनं यं [प्र]णयत्यार्तं   [॥ ७ ]

हूणैर्य्यस्य समागतस्य समरे दोर्भ्यां धरा कम्पिता भीमावर्त्त-करस्य

१६.                               शत्रुषु शरा[विनयस्य दुर्घर्षिनः] [।]

…………….. लिखितं प्रख्यापितो [दीप्तिनद्यो नभी तै लक्ष्यत इव

श्रोत्रेषु सारङ्ग ध्वनिः [॥ ८]

१७. [स्व] पितुः कीर्त्ति —  —  —  —  ……  —  ……  [।]

—  —  —  — [मुक्तिभिर्युक्त] —  —  —  — ……  —  ……  — [॥ ९]

[प्रकार्य्या] प्रतिमाका चिठप्रतिमां तस्य शाङ्गिणः [।]

१८. [सु]प्रतीतश्चकारेमां या [वदाचन्द्र-तारकम्] [॥ १०]

इह-चैनं प्रतिष्ठाप्य सुप्रतिष्ठित-शासनः [।]

ग्राममेनं स विद[धे] पितुः पुण्याभिवृद्धये [॥ ११]

१९. अतो भगवतो मूर्त्तिरियं यश्चात्र संस्थितः (?) [।]

उभयं निर्द्दिदेशासौ पितुः पुण्याय-पुण्य-धीरिति [॥ १२]

हिन्दी अनुवाद

सिद्धि हो! सब राजाओं के उन्मूलक; पृथ्वी पर अप्रतिरथ (जिसके समान पृथ्वी पर अन्य कोई न हो); चारों समुद्र के जल से आस्वादित कीर्तिवाले; कुबेर (धनद), वरुण, इन्द्र तथा यम (अन्तर) के समान; कृतान्त के परशु-तुल्य; न्याय से उपलब्ध अनेक गो तथा कोटि हिरण्य (सिक्के) के दान-दाता; चिरोत्सन्न-अश्वमेध हर्त्ता; महाराज श्रीगुप्त के प्रपौत्र; महाराज घटोत्कचगुप्त के पौत्र; महाराजाधिराज श्री चन्द्रगुप्त के पुत्र; लिच्छवि-दौहित्र, महादेवी कुमारदेवी [के गर्भ से उत्पन्न] महाराज समुद्रगुप्त उनके पुत्र, उनके परिगृहीत, महादेवी दत्तदेवी [के गर्भ से उत्पन्न] स्वयं भी अप्रतिरथ; परमभागवत महाराजाधिराज श्री चन्द्रगुप्त उनके पुत्र तथा पादानुगामी महादेवी ध्रुवदेवी से उत्पन्न परमभागवत महाराजाधिराज कुमारगुप्त — [१-६]

वे प्रबल मेधा से सत्पन्न (प्रथित पृथु-मति), शक्तिसम्पन्न (प्रभाव-शक्तेः) महान् यशस्वी (पृथु-यशस), विख्यात (पृथु-श्री) थे; [उन्हीं] पिता के चरण-कमल पर भ्रमर की भाँति मँडरानेवाला, शासक ( पृथ्वी-पति), यह पुत्र है। जगत् में अपनी भुजाओं के लिये प्रख्यात, गुप्त वंश के इस वीर का नाम स्कन्दगुप्त है। [६-८]

उसका चरित्र ही सुचरित है, उसकी धर्म-परायणता कथनीय (वृत) है; वह प्रशस्तमार्गगामी (धर्मविहित) है; [वह] निर्मल आत्मा और विनीत हैं। विनय, बल, विक्रम उसने दाय (क्रम) में प्राप्त किया है लोक व्यवहार का ध्यान रखते हुए [उसने] विजय की दृढ़ इच्छा रखनेवाले शत्रुओं को भी पराभूत करने की कला में दक्षता प्राप्त की है। [६-१०]

अपने कुल की विचलित लक्ष्मी को पुनः स्थापित करने के प्रयास में उसे सारी रात पृथ्वीरूपी शैया पर बितानी पड़ी। [अन्ततोगत्वा] बल, कोष, राष्ट्र (प्रजा) और मित्रों की सहायता से अपने शत्रुओं को अपने चरणों का आसन बनाने (अर्थात् कुचलने) में सफल रहा। उसने अपने शस्त्रों के अतुल प्रताप से अपने शत्रुओं का विनाश कर दिया।

उस अमल कीर्तिवाले राजा का शुभ चरित अपने समुचित विनय, शान्ति एवं शौर्य आदि के कारण दूर-दूर तक फैला हुआ है। चारों ओर बालक वृद्ध सभी प्रसन्न भाव से उसका गुणगान करते रहते हैं।

पिता की मृत्यु के पश्चात् उसने वंश की विलुप्त लक्ष्मी को अपने बाहु-बल द्वारा शत्रुओं को विजित कर फिर से स्थापित किया।

और तब वह विजयी होकर अपनी आँसू भरे माँ के पास परितोष के निमित्त उसी प्रकार गया जिस प्रकार कृष्ण देवकी के पास गये थे।

उसने अपनी सेना की सहायता से वंश की विचलित प्रतिष्ठा को फिर से स्थापित किया। अपने बाहुबल से पृथ्वी पर विजय प्राप्त की। साथ ही, उसने विजित एवं आर्तजनों के प्रति दया भाव भी व्यक्त किया। अपने दिनों-दिन बढ़ते हुए प्रताप के प्रति उसने कभी न तो गर्व किया और न कभी आश्चर्य प्रकट किया। [वरन्] वृत्त कथन कहने वाले ही उसे अपने गीतों और स्तुतियों में उसे आर्य कहा करते थे।

युद्ध में उसके बाण शत्रुओं में हलचल (जलावर्त) मचा देते थे और आकाश और नदी के बीच धनुष के टंकार प्रतिध्वनित हो उठते थे, और जब हूण अपने दोनों बाहुओं के सहारे पृथ्वी पर गिरते थे तो पृथ्वी कम्पित हो उठती थी। अपने पिता की कीर्ति …….. किसी की प्रतिमा बनाना कर्त्तव्य है, यह सोचकर जब तक चाँद और तारे रहें तब तक स्थायी रहने के निमित्त (उसने शार्ङ्गिण की प्रतिमा [यहाँ] प्रतिष्ठापित की और [अपने] पिता की पुण्य की वृद्धि के लिये उसने इस ग्राम को (उस देवता) को प्रदान किया; उसीका यह

सुप्रतिष्ठित शासन है। इस प्रकार भगवान् की यह प्रतिमा तथा जहाँ वह स्थापित है [ वह गाँव], दोनों उसने पुण्य अर्जन के निमित्त अर्पित किया।

टिप्पणी

भीतरी स्तम्भलेख स्कन्दगुप्त द्वारा अपने पिता (कुमारगुप्त प्रथम) की कीर्ति और पुण्य के निमित्त मन्दिर निर्माण कराकर शार्ङ्गिण (भगवान विष्णु सम्भवतः श्रीराम) की प्रतिमा को स्थापित करने और उसके निमित्त ग्राम दान देने की विज्ञप्ति है। सम्भवतः यह प्रतिमा ईटों के बने उस विशाल मन्दिर के भीतर स्थापित की गयी थी, जिसके धरातल के अवशेष काशी विश्वविद्यालय द्वारा स्तम्भ से सटे भू-भाग के उत्खनन कराये जाने से प्रकाश में आया है। जान पड़ता है स्तम्भ, जिस पर यह लेख अंकित है, मन्दिर का ध्वज-स्तम्भ था। लेख की अन्तिम तीन-चार पंक्तियाँ क्षतिग्रस्त और अस्पष्ट हैं जिसके कारण इरस मन्दिर तथा उसे दिये गये ग्राम-दान सम्बन्धी जानकारी अधिक उपलब्ध नहीं हो पाती है। अनुमान किया जा सकता है कि भितरी ग्राम ही, जहाँ स्तम्भ से सटे मन्दिर के अवशेष मिले हैं, दान में दिया गया रहा होगा। भण्डारकर की धारणा है कि मूर्ति का नाम पिता के नामारूप कुमारस्वामिन था।

इस लेख की आरम्भिक १५ पंक्तियों में स्कन्दगुप्त का प्रशस्ति-गान है। इन्हीं पंक्तियों के कारण ही इस अभिलेख का ऐतिहासिक महत्त्व माना जाता है। समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति के समान ही स्कन्दगुप्त के प्रसंग में इसका महत्त्व है। अतः इन्हीं पंक्तियों के सम्बन्ध में लोगों ने समय-समय पर विचार प्रकट किये हैं। चन्द्र के मेहरौली-लौह-स्तम्भ लेख के बाद यही अभिलेख बहु-चर्चित रहा है। इन पंक्तियों में अनेक स्थलों का पाठ अस्पष्ट है अतः ऐसे स्थलों का पाठ अनुमानपरक ही है। ऐसे स्थलों के जे० एफ० फ्लीट द्वारा अनुमानित पाठों को बिना किसी ऊहापोह के मूल पाठ के रूप में स्वीकार किया जाता रहा है, किन्तु ये स्थल पुनर्परीक्षणीय और विवेचनीय हैं।

आरम्भ की ६ पंक्तियों में गुप्त वंश की वंशावली गद्यात्मक रूप में लगभग उन्हीं शब्दों में प्रस्तुत की गयी है जिन शब्दों में वह कुमारगुप्त (तृतीय) के भितरी से प्राप्त धातु-मुद्रालेख में उपलब्ध होती है। इस लेख में यह वंशावली कुमारगुप्त (प्रथम) तक आकर समाप्त हो गयी है।

समुद्रगुप्त से आरम्भ होकर स्कन्दगुप्त तक के पूर्ववर्ती तथा उसके उत्तरवर्ती राजाओं के जिन अभिलेखों में वंश-परम्परा का उल्लेख हुआ है उन सबमें पिता-माता दोनों का नाम निरपवाद रूप में पाया जाता है। स्कन्दगुप्त के इस अभिलेख में उसके पिता के नामोल्लेख तक उसी परम्परा का पालन किया गया है; किन्तु स्वयं उसके उल्लेख के प्रसंग में उसकी माता के नाम की कोई चर्चा नहीं है, जो आश्चर्यजनक है सामान्य रूप से इस स्थल पर कुमारगुप्तस्तस्य पुत्र तत्पादानुध्यात (अथवा परिगृहीत) महादेव्यां [माता का नाम] वेब्यामुत्पन्नो महाराजाधिराज श्री स्कन्दगुप्तः होना चाहिए था, किन्तु उसके स्थान पर माता के नाम की सर्वथा उपेक्षा कर लम्बे-चौड़े विरुद के साथ इस बात की घोषणा की गयी है कि स्कन्दगुप्त कुमारगुप्त का पुत्र है (सुतोयम्) जिस रूप में माता के नाम की यहाँ उपेक्षा हुई है, उसे कवि, लेखक अथवा उत्कीर्णक की मात्र भूल कहकर टाला नहीं जा सकता।

प्रशस्तिकार ने श्लोक ४ (पंक्ति १३) में विलुप्त वंश-लक्ष्मी को अपने भुज-बल से स्थिर करने के उपरान्त अपनी माँ के पास जाने की बात कही और इस घटना की तुलना कृष्ण के देवकी के पास जाने से की गयी है। इसके आधार पर कतिपय विद्वानों की धारणा है कि स्कन्दगुप्त की माता का नाम भी देवकी था।

माँ के नाम की इस स्पष्ट उपेक्षा के अतिरिक्त भी इस लेख में कुछ ऐसी बातें हैं जिनसे स्कन्दगुप्त के राज्याधिकार की वैधता के प्रति सन्देह उत्पन्न होता है। सभी अभिलेखों में गुप्त-राजाओं के पितृ-सम्बन्ध को व्यक्त करने के लिए समान भाव से तत्पादानुध्यात शब्द का प्रयोग पाया जाता है। इस सीधे-सादे शब्द का प्रयोग न कर इस लेख में स्कन्दगुप्त के लिए पितृ-परिगत पाद-पद्मवर्ती विशेषण का प्रयोग किया गया है। जैसा कि वि० प्रा० सिन्हा ने इंगित किया है, परम्परागत रूढ़ सहज पद के भाव का इस प्रकार घुमा-फिराकर प्रस्तुतिकरण मात्र कवि-कल्पना नहीं मानी जा सकती। यहाँ भी परम्परा की साभिप्राय उपेक्षा ही है।

स्कन्दगुप्त विरुदावली के अनुसार वीर था और उसमें मानवोचित गुण भी भरे हुए थे। उसके गुणों की विरुदावली प्रशस्तिकार ने छ सात श्लोकों में छन्द-बद्ध की है। प्रथम तीन श्लोकों में उसके सामान्य गुणों की चर्चा है। बाद के श्लोक ही इतिहास की दृष्टि से महत्त्व रखते हैं। उन्हीं की ओर ही इतिहासकारों ने विशेष ध्यान दिया है। इन श्लोकों में स्कन्दगुप्त द्वारा शत्रुओं के साथ किये गये संघर्ष की चर्चा है।

भण्डारकर आदि विद्वानों की धारणा है कि यह संघर्ष कुमारगुप्त की मृत्यु के अनन्तर हुआ था। इन शत्रुओं में वे कुमारगुप्त की किसी नाग-पत्नी के भाई को देखते हैं। उनके अनुसार उसने राज्य के किसी दावेदार राजकुमार और हूणों का पक्ष लिया था। स्कन्दगुप्त ने उन्हें पराजित किया और राज्यासीन हुआ। इस प्रकार वे श्लोक ४ से ८ तक को एक ही संघर्ष से सम्बद्ध वृत्त मानते हैं। इसके विपरीत वी० वी० मीराशी का कहना है कि इन श्लोकों में एक नहीं, तीन क्रमिक घटनाओं की चर्चा है। श्लोक ४-५ में वे कुमारगुप्त के जीवन-काल में शत्रुओं के साथ संघर्ष की कल्पना करते हैं। उस संघर्ष में स्कन्दगुप्त विजयी हुआ था और फलस्वरूप उसका गुणगान आबाल-वृद्ध करते थे। श्लोक ६-७ में वे कुमारगुप्त की मृत्यु के पश्चात् गृह कलह और श्लोक ८ में हूणों के साथ संघर्ष की चर्चा का अनुमान करते हैं।

कुमारगुप्त के जीवन काल में हुए शत्रुओं के जिस संघर्ष की कल्पना वे करते हैं उसमें, उनका कहना है कि वाकाटक नरेश प्रवरसेन (द्वितीय) भी सम्मिलित था। इसका संकेत उन्होंने इन्दौर से मिले एक ताम्रलेख में देखने की चेष्टा की है।

किन्तु हमें इन श्लोकों में, श्लोक ८ को छोड़कर, जिसमें हूणों का उल्लेख है, कोई भी पंक्ति या शब्द ऐसा दिखाई नहीं देता, जिसके आधार पर हम कह सकें कि स्कन्दगुप्त को अपने पिता के जीवनकाल में अथवा पिता के मृत्यूपरान्त किसी बाहरी शत्रु से संघर्ष करना पड़ा था। हमारी दृष्टि में प्रशस्तिकार ने इन पंक्तियों में गृह-कलह अथवा राजकुमारों से राज्याधिकार प्राप्ति के लिए संघर्ष की ही विस्तृत चर्चा की है। इस सम्बन्ध में निम्न पक्तियाँ ध्यातव्य हैं –

१. विचलित-कुल-लक्ष्मी स्तम्भनायोद्यतेन (श्लोक ४, प्रथम चरण, पंक्ति १०)।

२. पितरि दिवमुपेते विलुप्तां-वंश-लक्ष्मी भुज-बल विजितारिवर्व्य प्रतिष्ठाप्य भूयः (श्लोक ६, प्रथम चरण, पंक्ति १२-१३)

३. चलितंवंश प्रतिष्ठाप्य (श्लोक ७, प्रथम चरण, पंक्ति १४)

इन पंक्तियों से ज्ञात होता है कि पिता (कुमारगुप्त, प्रथम) की मृत्यु के पश्चात् कुल-लक्ष्मी विचलित हो गयी थीं अथवा विलुप्त हो रही थीं और वंश की प्रतिष्ठा डाँवाडोल थी। उस समय स्कन्दगुप्त ने अपने भुज-बल से शत्रुओं का दमन कर उसको पुनः प्रतिष्ठित किया। ये शत्रु कौन थे जिनके कारण कुल-लक्ष्मी विचलित हो उठी थीं यह कहीं स्पष्ट नहीं कहा गया है। पंक्ति ११ (श्लोक ४ का द्वितीय चरण) के कुछ अंश अस्पष्ट हैं।

फ्लीट ने अनुमानतः उनका पाठ पुष्यमित्रांश्व प्रस्तुत किया है। वायुपुराण के अनुसार नर्मदा नदी के उद्गम के निकट पुष्यमित्र नाम की एक जाति रहती थी। यदि यह पाठ ठीक है तो यह अनुमान किया जा सकता है कि स्कन्दगुप्त को इस जाति के कारण ही कठिनाइयों का सामना करना पड़ा था। अधिकांश विद्वानों ने फ्लीट के इस पाठ को स्वीकार कर इसे तथ्य परक घटना मान लिया है और उसी का प्रतिपादन करते आ रहे हैं। उन लोगों ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया है कि पुष्यमित्र नामक जाति गुप्त साम्राज्य के विरुद्ध विद्रोह तो कर सकती थी, पर वह इतनी नगण्य थी कि विद्रोह इतना भयंकर नहीं हो सकता था जिससे गुप्त साम्राज्य की राज्य लक्ष्मी विचलित हो जाय। अतः निश्चित-रूपेण यह मूल पाठ न होगा अतः ह० र० दिवेकर ने इस स्थल पर पुष्यमित्रांश्च के स्थाना में युद्धमित्रांश्व (युद्ध में शत्रु) पाठ का सुझाव दिया है और उसे भण्डारकर ने भी अपनाया है। इस संशोधित पाठ को स्वीकार करनेवाले लोग ने इस पाठ के आधार पर यह प्रतिपादन किया है कि यहाँ सामान्य रूप से शत्रुओं का उल्लेख है, किसी जाति विशेष का नहीं किन्तु हमें इस पाठ का भी औचित्य नहीं जान पड़ता युद्ध करनेवाला प्रतिपक्षी सदैव शत्रु ही होता है, मित्र नहीं। अतः युद्धमित्रान् का यह प्रयोग अपने-आपमें असंगत और हास्यास्पद-सा लगता है। अतः यह पाठ भी अग्रहणीय है।

उचित विवेचन के लिए श्लोक ४ पर समग्र रूप से ध्यान देना उचित होगा। फ्लीट ने इस श्लोक का अनुवाद इस प्रकार किया है— When he prepared himself to restore the fallen fortune of (his) family, a (whole) night was spent on a couch that was the bare earth; and then having conquered the Pushyamitras, who had developed great power and wealth, he placed (his) left foot on a foot-stool which was the king (of the tribe himself) (जब उसने अपने को ) अपने कुल की लक्ष्मी को पुनर्स्थापित करने के लिए तैयार किया, तब [उसने] एक (पूरी) रात नग्नभूमि रूपी शया पर व्यतीत की, तदन्तर शक्ति और सम्पत्ति में बढ़े हुए पुष्यमित्रों को जीतकर उसने (उसी जन-जाति के) राजारूपी पाद पीठ पर (अपना) बायाँ पैर रखा। भण्डारकर ने इस श्लोक को संशोधित कर अनुवाद इस रूप में प्रस्तुत किया है—As he was intent upon steadying the tottering sovereignty of the House, several nights were spent on a bed, namely, the earth, and having in a battle vanquished enemies who had developed forrces and treasure, (his) left foot was placed on the royal foot-stool (वह अपने कुल की विचलित लक्ष्मी को स्थिर करने के लिए दृढसंकल्प हुआ, इसने अनेक रातें भू-शैया पर व्यतीत की और उन शत्रुओं को, जिन्होंने बल और कोश एकत्र कर लिया था, नष्ट कर राज्य के पादासन पर अपना बायाँ पैर रखा।)।

फ्लीट और भण्डारकर दोनों ने इस रूप में श्लोक का मूल का भाव ग्रहण न कर उसका शाब्दिक अनुवाद मात्र प्रस्तुत किया है। इस प्रसंग में ध्यातव्य है कि प्रशस्तिकार ने स्कन्दगुप्त के पिता को प्रथम श्लोक के तृतीय पद में पृथ्वी-पति और पृथु श्री कहा है। उसी के बेटे को फ्लीट के शब्दों में हम यहाँ इतनी दयनीय स्थिति में पा रहे हैं कि उसे नंगी पृथिवी पर सोना पड़ा; दूसरी ओर हम उसके शत्रु (पुष्यमित्र) को बल और कोश से भरा-पूरा पाते हैं। सोचने की बात है कि कोई भी शासक चाहे जिस भी परिस्थिति में हो, उसकी स्थिति इतनी दयनीय नहीं हो सकती कि उसे नंगी भूमि पर सोना पड़े। दूसरी ओर कोई शत्रु चाहे वह कितना भी बड़ा क्यों न हो, वह अपनी सीमा से बाहर कभी भी समुचित सैन्य और धन से सम्पन्न नहीं हो सकता। उसके पास सीमित ही सेना और अर्थ-साधन होंगे। कोई भी प्रशस्तिकार अपने संरक्षक के लिए, इस तरह की बात सत्य होते हुए भी कहने की धृष्टता नहीं कर सकता। साथ ही यह बात भी ध्यान देने की है कि बाह्य शत्रुओं के आक्रमण का प्रभाव राज्य पर पड़ता है; राज्य-लक्ष्मी विचलित और विलुप्त हो सकती हैं, कुल-लक्ष्मी नहीं। यदि प्रशस्तिकार का तात्पर्य किसी बाह्य शत्रु से होता तो वह राज्य लक्ष्मी का उल्लेख करता, कुल-लक्ष्मी का नहीं। उपर्युक्त तीनों ही अवतरणों में से किसी में भी राज्य लक्ष्मी की कोई चर्चा नहीं है, प्रशस्तिकार ने कुल-लक्ष्मी, वंश-लक्ष्मी, वंश प्रतिष्ठा की ही चर्चा की है। इस श्लोक में जिस स्थिति की चर्चा है वह वंश से ही सम्बन्ध रखती है, किसी बाह्य शत्रु से नहीं। स्पष्टतः यहाँ बात गृह कलह की ही कही गयी है, किसी बाह्य शत्रु के आक्रमण की नहीं। गृह कलह में ही कुल-लक्ष्मी की स्थिति डाँवाडोल होती है।

शासन अधिकार प्राप्त करने में स्कन्दगुप्त को राजकुमारों से संघर्ष करना पड़ा था, इसका संकेत जूनागढ़ अभिलेख में उपलब्ध है। उसी परिप्रेक्ष्य में इस स्थल को भी देखना उचित होगा कि कवि ने इसी तथ्य को यहाँ अपनी कवित्वपूर्ण आलंकारिक भाषा में प्रस्तुत किया है। उसके कहने का तात्पर्य यह है कि जब कुल-लक्ष्मी विचलित हो उठी थीं अर्थात् राज्याधिकार के लिए गृह कलह मच रहा था उस समय, आरम्भ में कुछ काल तक स्कन्दगुप्त साधन-हीन और असहाय रहा, बाद में वह अधिकार प्राप्त करने में सफल हुआ। इसके लिए वह जिस समुचित साधन के जुटाने में समर्थ हुआ उसीका उल्लेख इस श्लोक के प्रथम चरण में हुआ है। उसमें बल और कोश के आगे किसी शत्रु-पुष्यमित्र या अन्य शत्रु का उल्लेख न होकर निश्चित कुछ अन्य साधनों का ही उल्लेख होना चाहिये। इसी बात को ध्यान में रखकर सोहोनी ने पुष्यमित्रांश्च जित्वा / युद्धमित्रांश्च जित्वा पाठ के स्थान पर राष्ट्र-मित्राणियक्त्वा पाठ का सुझाव दिया है। प्रजा (राष्ट्र) और मित्रों की सहायता से ही स्कन्दगुप्त बल और कोश प्राप्त करने, अपने प्रतिद्वन्द्वियों को कुचलने और राज्याधिकार प्राप्त करने में समर्थ हुआ होगा; इसी बात को कवि ने क्षितिप-चरण-पीठे-स्थापितो वामपादः के रूप में व्यक्त किया है।

भारतीय मूर्तिकला, चित्रकला, मुद्रा एवं संस्कृत साहित्य में जहाँ कहीं भी राज दरबार का अंकन हुआ है, राजा अपना बायाँ पैर पादासन पर रखे अंकित किया गया है। यह एक रूढ़ प्रतीक था इसी प्रतीक को कवियों ने शत्रु के प्रति हेय भाव प्रदर्शित करने के लिए उपर्युक्त पद अथवा उससे मिलते-जुलते पदावली का प्रयोग किया है। विजित शासक के सिर या पीठ पर विजयी शासक द्वारा पैर रखने की बात सर्वथा अनजानी और शिष्टता के प्रतिकूल है। जब कोई अधीनस्थ या करद शासक प्रभुसत्ता के सम्मुख उपस्थित होता था तो वह अधिक-से-अधिक उसके चरण पर अपना सिर टेकता था; वह भी तब जब उसे उसकी अनुमति प्राप्त होती उपर्युक्त वाक्यावली सामान्य बोलचाल के मुहावरे पैरों तले कुचलने का समानार्थी है उसका तात्पर्य केवल इतना ही है कि स्कन्दगुप्त ने अपने शत्रुओं को पराभूत कर दिया।

श्लोक ७ में इस बात का उल्लेख है कि शत्रुओं को पराजित कर कुल-लक्ष्मी को पुनर्स्थापित कर स्कन्दगुप्त ने अपने विजय की सूचना अपनी माँ को उसी प्रकार दी जिस प्रकार कृष्ण ने कंस वध की सूचना दी थी। कृष्ण-देवकी की इस उपमा से न० न० दासगुप्त ने यह अनुमान किया है कि स्कन्दगुप्त की माँ पुष्यमित्र कुल (जिसके उल्लेख की कल्पना फ्लीट ने पंक्ति ११ में की थी और जिसे विद्वानों ने आँख मूंद कर मान रखा है) की थी; वह कुल स्कन्दगुप्त-विरोधी था इस कारण पुष्यमित्रों की पराजय उसकी माँ के लिए आनन्द का विषय था दिनेशचन्द्र सरकार की भी धारणा है कि स्कन्दगुप्त ने अपने मामा से युद्ध किया था किन्तु इस श्लोक में कहीं भी मामा-भांजे के बीच संघर्ष जैसी कोई बात नहीं है। राजकुमारों के साथ राज्याधिकार की प्रतिद्वन्द्विता के बीच, अपनी अवैध स्थिति के कारण स्कन्दगुप्त की माँ की स्थिति वैसी ही रही होगी जैसी देवकी की कंस के बन्दी-गृह में थी। अतः राजकुमारों के पराजय के पश्चात् स्कन्दगुप्त उल्लसित होकर अपनी माँ के पास उसी प्रकार गया होगा जिस प्रकार कंस वध के उपरान्त कृष्ण देवकी के पास गये थे उसकी माँ ने त्रास से मुक्ति की साँस उसी प्रकार ली होगी जिस प्रकार बन्दी गृह से मुक्त होकर देवकी ने लिया होगा इस प्रकार इस अभिलेख में स्कन्दगुप्त के राज्याधिकार-प्राप्ति के प्रयत्नों और परिणामों की विशद चर्चा है। उसमें उसके किसी बाह्य शत्रु के पराजित करने जैसी कहीं कोई बात नहीं है।

राज्याधिकार के संघर्ष से मुक्त होने के बाद शासक होने पर ही स्कन्दगुप्त ने किसी बाहरी शत्रु की ओर ध्यान दिया होगा। इससे पूर्व यदि उसने कोई सैनिक अभियान किया हो तो वह अपने पिता (कुमारगुप्त प्रथम) के जीवनकाल में ही किया होगा। प्रशस्ति में यदि किसी बाहरी शत्रु का उल्लेख है तो वह हू का ही है और वह भी श्लोक ८ में। किन्तु इस श्लोक में ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे किसी प्रकार का कोई निश्चित और स्पष्ट निष्कर्ष प्राप्त किया जा सके। इससे इतना ही अनुमान किया जा सकता है कि स्कन्दगुप्त को हूणों से संघर्ष करना पड़ा था पर कब और उसका परिणाम क्या हुआ, कुछ नहीं कहा जा सकता। कुछ विद्वानों की धारणा है कि स्कन्दगुप्त ने उन्हें परास्त कर भगा दिया। यह भी धारणा है कि यह युद्ध शासनाधिकार प्राप्त करने के बाद ही हुआ होगा। किन्तु सोहोनी आदि विद्वान् इसके कुमारगुप्त (प्रथम) के ही जीवनकाल में घटने का अनुमान करते हैं।

इस श्लोक में आया धरा कम्पितैः का सम्बन्ध फ्लीट एवं अन्य विद्वान् स्कन्दगुप्त से जोड़ते हैं और अर्थ करते हैं कि उसकी दोनों भुजाओं से पृथ्वी कम्पायमान हुई किन्तु वस्तुतः इसका सम्बन्ध हूणों से है। इसका भाव यह कि युद्ध-क्षेत्र में जब हूण पृथ्वी पर गिरते थे तो पृथ्वी कम्पित हो उठती थी। संस्कृत-साहित्य में शत्रुओं के गिरने पर उनके भार से पृथ्वी के कम्पित हो उठने की चर्चा प्रायः मिलती है। उसी प्रकार की चर्चा यहाँ भी है। सासानीकाल के ईरानी मूर्ति फलकों पर हूणों को पृथ्वी पर गिरते समय दोनों हार्थों का सहारा लेते दिखाया गया है। उसी प्रकार कवि ने यहाँ भी हूणों पर गिरते समय दोनों हाथ का सहारा लेने की बात कही है।

हूणों के साथ यह युद्ध कहाँ हुआ था, इसका कोई संकेत अभिलेख में कहीं उपलब्ध नहीं है। कुछ विद्वानों की धारणा है कि यह युद्ध गुप्त साम्राज्य के पश्चिमी भाग में कहीं हुआ होगा, पर सोहोनी की धारणा है कि हूण गुप्त साम्राज्य के भीतर दूर तक घुस आये थे और उनके साथ युद्ध गुप्तों के गृह-प्रदेश (Home territories) के निकट ही भितरी के आसपास ही कहीं हुआ होगा। उनकी यह भी धारणा है कि यह युद्ध कुमारगुप्त के समय में ही हुआ था और उसी में वह मारा गया। उनका यह भी कहना है कि यदि यह बात न होती तो इस स्थान पर कुमारगुप्त के स्मृति-स्वरूप मन्दिर स्थापित करने की (जिसकी चर्चा श्लोक १०-११ में हुई हैं) का कोई तुक न था।

स्कंदगुप्त का जूनागढ़ अभिलेख

कहौम स्तम्भ-लेख

सुपिया स्तम्भ-लेख

इंदौर ताम्र-लेख – गुप्त सम्वत् १४६ ( ४६५ ई० )

पाँचवाँ गढ़वा अभिलेख, गुप्त सम्वत् १४८ ( ४६७ ई० )

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