हाथीगुम्फा अभिलेख

भूमिका

हाथीगुम्फा अभिलेख उड़ीसा में भुवनेश्वर के निकट खोर्धा जनपद में उदयगिरि पर्वतमाला में अंकित है। उदयगिरि और उससे पास ही खण्डगिरि में मौर्योत्तरकाल में कलिंग नरेश खारवेल ने जैन यतियों ( मुनियों ) के लिए गुफाएँ बनवायीं थीं। उदयगिरि में १९ गुफाएँ और खण्डगिरि में १६ गुफाएँ हैं।

उदयगिरि के १९ गुफाओं में से हाथीगुम्फा नामक भी एक है। इसी हाथीगुम्फा के ऊपरी भाग में पाली से मिलती-जुलती प्राकृत भाषा और ब्राह्मी लिपि में यह लेख उत्कीर्ण है।

हाथीगुम्फा अभिलेख काल के सम्बन्ध में बहुत मतभेद है। फिरभी लिपिशास्त्र के आधार पर इसका समय प्रथम शताब्दी ई०पू० माना गया है। इसके रचयिता का नाम भी नहीं दिया गया है।

सर्वप्रथम १८२५ ई० में हाथीगुम्फा शिलालेख की खोज बिशप स्टर्लिंग ने की। जेम्स प्रिंसेप ने इसका उद्वाचन किया परन्तु वह अशुद्ध था। सन् १८८० ई० में राजेन्द्र लाल मित्र ने इस शिलालेख का पाठ करके प्रकाशित किया परन्तु वह भी अपूर्ण रहा। सन् १८७७ ई० में जनरल कनिंघम और १८८५ ई० में भगवान लाल इन्द्र द्वारा इस अभिलेख का शुद्ध पाठ प्रस्तुत किया गया जिसमें शासक का नाम ‘खारवेल’ शुद्ध रूप पढ़ा गया।

पहली बार सन् १९१७ ई० में डॉ० के० पी० जायसवाल ने इस अभिलेख का छायाचित्र ‘जर्नल ऑफ बिहार एण्ड उड़ीसा रिसर्च सोसायटी’ में प्रकाशित करवाया। तदुपरान्त आर० डी० बनर्जी, ब्यूलर, फ्लीट, टामस, बी० एम० बरुआ, स्टेनकोनो, डी० सी० सरकार, शशिकांत आदि अनेक विद्वानों ने इस अभिलेख पर शोधपूर्ण कार्य किये।

हाथीगुम्फा अभिलेख एक प्रशस्ति के रूप में है। इस अभिलेख का मुख्य उद्देश्य खारवेल के जीवन और उपलब्धियों को सुरक्षित रखना है।

हाथीगुम्फा अभिलेख : संक्षिप्त परिचय

नाम :- हाथीगुम्फा अभिलेख ( शिलालेख ) या खारवेल का हाथीगुम्फा अभिलेख ( Hathigumpha Inscription of Kharvel )

स्थान :- उदयगिरि पहाड़ी, खोर्धा जनपद ( Khordha District ), भुवनेश्वर के समीप, ओडिशा राज्य

भाषा :- प्राकृत

लिपि :- ब्राह्मी

समय :- लगभग पहली शताब्दी ई०पू० का उत्तरार्ध ( मौर्योत्तरकाल )

विषय :- कलिंग नरेश खारवेल का इतिहास

हाथीगुम्फा अभिलेख : प्रमुख तथ्य

  •  यह खारवेल के १३ वर्षीय शासन का क्रमिक विवरण प्रस्तुत करता है।
  •  नंदराजा द्वारा नहर ( तनसुलि ) बनवाने का प्राचीनतम् उल्लेख करता है। अर्थात् नहर के सम्बन्ध में जानकारी देने वाला पहला अभिलेखीय साक्ष्य है। यद्यपि गुजरात में निर्मित सुदर्शन झील व नहर इतिहास में सबसे अधिक प्रसिद्ध है क्योंकि इसको चन्द्रगुप्त मौर्य ने बनवाया, अशोक, रुद्रदामन व स्कंदगुप्त ने जीर्णोद्धार कराया था।
  • जिन प्रतिमा का प्रचीनतम् उल्लेख मिलता है। अर्थात् जैन धर्म में मूर्ति पूजा का प्राचीनतम अभिलेखीय साक्ष्य है।
  • भारतवर्ष शब्द का सर्वप्रथम किसी अभिलेख में प्रयोग किया गया है।

हाथीगुम्फा अभिलेख : मूलपाठ

१. नमो अरहंतानं [ । ] नमो सव-सिधानं [ ॥ ] ऐरेण महाराजेन महामेघवाहनेन चेति-राजवंस-वधनेन पसथ-सुभ-लखनेन चतुरंतलुठ- [ ण ]-गुण-उपितेन कलिंगाधिपतिना सिरि-खारवेलेन

२. [ पं ] दरस-वसानि सीरि- [ कडार ] -सरीर वता कीडिता कुमार-कीडिका [ । ] ततो लेख-रूप-गणना-ववहार-विधि-विसारदेन सव विजावदा तेन नव-वसानि योवरज [ प ] सासितं [ । ] संपुणचतुवीसति-वसो तदानि वधमासेसयो-वेनाभिविजयो ततिये

३. कलिंग-राज-वंसे-पुरिस-युगे महाराजाभिसेचनं पापुनाति [ ॥ ] अभिसितमतो च पधमे वसे वात-विहत-गोपुर-पाकार-निवेसनं पटिसंख्यारयति कलिंगनगरि-खिबी [ रं ] [ । ] सितल-तडाग-पाडियों च बंधापयति सवूयान-प [ टि ] संथपनं च

४. कारयति पनतिसाहि-सत सहसेहि पकतियों च रंजयति [ ॥ ] दुतिये च वसे अचितयिता सातकंनि पछिम दिसं हयं-गज-नर-रध बहुलं दंडंपठापयति [ । ] कन्हबेंणां-गताय च सेनाय वितासिति असिकनगर [ ॥ ] ततिये पुन वसे

५. गंधव-वेद-बुधो दप-नत-गीत-वादित-संदसनाहि उसव-समाज-कारापनाहि च कीडापयति नगरिं [ ॥ ] तथा चवथे वसे विजा-धराधिवासं अहत-पुवं कलिंग पुव-राज- [ निवेसित ] …… वितधम [ कु ] ट [ सविधिते ] च निखत-छत-

६. भिंगारे [ हि ] त-रतन-सपतेये सव-रठिक-भोजकेपादे वंदापयति [ ॥ ] पंचमे च दानी वसे नंदराज-ति-वस-सतो [ घा ] टितं तनसुलिय-वाटा-पणाडिं नगरं पवेस [ य ] ति सो …… [ । ] [ अ ] भिसितो च [ छठे वसे ] राजसेय संदंसयंतो सवकर-वण-

७. अनुगह-अनेकानि सत-सहसानि विसजति पोर जानपदं [ ॥ ] सतमं व वसे [ पसा ] सतो वजिरघर [ वति धुसित धरिनी [ । ] सा मतुक पदं पुंनो [ दया तपापुनाति ] [ ॥ ] अठमे च वसे महता-सेन [ । ] य [ अपतिहत-भिति ] गोरधगिरिं

८. घाता पयिता राजगहं उपपीडपयति [ । ] एतिनं च कंमपदान संनादेन [ संवित ] सेन-वाहने विपमुचितु मधुरं अपयातो यवनरा [ ज ] [ विमिक ]…….. यछति………. पलव [ भार ]

९. कपरुखे हय -गज-रथ-यह यति सव-घरावासो [ पूजित-ठूप-पूजाय ] सव-गहणं च कारयितुं बम्हाणानं ज [ य ] -परिहार ददाति [ ॥ ] अरहत च- [ पूजति। नवमे च वसे सुविजय ]

१०. [ ते उभय प्राचीतटे ] राज-निवासं महाविजय-पासादं कारयति अठतिसाय सत-सतसेहि [ ॥ ] दसमे च वसे दंड-संधी-सा [ ममयो ] भरध वस-पठानं मही जयनं ( ? ) …… कारापयति [ ॥ ] [ एकादसमे च वसे ] …… प [ । ] या-तानं च म [ नि ] -रतनानि उपलभते [ । ]

११. [ दखिन दिसं ][ मंद ] च अवराज निवेसितं पीथुण्डं गदभनंगलेन कासयति [ । ] जन- [ प ] द भावनं च तेरस-बस-सत-कतं भिंदति तमिर-दह-संघातं [ । ] बारसमे च वसे …… [ सह ] सेहि वितासयति उतरापथ-राजानो ……

१२. म [ । ] गधानं च विपुलं भयं जनेतो हथसं गंगाय पाययति [ । ] म- [ ग ] धं च राजानं बहसतिमितं पादे वंदापयति [ । ] नंदराज-नीतं चका [ लिं ] ग-जिनं संनिवेस१० [ पूजयति। कोसात ] [ गह ] रतन-पडीहारेहि अंग-मगध वसुं च नयति [ ॥ ]

१३. …..[ के ] तुं जठर [ लखिल-गोपु ] राणि-सिहराणि निवेसयति सत-विसिकनं [ प ] रिहारेहि [ । ] अमुतमछरियं च हथि-नाव-नीतं परिहरति…… हय हथि-रतन [ मानिक ] पंडराजा [ चेरानि अनेकानि मुत-मनि-रतनानि आहारापयति इध सत [ सहसानि ]

१४. ……११  सिनो वसीकारोति [ । ] तेरसमे च वसे सुपवत-विजयचके कुमारीपवते अरहते पखिन सं [ सि ] तेहि काय-निसीदियाय यापुजावकेहि राजभितिना चिन-वतानि वासा- [ सि ] तानि पूजानुरत उवासग-खारवेल-सिरिना जीवदेह- [ सिरिका ] परिखाता [ ॥ ]

१५. [ निमतितेन राजा सिरि-खारवेलेन ]१२ सुकत समण सुविहितानं च सवदिसानं ञ [ नि ] नं तपसि-इ [ सि ] न संघियनं अरहतनिसीदिया-समीपे पाभारे वराकार-समुथापिताहि अनेक-योजना-हिताहि [ पनतिसत सहसेहि ] सिलाहि [ सिपिपथभा-निवध-सयनासनां वा ]१३

१६. …… [ पटलके ] चतारे च वेडुरिय-गभे थंमें पतिठापयति [ । ] पानतरोय-सत-सहसेहि मु [ खि ] य कल वोछिनं च चोया [ ठ ] -अगं सतिकं तुरियं उपादयति [ । ] खेम-राजा स वढ-राजा स भिखु-राजा धम-राजा पसं [ तो ] सुनं [ तो ] अनुभवं [ तो ] कलनानि [ । ]

१७. [ पानतरिय-पनतिसत वस ]१४ गुण-विसेस कुसलो सब पासंडपूजको सव-दे [ वाय ] तन-सकार-कारको अपदिहतचकवाहन-बलो चकधरोगुत-चको पवत-चको राजसि-वंस१५ कुल विनिशितो महाविजयो राजा खारवेल सिरि [ । ]

  • जायसवाल और बनर्जी इसे मुसिकनगर पढ़ते हैं।
  • जायसवाल ने राजसूय पाठ सुझाया है। दिनेशचन्द्र सरकार का कहना है कि खारवेल जैसे जैन-धर्मावलम्बी राजा द्वारा राजसूय यज्ञ किये जाने की सम्भावना नहीं है।
  • इसका एक अन्य पाठ है :- वाजिरधर-खतिया-धरिनि।
  • शशिकान्त का पाठ है …… यमुना [ नदी ] …… [ सबर-राजान-च ] गछति। यह पाठ मौलिक होते हुए भी चिन्त्य एवं अग्राह्य है। यवनराज पाठ स्पष्ट है। उसके आगे तीन अक्षर हैं जिसमें बीच का मि भी लगभग निश्चित-सा है। अन्य विद्वानों ने यहाँ दिमित याडिमित शब्द होने की कल्पना की है। और उसका तात्पर्य यवन-नरेश दिमित्रि ( डेमिट्रियस ) से माना है। परन्तु यह अनुमान तथ्यपरक नहीं है। इस शिलालेख का एक प्लास्टर कास्ट काशी प्रसाद जायसवाल ने तैयार कराया था जो पटना संग्रहालय में है। जिसका परीक्षण डॉ० परमेश्वरीलाल गुप्त ने किया है। उनके अनुसार पहले अक्षर ‘दि’ की अपेक्षा ‘वि’ और तीसरे अक्षर ‘त’ की अपेक्षा ‘क’ के अवशेष जान पड़ते हैं। अतः नाम विमक या विमिक है और उसका तात्पर्य कुषाण नरेश विम कदफिस ( विम कडफिसेस ) से है। यही ऐतिहासिक तथ्यों के परिप्रेक्ष्य में संगत भी है।
  • यह शशिकान्त द्वारा प्रस्तुत पाठ है और यह पाठ भी संगत जान पड़ता है।
  • यह बरुआ द्वारा प्रस्तुत पाठ है। प्राची तटे को पुति-तटे या पुरि-तटे भी पढ़ा जा सकता है। किन्तु शशिकान्त का कहना है कि इस प्रदेश में प्राची नामक नदी आज भी बहती है अतः प्राचीतटे पाठ अधिक उपयुक्त है।
  • आरम्भ के इस नष्ट अंश की पूर्ति का यह अनुमान शशिकान्त द्वारा किया गया है।
  • यह पाठ जायसवाल द्वारा किया गया है। बरुआ इसे ‘पूवं’ पढ़ते हैं। यही पाठ सरकार ने भी माना है। परन्तु पुव (पुर्व) का कोई सुसंगत अर्थ नहीं बैठता। यहाँ किसी स्थान या व्यक्ति का ही नाम होना चाहिए।
  • जायसवाल का पाठ है ‘हथी सुगांगीय’। वे इसमें मुद्राराक्षस में उल्लिखित मौर्य राजप्रसाद सुगांग का उल्लेख अनुमान करते हैं।
  • बरुआ ने इसे ‘नंदराज-जितं च कलिंग जन-संनिवेसं’ पढ़ा है। संनिवेस के आगे प्रश्नवाचक चिह्न लगा दिया है।१०
  • यहाँ शशिकान्त ने ‘पण्डजनपद वासिनो’ पाठ होने का अनुमान किया है। किन्तु पाण्ड्य अभिप्रेत होने पर उसका पुनरुल्लेख यहाँ अनावश्यक है। अतः यहाँ उसके किसी अन्य देश से ही अभिप्राय होगा।११
  • इसके अस्तित्व का अनुमान शशिकान्त ने किया है।१२
  • यह पाठ बरुआ का है। इसके स्थान पर शशिकान्त ने ‘सिंह-पथ स्त्री सिंधुलाय निसयानि’ पढ़ने की चेष्टा की है।१३
  • यह शशिकान्त की अपनी कल्पना है।१४
  • जायसवाल ने ‘वंस’ के स्थान पर ‘वसू’ पढ़ा है। उसका तात्पर्य के चेदिनरेश उपरिचर वसु से मानते हैं।१५

हिन्दी अनुवाद

१. अर्हतों१६ को नमस्कार। सभी सिद्धों१७ ऐर ( आर्य )१८ महाराज१९ महामेघवाहन, चेति राजवंश की वृद्धि करनेवाले, प्रशस्त शुभ लक्षणों से युक्त, सकल भुव ( चतुरन्त ) में व्याप्त गुणों से अलंकृत, कलिंग-अधिपति श्री से युक्त, पिंगल शरीर वाले श्री खारवेल

२. पन्द्रह वर्ष ( की आयु ) तक राजकुमारों के उपयुक्त क्रीड़ा करते रहे। पश्चात् उन्होंने लेख, रूप२०, गणित, व्यवहार-विधि ( कानून की शिक्षा) में दक्षता प्राप्त की। तदनन्तर सर्व-विद्या में पारंगत होकर नौ वर्ष तक ( उन्होंने ) युवराज के रूप में प्रशासन किया। सम्पूर्ण चौबीस वर्ष पूर्ण कर वे

३. कलिंग राजवंश के तृतीय पुरुष, महाराज के रूप में अभिषेक कराते हैं ( राजा कहाते हैं ) ताकि अपने शेष यौवन को विजयों द्वारा समृद्ध करते रहें। अभिषिक ( राजा ) होने के बाद प्रथम वर्ष में वे तूफान से नष्ट कलिंगनगरी खिबिर२१ के गोपुरों, प्राकारों, मकानों आदि की मरम्मत (प्रतिसंस्कार ) कराते हैं; शीतल जलवाले तालाब के बाँध को सुदृढ़ कराते हैं; सभी बगीचों को नये ढंग से सँवरवाते हैं।

४. इसमें वे ३५ लाख ( मुद्रा ) व्यय करते हैं। ( इस तरह वे ) प्रकृति ( प्रजा ) का रंजन करते हैं। और दूसरे वर्ष सातकर्णि की परवाह न कर ( वे) अश्व, गज, नर, रथ, बहुल सेना-दल पश्चिम दिशा में भेजते हैं। सेना कृष्णवेणा ( नदी ) के तट तक पहुँचकर ऋषिकनगर२२ में आतंक उत्पन्न करती है।२३ फिर तीसरे वर्ष

५. गन्धर्व विद्या में पारंगत ( खारवेल ) दर्प ( अर्थशास्त्र के अनुसार मल्ल युद्ध विशेष ), नृत्य, गीत एवं वादन, उत्सव व समाज का आयोजन कर नगर-वासियों का मनोरंजन कराते हैं और चौथे वर्ष वे विद्याधरों के आवास ( विन्ध्य ) में, जिसे कलिंग का कोई भी पूर्ववर्ती शासक आहत (विजित ) नहीं कर सका था, निवास करते हैं …… जिनके मुकुट नष्ट कर दिये गये,

६. और जिनके छत्र, भृंगार, हरित-रत्न, सम्पत्ति अपहृत कर लिये गये हैं, उन राष्ट्रिक और भोजकों२४ से वे अपने चरणों की वंदना कराते हैं। और पाँचवें, ( इस ) वर्ष वे तनसुलिय-वाटा प्रणाली ( नहर ) को, जिसे नन्दराज२५ ने ३०० ( अथवा १०३ )२६ वर्ष पूर्व खुदवाया था ( सहत्र मुद्रा व्यय करके )२७ नगर में प्रवेश कराते हैं, तथा राज्याभिषेक के [ छठे वर्ष ] में राज्य के ऐश्वर्य के प्रदर्शन के निमित्त सभी राज-कर माफ कर देते हैं और

७. पौर-जानपदों के बीच अनेक लाख [ मुद्राओं ] के अनेक अन्य अनुग्रह विसर्जित करते हैं। और जब वे सातवें वर्ष में शासन करते होते हैं तब [पुण्य के उदय होने से ] उनकी वजिरघरवती नाम्नी गृहिणी ( पत्नी ) माता का पद प्राप्त [ करती ] हैं। फिर आठवें वर्ष में वे अप्रतिहत भित्ति (अजेय दुर्गवाले ) गोरथगिरि२८

८. पर घात ( आक्रमण ) कर राजगृह [ के राजा ] को उत्पीड़ित ( त्रस्त ) करते हैं। इन दुष्कर कर्मों को सम्पादित करते देखकर, उसकी सेना और वाहनों से भयभीत होकर यवनराज विमक२९ मथुरा भाग जाता है। …… [ तब ] वह ( खारवेल ) पल्लव [ भार ] से युक्त

९. कल्पवृक्ष, अश्व-गज-रथ-सैन्य के साथ सब गृहस्थों द्वारा [ पूजित स्तूप की पूजा करने ] जाते हैं और सर्वग्रहण ( अनुष्ठान ) करते हैं और ब्राह्मणों को जय के परिहार के निमित्त [ दान ] देते हैं और अर्हत की [ पूजा करते हैं ]। [ तथा नवें वर्ष में ]

१०. इस सुविजय ( धर्म-कार्य ) के पश्चात अड़तालिस लाख [ मुद्रा ] लगाकर प्राची [ नदी ] के दोनों तटों पर महाविजय [ नामक ] प्रासाद का निर्माण करते हैं और दसवें वर्ष में दण्ड और सन्धि के स्वामी ( ? ) सम्पूर्ण पृथ्वी के विजय के निमित्त भारतवर्ष में प्रस्थान की [ …… ] तैयारी करते हैं। [ और ग्यारहवें वर्ष ] पलायन करते हैं और मणि रत्न प्राप्त करते हैं।

११. [ दक्षिण दिशा की ओर ] मन्द गति से प्रयाण हुए अव ( ? ) की राजधानी पिथुण्ड में गदहों से हल चलवाते हैं। जनपदकल्याण के भाव से एक सौ तेरह [ वर्ष ] पूर्व बने तिमिर हृद के संघात का भेदन करते हैं।३० और बारहवें वर्ष में सहस्र [ सैनिकों को लेकर ] उत्तरापथ के राजाओं को त्रस्त करते हैं।

१२. …… मगधवासियों में विपुल भय उत्पन्न करते हुए हाथियों और घोड़ों को गंगा में पानी पिलाते हैं और मगध-नरेश बृहस्पतिमित्र (बहसतिमित ) से अपने चरणों की वन्दना कराते हैं और नन्दराज द्वारा लाये गये कलिंग-जिन के संनिवेश ( मन्दिर ) की [ पूजा करते हैं ] और [कोष से ] [ गृह ] -रत्न अपहरण करके अंग और मगध का धन ( वसु ) ले आते हैं।

१३. [ वापस लौटने पर ] दो हजार [ मुद्रा ] व्यय कर दृढ सुन्दर तोरणयुक्त गोपुरों पर केतु ( झण्डा ) लगवाते हैं। अद्भुत आश्चर्य की बात तो यह है कि हस्ति और नौ ( जल ) सेना भेजकर के अश्व, हस्ति और रत्न का अपहरण करते हैं; पाण्ड्य और चेर राजा से मुक्ता, मणि रत्नादि छीन लेते हैं।

१४. …… के निवासियों को वश में करते हैं। और तेरहवें वर्ष में सुपर्वत-विजय चक्रस्थित कुमारी पर्वत पर प्रक्षीण-संश्रित ( संसार से विरक्त ) अर्हतों के वर्षावास ( काय निषेध ) और वर्षाकालीन यापन करने के निमित्त राजभृत, चीर्णव्रती, वर्षाश्रित, पूजानुरक्तोपासक खारवेल श्री द्वारा जीवदेहाश्रयिक ( आश्रय लयण ) उत्खनित करायी जाती है।

१५. सुकृत श्रमण [ राजा श्री खारवेल निमन्त्रित कर ] सुविहित, सर्व दिशा के ज्ञानी, तपस्वी-ऋषि और संघियों को, ( अर्हत निषद्या-वर्षाकाल में अर्हतों के रहने के स्थान ) के निकट, प्राग्भार ( पर्वत पुष्ट ) पर स्थापित कारते हैं और अनेक हितवाले आयोजन [ कराते हैं]। शिला …… ३१

१६. पटलक, चबूतरे ( चत्वर ) तथा वैदूर्य गर्भित स्तम्भ पंचोत्तरशत सहस्र [ मुद्रा ] से स्थापित करवाते हैं। [ और ] मुख्य कला ( गीत-नृत्य-वाद्यादि ) से समन्वित चौंसठ अंगों से युक्त शान्तिपूर्ण तौर्य ( तूर की नाद ) उत्पन्न कराते हैं। [ और ] क्षेमराज ( क्षमाशील राजा ), वृद्धराज (राजाओं में श्रेष्ठ ), भिक्षुराज ( भिक्षा देने में अग्रणी ), धर्मराज [ उन ] कलाओं को देखते, सुनते और अनुभव करते हैं।

१७. …… गुणविशेष-कुशल ( युक्त ), सर्व पाषण्ड ( पन्थ ) पूजक, सर्व देवतायतन का संस्कार करानेवाले, अप्रतिहत चक्र बल ( अपराजेय राज्य के सैन्यबल के स्वामी ), चक्रघर ( सुशासित चक्र ), गुप्त चक्र ( राज्य के रक्षक ), प्रवृत चक्र ( अप्रतिहत शासक ), कुल के आश्रय, महाविजय खारवेल श्री।

  • जैन तीर्थंकरों को अर्हत कहते हैं।१६
  • जैन मुनि सिद्ध नाम से भी पुकारे जाते हैं।१७
  • इस शब्द का प्रयोग वक्कदेव के मंचापुर लयण अभिलेख में भी हुआ है। कुछ विद्वान ‘ऐर’ को राजवंश का नाम मानते हैं और अनुमान करते हैं कि वह ऐल का रूप होगा और उसका तात्पर्य चन्द्र वंश से होगा।१८
  • महाराज शब्द का प्रयोग भारतवर्ष में सर्वप्रथम ईसा पूर्व की दूसरी शती के पूर्वार्ध में यवन-शासक युक्रेटाइड्स ( Eucratides ) के सिक्कों पर देखने को मिलता है। यह विरुद सिंहल के अण्डिय-कन्द लयण के लेख में भी आया है। उसका समय ईसा पूर्व की दूसरी अथवा पहली शती अनुमानित किया जाता है। भारतीय नरेशों के सिक्कों में कुणिन्दों के सिक्कों पर इस विरुद का प्रयोग पहली बार हुआ है। भारतीय अभिलेखों में इसका सर्वप्रथम प्रयोग इसी लेख में है।१९
  • प्राचीन साहित्य में ‘रूप’ का प्रयोग ‘सिक्कों’ के अर्थ में हुआ है। सिक्कों से सम्बद्ध ज्ञान तत्कालीन शिक्षा का अंग था यह बौद्ध ग्रंथमहावग्ग से ज्ञात होता है। उसमें उपालि की शिक्षा के प्रसंग में उनकी माँ का कहना था कि यदि वह ‘रूप’ का अध्ययन करेगा तो उसकी आँखें दुखेंगी। बुद्धघोष ने इसकी टीका करते हुए बताया है कि रूपसूत का अध्ययन करनेवाले को बार-बार कार्षापण ( सिक्कों) को उलटना और देखना होता है। इस परिप्रेक्ष्य में यहाँ भी वही तात्पर्य है।२०
  • अभिलेख में ‘कलिंग नगरि खिबीर’ है। खिबीर से यहाँ क्या तात्पर्य है स्पष्ट नहीं है। कुछ विद्वान् इसे कलिंग नगर का नाम मानते हैं; किन्तु दिनेशचन्द्र सरकार को इस प्रकार के अनुमान के प्रति सन्देह है। जायसवाल व बनर्जी ने इसे कलिंग नगर से अलग कर ‘खिबीर-इसिताल ताग’ पाठ उपस्थित किया है।२१
  • जायसवाल और बनर्जी ने इसे मुसिकनगर पढ़ा है । बरुआ इसे अश्वकनगर समझते हैं।२२
  • थामस के अनुसार इस पंक्ति का तात्पर्य है कि वह सातकर्णि की सहायता के लिए गया और अपना उद्देश्य पूरा कर अपने मित्र के साथ नगर में आनन्द मनाया। किन्तु पंक्ति से ऐसा कुछ स्पष्ट स्पष्ट नहीं होता।२३
  • राष्ट्रिक का उल्लेख अशोक के पाँचवें और भोजकों का तेरहवें बृहद् शिलाभिलेख में हुआ है। उनसे ऐसा प्रतीत होता है कि वे पश्चिम भारत के निवासी होंगे। किन्तु इस उल्लेख से ऐसा जान पड़ता है कि वे विन्ध्य के आस-पास ही कहीं रहते होंगे। कुछ लोग राष्ट्रिकों को खानदेश ( अहमदनगर ) और भोजकों को दक्षिण विदर्भ ( बरार ) में रखते हैं।२४
  • नन्दराज का उल्लेख हाथीगुम्फा अभिलेख में दो बार हुआ है – पंक्ति संख्या ६ और १२। इस पंक्ति में नन्दवंशी शासक द्वारा नहर बनवाने का विवरण मिलता। जबकि १२वीं पंक्ति में नन्दवंशी शासक द्वारा कलिंग से जिन मूर्ति ले जाने का उल्लेख है। किसी मूर्ति का यह प्राचीनतम् अभिलेखीय विवरण है ( १२वीं पंक्ति में )। बारहवीं पंक्ति से ऐसा प्रकट होता है कि वह मगध नरेश था। इस प्रकार यह अनुमान किया जाता है कि यह मगध-नरेश नन्द अथवा उसका कोई वंशधर रहा होगा।२५
  • शशिकान्त इसे महावीर संवत् का १०३ वर्ष अनुमान कर अर्थ लगाते हैं — महावीर संवत् के १०३वें वर्ष में राजा नन्द द्वारा उद्घाटित। किन्तु यह मत ग्राह्य नहीं है।२६
  • शशिकान्त ने इस तथ्य की ओर ध्यान आकृष्ट किया है कि इस लेख में जनहित के कार्यों के उल्लेखों में, उन पर व्यय की गयी धनराशि का उल्लेख है; अतः यहाँ भी नष्ट हुई पंक्ति में नहर बनवाने पर हुए व्यय का उल्लेख रहा होगा।२७
  • गया जिले में स्थित बराबर की पहाड़ी का प्राचीन नाम गोरथगिरि था। यह वहाँ उपलब्ध दो छोटे अभिलेखों से ज्ञात होता है।२८
  • उपर्युक्त ४थी पाद टिप्पणी।२९
  • इस अंश का दिनेशचन्द्र सरकार ने संस्कृत में रूपान्तर ‘भिनत्ति तिमिर हृद संघातम्‘ किया है। और प्रश्नवाचक रूप में ‘जमिर-देश संघातम्‘ दिया है। जायसवाल ने इसका अनुवाद किया है ११३ वर्ष के त्रमिर ( द्रमिर ) देशों के संघ को, जो उसके देश के लिए खतरा था, नष्ट कर डालता है। (thoroughly breaks up the confederacy of the Tramira (Dramira) countries of one hundred and thirteen years, which has been a source of danger to his country.)। शशिकान्त भी इसी भाव को ग्रहण करते हैं। जायसवाल का अनुवाद है — ‘अपने राज्य के कल्याण की दृष्टि से ११३वें वर्ष में बने तमिल देश के संघ को भेदते हैं।’ परन्तु बरुआ ने इसे सर्वथा भिन्त्र रूप में ग्रहण किया है। बरुआ का अनुवाद है — Destroyed the acoumulation of dark swamps that grew up in thirteen and hundred years and became a cause of anxiety to the country. डॉ० परमेश्वरीलाल गुप्त की दृष्टि में ‘तिमिर हृद’ का तात्पर्य ‘त्रमिर देश’ तमिल से ही लिया जाना चाहिए। यद्यपि हृद से तालाब का भाव ही प्रकट होता है। दक्षिण दिशा की ओर बढ़ते हुए त्रमिर ( तमिल देश ) को ही विजित किया जा सकता है; किसी तालाब की सफाई नहीं।३०
  • यहाँ बरुआ जी के पाठ के अनुसार स्तम्भों से बने शयनासन का उल्लेख रहा होगा।३१

हाथीगुम्फा अभिलेख : हिन्दी भावानुवाद

अर्हतों को नमस्कार। सभी सिद्धों को नमस्कार। आर्य महाराज, महामेघवाहन, चेदिराजवंशवर्धन, प्रशस्त और शुभ लक्षणों से परिपूर्ण, चारों दिशाओं में व्याप्त गुणों वाले, कलिंग के राजा श्री खारवेल द्वारा पन्द्रह वर्ष तक गौर वर्ण वाले शरीर से कुमार क्रीड़ायें की गयीं।

तत्पश्चात् लेख, रूप, गणना, कानून और व्यवहार में प्रवीण, सभी विद्याओं में विशारद उसके द्वारा युवराज पद नौ वर्ष तक विद्यमान रहा गया। चौबीस वर्ष पूर्ण हो जाने पर ( वह ), जो बचपन से ही वर्धमान और विजय में वेन पुत्र ( पृथु ) तुल्य था, कलिंग राजवंश तीसरे पुरुषयुग में महाराज अभिषेक को प्राप्त हुआ।

अभिषेक के बाद प्रथम वर्ष में कलिंग नगरी में तूफान से नष्ट हुए गोपुरों, प्राचीरों तथा भवनों की ( उसने ) मरम्मत करवायी और नगर का प्रति संस्कार करवाया। शीतल व सोपान युक्त तालाबों और उद्यानों का निर्माण करवाया। पैंतीस लाख मुद्रा खर्च कर प्रजा का मनोरंजन किया।दूसरे वर्ष में सातकर्णि की उपेक्षा करते हुए उसने अश्व, गज, पैदल और रथों की विशाल सेना पश्चिम की ओर भेजी। उस सेना ने कण्णवेणा नदी तक जाकर असिक नगर में आतंक फैलाया। तीसरे वर्ष में गन्धर्व विद्या प्रवीण ने नृत्य, गीत, वाद्य, उत्सव और समाज का आयोजन कर नागरिकों का मनोरंजन किया। चौथे वर्ष विद्याघरों की बस्ती को जिस पर पहले कभी आक्रमण नहीं हुआ था में निवास किया।… सब राष्ट्रिकों और भोजकों से, जो अपने रत्नों एवं सम्पत्ति से विहीन कर दिये गये थे ( उसने ) अपने चरणों की वन्दना करवायी। पांचवे वर्ष में नंदराज द्वारा तीन सौ वर्ष पहले खुदवायी गयी नहर को तनसुलि मार्ग से नगर ( राजधानी ) में ले आया।

छठे वर्ष उसने राजैश्वर्य प्रदर्शित करते हुए ग्रामीण और नगरों के निवासियों पर अनेक अनुग्रह किया। सब प्रकार के लाखों कर माफ किये। सातवें वर्ष में वाजिरघर……..आठवें वर्ष गोरथगिरि पर विशाल सेना लेकर आक्रमण कर घेरा डाला। उसके आतंक से यवनराज दिमिति मथुरा भागा। नवें वर्ष में फल एवं पल्लवों से परिपूर्ण कल्पवृक्ष के समान अश्व, गज, रथ, भवन तथा शालाये दान में दिया। इन सबको ग्रहण कराने के लिये ब्राह्मणों को जय परिहार ( विजय प्राप्ति के उपलक्ष में कर मुक्त जागीरें ) दिये।…… अड़तीस लाख व्यय करके महाविजयप्रासाद बनवाया। दसवे वर्ष दण्ड सन्धि तथा सामनीति के शत ने ( खारवेल ने पृथ्वी विजय हेतु भारत को प्रस्थान किया…… ग्यारहवें वर्ष में पराजितों से मणि और रत्न प्राप्त किया। एक पूर्व राजा द्वारा स्थापित पिथुण्ड नगर को ध्वस्त कर गधों का हल चलवा दिया, जनपद के कल्याण के लिये तेरह सौ वर्षों से स्थापित तमिलसंघ को छिन्न-भिन्न कर दिया। बारहवें वर्ष उत्तरापथ के राजाओं को भयभीत किया …… मगध के लोगों में विपुल भय उत्पन्न करके हाथियों तथा घोड़ों को गंगाजल पिलाया, मगध नरेश वहसतिमित्र से अपने चरणों की पूजा करवायी। नंदराज द्वारा कलिंग से ले जायी गयी ‘जिन’ की प्रतिमा को वापस लाने के साथ-साथ अंग तथा मगध की सम्पदा भी ले आया। शतविंशक ( मुद्रायें ) व्यय करके और दृढ़ और सुन्दर तोरण द्वार और शिखर बनवाये। अद्भुत तथा आश्चर्यजनक हस्ति निवास का अपहरण किया। पाण्ड्य राजा से अश्व, रथ, रत्न, माणिक्य तथा बहुमूल्य मणिमुक्ताओं का हार प्राप्त किया जो लाखों की संख्या में थे।

तेरहवें वर्ष विजय चक्र के प्रवर्तन के साथ आश्रमहीन धर्मोपदेशक अर्हतों के विश्राम के लिये खारवेल ने कुमारी पर्वत पर विश्रामस्थल के रूप में आरामदायक गुफायें उत्कीर्ण करवायी और व्रत का अनुष्ठान पूर्ण कर चुके जैनियों को रेशमी वस्त्र प्रदान किये। श्रमणों का सत्कार करने वाले श्री खारवेल ने सब दिशाओं से आने वाले ज्ञानियों, तपस्वियों, ऋषियों और संधियों का अर्हतों के विश्रामाश्रय के पास पर्वत पृष्ठ पर कई योजन से लायी गयी, भली भाँति स्थापित की गयी शिलाओं से गर्भगृह में लाखों मुद्रायें खर्च करके वैदूर्य युक्त चार स्तम्भ स्थापित करवाये। मुख्य कलाओं से युक्त चौसठ प्रकार के वाद्यों से समन्वित शन्तिपूर्ण वाद्यध्वनि उत्पन्न करायी। क्षेमराज, वृद्धराज, भिक्षुराज, धर्मराज कलाओं को देखते, सुनते और अनुभव करते हुए – विशेष गुणों में कुशल, सभी सम्प्रदाओं का उपासक, सभी देवमन्दिरों का उद्धारक, अपराजित राज्य और सेना से बलवान, सुप्रतिष्ठित राजचक्रवाला, राजमण्डल द्वारा सुरक्षित और अनुलंघित शासन वाला ( वह राजा था )।

हाथीगुम्फा अभिलेख : विश्लेषण

हाथीगुम्फा अभिलेख भारतीय अभिलेखों में अपने ढंग का अनोखा तो है ही साथ ही राजप्रशस्तियों से सर्वथा भिन्न भी है। यहअतिशयोक्तिपूर्ण प्रशस्ति न होकर मात्र वृत्त आलेख हैं। यह शिलालेख अलंकारमुक्त सीधी-सादी भाषा में खारवेल के कार्यों का विवरण देताहै। समय के कारण यह लेख इतना क्षतिग्रस्त हो गया है कि इसका समुचित रूप से पाठ कर सकना किसी के लिए सम्भव नहीं हो सका है। इसके पाठ के लिए विद्वानों को अनुमान और कल्पना का सहारा लेना पड़ा है। इसलिए पूर्ण रूप से इस अभिलेख का महत्त्व आँकना कठिन है। केवल मोटे रूप में ही खारवेल सम्बन्धी जानकारी प्राप्त की जा सकती है और वह भी सम्भावनाओं से भरी हुई है।

खारवेल के वंश-कुल के सम्बन्ध में लोगों ने तरह-तरह की कल्पनाएँ की हैं। ततिये-कलिंग-राजवंसे-पुरिस युगे ( पंक्ति संख्या २-३ ) से कुछ लोगों ने उनके कलिंग के तीसरे वंश में होने का अनुमान प्रकट किया है। परन्तु यह अनुमान युग-पुरुष के अर्थ को ठीक से ग्रहण न करने के कारण ही किया गया है। ‘युग पुरुष’ शब्द का प्रयोग वंशावली के प्रसंग में पीढ़ी के अर्थ में होता है। यहाँ तात्पर्य है कि खारवेल कलिंग राजवंश की तीसरी पीढ़ी में थे। चेदि राजवंश ( पंक्ति संख्या १) के उल्लेख से यह ज्ञात होता है कि वे चेदिवंश के थे। यहाँ चेदि का तात्पर्य चेदि प्रदेश से है या पौराणिक राजवंश से, कहना कठिन है। दोनों प्रकार की सम्भावनाएँ प्रकट की जा सकती हैं। पौराणिक राजवंश से सम्बन्ध जोड़ने के प्रयास में लोगों का ध्यान पंक्ति १ के ‘ऐरेण’ की ओर भी गया है और उन्होंने उसे ‘इला के वंशज’ के रूप में ग्रहण किया है।३२ किन्तु जिस स्थान पर इस शब्द का प्रयोग हुआ है वहाँ ऐरेण का यह भाव असंगत होगा।

  • ‘ऐरेण’ का प्रयोग गुण्टूर जिले के वेल्लपुर से प्राप्त एक अभिलेख में इसी प्रकार हुआ है।३२

अतः वहाँ ऐल वंश के उल्लेख की कल्पना नहीं की जा सकती। इसी प्रकार पंक्ति २ में ‘वधमान सेसयोवनाभिजयो’ को ‘वधमान सेसयो-वेनाभिजयो’ के रूप में ग्रहण कर ‘वेण’ के और पंक्ति १७ में ‘राधसि वंश कुल’ को ‘राजसि वसू कुल’ पढ़कर उपरिचर वसु के उल्लेख होने की बात की जाती है। प्रथम उल्लेख में वेण के उल्लेख का कोई तुक नहीं जान पड़ता है। दूसरे उल्लेख में वसु होने की सम्भावना हो सकती है; पर वह प्रासंगिक नहीं कहा जायगा।

अतः कुछ स्पष्ट रूप में उपलब्ध है उससे यही कहा जा सकता है कि खारवेल चेदिवंश के थे और कलिंग राजवंश की तीसरी पीढ़ी में हुए थे और उसे महामेघवाहन कहा गया है। वस्तुतः यही उसके वंश का नाम होगा। इस नाम का उल्लेख मंछापुरी और गुण्टूपल्ली अभिलेख में भी हुआ है। उनसे भी इसके वंश-नाम होने की बात प्रकट होती है। महामेघवाहन का उल्लेख एक स्थान पर महाभारत में भी हुआ है। वहाँ लोगों ने इसका तात्पर्य कलिंग प्रदेश अथवा कलिंग राजवंश से ग्रहण किया है। इसी प्रसंग में यह भी उल्लेखनीय है कि सातवाहन भी इसी ढंग का वंशनाम है।

यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि महावंश में सिंहल के एक शासक का उल्लेख महामेघवाहन नाम से हुआ है जिसने चौथी शती ई० में गुप्त सम्राट समुद्रगुप्त के पास बोधगया में सिंहली भिक्षुओं के लिए विहार निर्माण की अनुमति प्राप्त करने के लिए दूत भेजा था।

अभिलेख में जीवन-परिचय देते हुए पिता पितामह किसी का भी उल्लेख नहीं है। उसमें केवल खारवेल के अपने निजी कार्यों की ही चर्चा है। इस प्रकार यह परवर्ती अभिलेखों से भिन्न है। आरम्भ में उनके शैशववस्था की चर्चा करते हुए उनके खेल-कूद और शिक्षा का उल्लेख किया गया है। १५ वर्ष की अवस्था में वे युवराज हुए और २४ वर्ष की अवस्था में उन्होंने राजभार ग्रहण किया। तदनन्तर १३ वर्ष तक शासक के रूप में उन्होंने जो कुछ भी किया उसका उल्लेख इस लेख में है।

इस प्रसंग में वैयक्तिक बातों में केवल एक ही बात कही गयी है वह यह कि ७वें राजवर्ष में उन्हें वजिधरवती नाम्नी रानी से एक पुत्र हुआ।जायसवाल ने पंक्ति १५ सिंहपथ की रानी सिन्धुल का उल्लेख देखने की चेष्टा की है। इस प्रकार उनकी एक दूसरी रानी होने का अनुमान किया गया है। किन्तु उनका यह पाठ सन्दिग्ध है इसलिए इस प्रकार की कोई कल्पना नहीं की जा सकती।

अभिलेख का आरम्भ अर्हतों के नमस्कार से हुआ है। इसलिए यह प्रायः निश्चित समझा जाता है कि खारवेल जैन-धर्मानुयायी थे इसका समर्थन उनके विरुद पूजानुर-तउवासग तथा कलिंग जिन के सन्निवेश की पूजा ( पंक्ति १२ ) से भी होता है।३२ किन्तु साथ ही यह भी उल्लेखनीय है कि उसे पंक्ति १६ में सर्व पाषण्डपूजक और सर्व देवायतन-संस्कारकारक भी कहा गया है और पंक्ति ६ में सर्वग्रहण अनुष्ठान करने और ब्राह्मणों को दान देने की बात भी है। इससे ज्ञात होता है कि खारवेल धार्मिक दृष्टि से सहिष्णु थे।

  • शशिकान्त ने इस लेख में महावीर संवत् के उल्लेख होने की सम्भावना पर बल दिया और उसे भी खारवेल के जैन होने का प्रमाण बताया है। परन्तु इस तरह की कल्पना के लिए कोई स्थान नहीं है।३२

अभिलेख में खारवेल के लोकोपकारी कार्यों और विजय अभियानों की चर्चा है। लोकहित के कार्यों में कलिंगनगरी खिबिर के गोपुरों, प्राकारों, मकानों का प्रति संस्कार, तालाब के बाँधों की मरम्मत, बगीचों का सँवारना, लोकरंजन के लिए नृत्य, गीत, वादन का आयोजन, तनसुलियवाटा प्रणाली का विस्तार, राजकर की माफी, दान आदि का विवरण मिलता है। अर्हतों के वर्षावास के निमित्त लयण ( गुफाओं ) का निर्माण भी इसी प्रकार का कार्य कहा जा सकता है।

अभिलेख की पंक्ति संख्या १५ से ऐसा ज्ञात होता है कि १३वें वर्ष में खाखेल ने कोई ऐसा आयोजन किया था जिसमें उसने देशभर के ज्ञानियों, तपस्वियों, ऋषियों, अर्हतों आदि को एकत्र किया गया था। वस्तुतः यह आयोजन किस प्रकार का था, उसे यह अभिलेख स्पष्ट नहीं करता है। शशिकान्त ने इसे जैन अर्हतों की संगीति होने का अनुमान किया है और इस संगीति का स्थल भी उन्होंने हाथीगुम्फा को छत पर एक मन्दिर के ध्वंसावशेषों के रूप में ढूंढ निकाला है। यदि उनका यह अनुमान ठीक है, जिसकी सम्भावना हो सकती है, तो कहना होगा कि अजातशत्रु और कनिष्क ने जो कार्य बौद्ध धर्म के लिए किया था, वही कार्य खारवेल ने भी जैन-धर्म के लिए किया। इस प्रकार कहा जा सकता है कि जैन-धर्म को रूपायित करने में खारवेल ने महत्त्वपूर्ण योगदान दिया था। किन्तु इस प्रकार की किसी संगीति का उल्लेख जैन साहित्य में कहीं उपलब्ध नहीं है।

राजनीतिक इतिहास की दृष्टि से खारवेल के अभियानों का विशेष महत्त्व है। इस अभिलेख में उसके दूसरे, चौथे, आठवें और ग्यारहवें वर्ष में किये गये अभियानों का संक्षिप्त विवरण मिलता है। इन उल्लेखों से ऐसा प्रतीत होता है कि उसके ये अभियान सैनिक शक्ति प्रदर्शन मात्र थे। उसने किसी प्रकार का भू-विजय किया हो अथवा साम्राज्य विस्तार किया हो, ऐसा प्रतीत नहीं होता। ये एक प्रकार से धावा मात्र जा सकते हैं।

खारवेल का पहला अभियान पश्चिम दिशा में ऋषिक ( मूसिक ) नगर तक हुआ था। ऋषिक अथवा मूसिकनगर की अवस्थिति का ठीक ज्ञान अब तक नहीं किया जा सका है। अभिलेख से ज्ञात होता है कि वह कन्हवेणा ( कृष्णवेणा ) नदी के निकट कहीं पर स्थित था। कन्हवेणा (कृष्णवेणा ) नाम से किस नदी का तात्पर्य है इस सम्बन्ध में निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता। कुछ लोग उसके कृष्णा नदी होने का अनुमान करते हैं; किन्तु यह नदी कलिंग के पश्चिम नहीं, दक्षिण बहती है। कुछ लोग इसे वेणगंगा अनुमान करते हैं यह मध्यप्रदेश में चांदा जिले में सिवनी के निकट प्राणहिता नदी में मिलती है, जो सिरोच के निकट गोदावरी में गिरती है। कुछ इसे वेनगंगा के स्थान पर उसकी सहायक नदीकन्हन के रूप में पहचानते हैं। अभिलेख में यह भी कहा गया है कि वह सातकर्णि की चिन्ता न कर ( उपेक्षा कर ) वहाँ तक पहुँचा था। सातकर्णि आन्ध्र-सातवाहन नरेशों का विरुद रहा है और उत्तरवर्ती काल में सातवाहन राज्य आन्ध्र प्रदेश में बंगाल की खाड़ी तक फैला हुआ था। इससे अनुमान होता है कि यहाँ तात्पर्य इसी पूर्वी भू-भाग से होगा।

खारवेल ने दूसरा अभियान चौथे वर्ष में किया था। यह अभियान भी पश्चिम दिशा में ही था। इस बार उसने विन्ध्य पार कर राष्ट्रिकों और भोजकों को परास्त किया। अभिलेख में उनके मुकुट, छत्र, भृंगार आदि के, जो उनके राज-चिह्न थे, नष्ट किये जाने का उल्लेख है। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि वे स्वतन्त्र राज्य थे। अशोक के अभिलेखों में इनका उल्लेख अपरान्त ( पश्चिमी भारत ) में हुआ है। लोग भोजकों की अवस्थिति बरार में और राष्ट्रकों को खानदेश ( अहमदनगर ) में अनुमानित करते हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि सुदूर पश्चिम के इस भूभाग तक पहुँचने में खारवेल ने सफलता प्राप्त की थी। पर अभिलेख की भाषा से ऐसा ध्वनित नहीं होता। उसका यह अभियान विन्ध्य के किसी प्रदेश में ही सीमित था और वह कलिंग से बहुत दूर न था। इसलिए ये राज्य नर्मदा के दक्षिण वेणगंगा से आगे ही कहीं रहे होंगे।

तीसरा अभियान खारवेल ने अपने राज्याभिषेक के आठवें वर्ष में उत्तर की ओर किया। इस बार उसने राजगृह के निकट गोरथगिरि ( गया जिला अन्तर्गत स्थित बराबर पर्वत ) तक धावा मारा। शशिकान्त का कहना है कि खारवेल अपने इस अभियान में आगे बढ़ते हुए मथुरा का विमोचन करते हुए यमुना तक पहुँच गये थे। किन्तु अभिलेख के जिस अंश के आधार पर उन्होंने यह कल्पना की है, यह सुपाठ्य नहीं है। राजगृह से मथुरा के बीच उन दिनों ( खारवेल का समय हम चाहे जो भी मानें ) कोसल ( अयोध्या ), वत्स ( कौशाम्बी ) और पंचाल ( अहिच्छत्र ) तीन महत्त्वपूर्ण स्वतन्त्र राज्य थे जिनके शासकों की लम्बी शृंखला का ज्ञान उनके सिक्कों से मिलता है। यदि खारवेल मथुरा तक गया होता तो इन राज्यों से संघर्ष करना पड़ता। यह कल्पनातीत है कि कोई इन राज्यों के बीच होकर जाय और उनका उल्लेख न करे। स्मरणीय है कि प्रथम अभियान में ऋषिकनगर तक पहुँचने में सातकर्णि का उल्लेख करना वह नहीं भूलता। यदि मथुरा तक जाता तो अभिलेख में इन राज्यों का उल्लेख अवश्य करता, अपने समय में इन राज्यों का महत्त्व कम न था। उनके उल्लेख के अभाव में खारवेल के मथुरा तक पहुँचने की कल्पना नहीं की जा सकती है। इस प्रकार की कल्पना पंक्ति संख्या ११ व १२ के प्रकाश में तो और भी नहीं की जा सकती है। इन पंक्तियों में स्पष्ट संकेत है कि वह मगध के आगे उत्तरापथ की ओर गया ही नहीं। अन्य विद्वानों ने अभिलेख के इस अंश को जिस रूप में पढ़ा है वह सत्य के अधिक निकट जान पड़ता है। उनके अनुसार इस अंश में खारवेल के पराक्रम के घोष से भयभीत होकर किसी यवनराज के मथुरा भाग जाने की बात कही गयी है। ऐसा जान पड़ता है कि कोई यवनराज मगध की ओर बढ़ रहा था या मगध तक बढ़ आया था। उसने जब खारवेल के गोरथगिरि पर किये गये अभियान की चर्चा सुनी तो वह मथुरा लौट गया। इस यवनराज का नाम लोगों ने दिमित पढ़ने का प्रयास किया और उसको दिमित्र ( Demetrius ) अथवा दिउमिद ( Deomedes ) के रूप में पहचानने का यत्न किया है। वस्तुतः नामवाले इस अंश के तीन अक्षरों में से केवल बीच का ‘मि’ ही पाठ्य है। शेष अक्षरों की कल्पना यवनराज शब्द के आधार पर भारतीय-यवन ( Indo-Greek ) नरेशों के नामों से ढूँढ़ कर की गयी है। किन्तु किसी यवन ( Greek ) शासक की कल्पना तभी सम्भव है, जब खारवेल का समय ई० पू० की दूसरी शती में कहीं रखा जाय। तब भी दिमित्र अथवा दिउमिद नामक यवन नरेशों के मथुरा तक आने की बात संदिग्ध ही रहती है। किसी भी सूत्र से यह ज्ञात नहीं होता है कि दिमित्र ने मगध की ओर कोई अभियान किया था। दिउमिद तो ऐसे समय में हुआ था जब भारत में यवन ( Greek ) शक्ति अवसानकी ओर थी। उस समय किसी यवनराज के पंजाब से बाहर जाने की बात हो ही नहीं सकती। इस संदर्भ में डॉ० परमेश्वरीलाल गुप्त का विचारहै कि यहाँ यवनराज का प्रयोग विशुद्ध यवन ( Greek ) के अर्थ में नहीं वरन् विदेशी के अर्थ में हुआ है।३३ यह अर्थ प्राचीन काल से आज तक प्रचलन में चला आ रहा है। इस यवनराज ( विदेशी नरेश ) का नाम विमिक था, और उसका तात्पर्य कुषाण-नरेश विम कदफिस से है। इस अनुमान की पुष्टि अभिलेख में उसके मथुरा लौटने की बात कहे जाने से होती है। कहना न होगा, मथुरा कुषाणों का प्रमुख केन्द्र था, वहाँ उसका लौट जाना स्वाभाविक ही था। है।

  • यवन शब्द का प्रयोग विदेशी के अर्थ में ईसा की प्रथम शती के आसपास ही हो गया था। दक्षिण भारत से बड़ी मात्रा में निर्यात की जानेवाली ‘मिर्च’ की रोमनों के बीच जैसी लोकप्रियता थी, उसके कारण उसे उन दिनों लोग ‘यवन प्रिया’ कहने लगे थे।३३

खारवेल का चौथा अभियान उसके राज्याभिषेक के ११वें पिथुण्ड नगर के विरुद्ध किया था। इसके सम्बन्ध में शशिकान्त का अनुमान है कि वह दक्षिण दिशा में होगा। पिथुण्ड की पहचान लोग टॉलमी वर्णित पितिन्द्र ( Pityndra ) से करते हैं जिसे उसने मैसोलिया ( Maisolia ) और अवरनोई ( Arvarnoi ) का प्रमुख नगर बताया है। वह मैसोलिया के अन्तर्भाग में गोदावरी और कृष्णा के बीच के तटवर्ती भूभाग में था। यह भी अनुमान किया जाता है कि वह विजयपुरी, अमरावती और विजयवाड़ा के आसपास आन्ध्रपथ में कहीं रहा होगा। टॉलमी कथित अवरनोई को इस अभिलेख में उल्लिखित अब होने की बात शशिकान्त ने कही है। काशीप्रसाद जायसवाल ने समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति में उल्लिखित अवमुक्त के साथ इसकी समता देखने की चेष्टा की है। यदि जायसवाल का अनुमान ठीक है तो अवमुक्त क्षेत्र को ब्रह्मपुराण में गौतम (गोदावरी ) के तट पर कहा गया है। जायसवाल ने पिथुण्ड की व्युत्पत्ति पिथुअण्ड के रूप में की है और कहा है कि यह नाम कदाचित नगर की बनावट के कारण पड़ा होगा। आर० सुब्रह्मन्यम् ने गुण्टूपल्ली अभिलेख के प्रसंग में कहा है कि पिथुण्ड का तमिल समानार्थी शब्द गुड्डूपल्ली है। यही गुड्डूपल्ली ही गुण्टूपल्ली बन गया जान पड़ता है। इस रूप में पिथुण्ड की पहचान गुण्टुपल्ली से सहज रूप में की जा सकती है।

खारवेल का चौथा अभियान उसके राज्याभिषेक के १२वें वर्ष उत्तरापथ के राजाओं के विरुद्ध हुआ था। किन्तु अभिलेख की पंक्तियाँ अस्पष्ट होने से इस अभियान के स्वरूप का अनुमान नहीं किया जा सकता। इतना ही स्पष्ट है कि इस अभियान में वह पाटलिपुत्र आया और मगध नरेश बृहस्पतिमित्र ( बहसतिमित ) ने उसकी अधीनता स्वीकार की और वह मगध और अंग से प्रचुर धनराशि लेकर लौटा। बारहवें वर्ष के प्रसंग में ही अभिलेख में पाण्ड्य और चेर की ओर भी अभियान करने की बात ज्ञात होती है। इस अभियान में स्थल सेना के साथ-साथ नौ-सेना के प्रयोग की बात भी कही गयी जान पड़ती है। इस अभियान में खारवेल को मुक्ता मणि रत्न आदि प्राप्त हुए थे।

खारवेल के इन अभियानों का जो वर्णन अभिलेख में प्राप्त होता है, उससे यही प्रकट होता है कि उसके अभियानों का उद्देश्य राज्य-सीमा का विस्तार न होकर केवल सम्पत्ति प्राप्त करना ही रहा है। पिथुण्ड के गदहों के हल से जुतवाने की बात से ऐसा अवश्य लगता है कि उसने उस क्षेत्र पर अधिकार किया होगा।

खारवेल का राज्य बहुत विस्तृत नहीं था। उसके अभियानों के आधार पर उसकी राज्य-सीमा का सहज अनुमान किया जा सकता है। उत्तर में वह मगध को छूता था; पश्चिम में उसकी सीमा कदाचित् वेणगंगा तक और दक्षिण में वह गोदावरी तक थी। पूर्व में समुद्र उसकी प्राकृतिक सीमा थी। खारवेल की राजधानी के सम्बन्ध में कुछ लोगों का अनुमान है कि उसका नाम खिबिर था, कुछ लोग उसका नाम कलिंगनगर बताते हैं। यह नगरी कहाँ थी कहना कठिन है, पर उसे प्राची नदी के तट पर ही कहीं होना चाहिये जहाँ उसने महाविजयप्रासाद बनवाया था ।

खारवेल और हाथीगुम्फा-अभिलेख का काल भारतीय पुरातत्त्व और इतिहास की एक ऐसी गुत्थी है जो अब तक नहीं सुलझ पायी है। इसके सम्बन्ध में जो भी विचार प्रकट किये गये हैं वे निम्नलिखित तथ्यों पर आधारित हैं :—

  • पंक्ति संख्या १६ में भगवानलाल इन्द्रजी तथा स्टेन कोनो द्वारा प्रस्तुत “पानंतरिय-सथि-वस-सते राज मूरिय काले” पाठ।
  • पंक्ति संख्या ६ में ‘नन्दराज-ति-त्रस-सत’ उल्लेख।
  • पंक्ति संख्या ४ में सातकर्णि ( सातकंणि ) का उल्लेख।
  • पंक्ति संख्या ८ में यवनराज दिमित का उल्लेख।
  • पंक्ति संख्या १२ में मगधराज बहसतिमित्र का उल्लेख।

ये उल्लेख स्पष्टतः दो प्रकार के हैं। प्रथम दो उल्लेख काल-गणना से उनका पारस्परिक समीकरण प्रस्तुत कर खारवेल का समय निर्धारित किया जा सकता है। अन्य तीन उल्लेख इस बात के द्योतक हैं कि (१) शातकर्णि, (२) यवनराज दिमित और (३) मगधराज बहसतिमित्र खारवेल के समकालिक थे। यदि इनका समय निश्चित किया जा सके तो उनका समय ही खारवेल का समय होगा । इस प्रकार इस अभिलेख में खारवेल के समय-निर्धारण के दोनों प्रकार के सूत्रों से, जो एक-दूसरे से स्वतन्त्र उपलब्ध हैं, यदि निष्कर्ष एक-से प्राप्त हों तो उन्हें प्रामाणिक रूप से खारवेल का समय माना और कहा जा सकता। किन्तु इन सूत्रों के आधार पर अब तक जो मत निर्धारित किये गये हैं उनमें किसी प्रकार की एकता नहीं है। अब तक प्रतिपादित मतों का विवेचन इस प्रकार किया जा सकता है :—

(१) “पानतरिय-सथि-वस-सतेराज मुरिय-काले” पाठ के आधार पर समझा जा रहा है कि इसमें मौर्यकाल के १६५वें वर्ष का उल्लेख है। इसी प्रकार ‘नन्दराज-ति-वस-सत’ का अर्थ नन्दराज का ३०० या १०३ वर्ष ग्रहण किया जाता है। नन्द और मौर्य दोनों ही मगध के राजवंश हैं और नन्दवंश मौर्यों से पहले हुआ था। इसलिए इन उल्लेखों के आधार पर यह कहना कि खारवेल मौयों से २६५ वर्ष और नन्दों से केवल १०३ वर्ष बाद हुआ हास्यास्पद व ऐतिहासिक दोष होगा। इसलिए प्रस्तुत प्रसंग में इसका अर्थ ३०० ही ग्रहण किया जा सकता है।

अस्तु, अभिलेख के कथित इन तथ्यों का समीकरण इस प्रकार किया जा सकता है-

१३ खारवेल वर्ष

१ खारवेल वर्ष — १६५ – १३

= १६५ मौर्यकाल

= १५२ मौर्यकाल

५ खारवेल वर्ष

१ खारवेल वर्ष — ३०० – ५

= ३०० नंदराजकाल

= २९५ नंदराजकाल

१५२ खारवेल वर्ष

१ मौर्यकाल   — २९५ – १५२

= २९५ नंदराजकाल

= १४३ नंदराजकाल

पुराणों के अनुसार नन्दों के १४३ वर्ष के शासन ( ४३ वर्ष महानन्दिन, ८८ वर्ष महापद्मनन्द और १२ वर्ष महापद्म के ८ बेटे ) के बाद मौर्य वंश का उदय हुआ। इस प्रकार निष्कर्ष यह निकलता है कि मौर्य काल की गणना का आरम्भ नन्द वंश के पतन और चन्द्रगुप्त मौर्य के राज्यारोहण के साथ हुआ। चन्द्रगुप्त मौर्य का राज्यारोहण ई०पू० ३२४ माना जाता है। अतः निष्कर्ष यह प्राप्त होता है कि खारवेल का प्रथम राजवर्ष ई०पू० १७२ ( ई०पू० ३२४ – १५२ मौर्य काल ) होगा।

किन्तु इस आधार पर इस काल-निर्धारण को लोग अब महत्त्व इसलिए नहीं देते कि विद्वानों ने यह स्वीकार कर लिया है कि अभिलेख में जिसे ‘मुरिय-काल’ पढ़ा जाता रहा है, वह वस्तुतः “मुखिय-काल” है ।

(२) काल-गणना के रूप में ‘नन्दराज-ति-वस-सत’ पाठ को सभी विद्वान् स्वीकार करते हैं किन्तु उसकी व्याख्या उन्होंने तरह-तरह से की है। स्टेन कोनो ने इसे १०३ मान कर यह मत प्रतिपादित किया है कि उसका सम्बन्ध नन्दराज से नहीं है, वरन् वह महावीर निर्वाण संवत् है। उनके इस मत को विद्वानों ने विशेष महत्त्व नहीं दिया था; किन्तु अभी हाल में शशिकान्त ने इसे नये सिरे से प्रतिपादित किया है। उनका कहना यह है कि इस लेख का तात्पर्य है कि महावीर निर्वाण संवत् १०३ में नन्दराज ने तनसुलियावार प्रणाली का निर्माण कराया था। इस धारणा के साथ उन्होंने इस संवत् के दो अन्य उल्लेख भी अभिलेख में देखने की पेश की है। वे हैं —

(१) पंक्ति संख्या ११ में ‘तेरस-वस-सत’ का उल्लेख। इसके अनुसार उनकी सम्मति में ११३वें वर्ष में तमिल संघ संघटित हुआ था।

(२) पंक्ति संख्या १६ में ‘पानतरिय-सथ-सत-वस’ का उल्लेख। उनकी धारणा है कि १६५वें महावीर-निर्वाण संवत् के पश्चात् जैन-धर्म के १२ अंगों का ह्रास होने लगा था, यह इस पंक्ति में कहा गया है।

शशिकान्त की कल्पना है कि यह अभिलेख किसी धार्मिक समारोह के समय अंकित कराया गया है; इसलिए यह अनुमान किया जा सकता है कि ये तिथियाँ उस धर्म से सम्बद्ध होंगी जिससे समारोह सम्बद्ध था। इस प्रकार उन्होंने मत प्रकट किया है कि वे महावीर-निर्वाण संवत् होंगे। महावीर-निर्वाण की तिथि ई०पू० ५२७ का १५ अक्टूबर स्वीकार कर उन्होंने उपर्युक्त घटनाओं के उक्त काल के पश्चात् घटित होने का प्रतिपादन करने की चेष्टा की है। किन्तु इस प्रकार का कोई प्रत्यक्ष प्रमाण उपस्थित नहीं किया है जिससे प्रकट होता हो कि उस काल में वस्तुतः महावीर-निर्वाण संवत् का प्रचलन हो गया था।

इन अभिलेखों में महावीर-निर्वाण संवत् के उल्लेख अत्यन्त सन्दिग्ध हैं। पंक्ति संख्या ११ और पंक्ति संख्या १६ का जो पाठ शशिकान्त ने स्वीकार किया और जो व्याख्या प्रस्तुत की है वह अत्यन्त संदिग्ध है। अनेक विद्वान् उसे स्वीकार नहीं करते हैं। पंक्ति संख्या ६ में कहीं कोई ऐसा संकेत नहीं है जिससे यह स्पष्ट हो कि ‘ति-वस-सत’ का सम्बन्ध नन्दराज से न होकर किसी और से है। यदि यह स्वीकार कर भी लिया जाय कि इस अभिलेख में महावीर स्वामी के निर्वाण संवत् का उल्लेख हुआ है, तो भी उससे खारवेल तथा इसे अभिलेख की तिथि पर कोई प्रकाश नहीं पड़ता। इसके लिए महावीर स्वामी के निर्वाण संवत् की बात कहनेवाले खारवेल के समय-निर्धारण के लिए भी समसामयिक राजाओं के उल्लेखों का ही सहारा लेते हैं।

(३) अधिकांश विद्वान् इस अभिलेख में न तो मौर्य काल का और न ही महावीर-निर्वाण काल का उल्लेख स्वीकार करते हैं। वे ‘नन्दराज-ति-वस-सत’ का सीधा-साधा अर्थ नन्दराज का १०३ अथवा ३०० वर्ष ही स्वीकार करते हैं और अपनी-अपनी धारणाओं के अनुसार नन्दवंश के समय चौथी शती ई०पू० के आधार पर खारवेल को ई०पू० दूसरी शती के पूर्वार्द्ध में अथवा ई०पू० पहली शती में रखते हैं और अपने इन मतों का समर्थन समसामयिक राजाओं के उल्लेखों के आधार पर करने की चेष्ट करते हैं। किन्तु इस प्रसंग में द्रष्टव्य यह है कि यदि हम यह अनुमान करें कि तनसुलियवाट नहर नन्दों के पतन काल में ३२४ ई०पू० के आसपास खुदी थी तो उत्खनन के १०३ वर्ष का काल, खारवेल के पंचम वर्ष में, ई०पू० २३४ के आस-पास पड़ेगा। और तब कहना होगा कि खारवेल का वंश तृतीय शती ई०पू० के मध्य में स्थापित हुआ था। किन्तु ऐतिहासिक तथ्य यह है कि इस काल में, जो अशोक का समय है, कलिंग मगध साम्राज्य का एक अभिन्न अंग था । उस समय वहाँ खारवेल के वंश के अस्तित्व की बात सोची ही नहीं जा सकती। अतः ‘ति-वस-सथ’ का अर्थ ३०० ही अधिक संगत होगा। इस प्रकार खारवेल का समय इसके आधार पर पहली शती ई०पू० में ही ठहराया जा सकता है।

खारवेल और हाथीगुम्फा अभिलेख का समय अकेले इस उल्लेख के आधार पर पूर्णतः निश्चित नहीं किया जा सकता है। उसके निर्धारण के लिए अभिलेख में वर्णित नरेशों के काल पर भी विचार करना होगा। अस्तु,

(१) पंक्ति संख्या ४ में उल्लिखित सातकर्णि के सम्बन्ध में यद्यपि निश्चयपूर्वक कुछ नहीं कहा जा सकता, तथापि प्रायः सभी विद्वानों की धारणा रही है कि वह सातवाहन-वंश का तृतीय नरेश सातकर्णि प्रथम होगा। किन्तु सातवाहन वंश का उद्भव कब हुआ स्वयं इस विषय में विद्वानों में काफी मतभेद रहा है। कुछ लोग उसे ई०पू० तीसरी शती के उत्तरार्ध में रखते थे और कुछ उसे ई०पू० प्रथम शती का मध्य अथवा उत्तरार्ध समझते हैं। पहली धारणा का आधार उनका अनुमान रहा है कि सातवाहनों का उदय मौर्य शासकों के पतन के तत्काल बाद हुआ होगा। किन्तु अब मुद्रातात्विक और पुरातात्विक साधनों से जो साक्ष्य सामने आये हैं उनसे ज्ञात हुआ है कि मौर्यो के पतन और सातवाहनों के उदय के बीच काफी बड़ा अन्तराल था। मौयों के पतन पर उनके अधीनस्थ अधिकारी उठ खड़े हुए थे और उन्होंने विभिन्न भागों में अपने स्वतन्त्र राज्य स्थापित कर लिए थे और वे वहाँ सातवाहनों के उदय से पूर्व लगभग दो शती तक स्वतन्त्र रूप से शासन करते रहे। इस तथ्य के परिप्रेक्ष्य में सातवाहनों के उत्थान को ई०पू० पहली शती में रखकर उल्लिखित सातकर्णि को जानने की चेष्टा की जा सकती है।

महामेघवाहन वंश के श्री सद नामक एक शासक का परिचय गुण्टूपल्ली अभिलेख से और वेल्लपुर अभिलेख से ऐर वंश के महासद नामक शासक की जानकारी प्राप्त होती है। महामेघवाहन और ऐर दोनों का प्रयोग हाथीगुम्फा अभिलेख में खारवेल के लिए हुआ है। इससे स्पष्ट है कि ये दोनों ही शासक खारवेल से सम्बन्ध रखते हैं। सद नामान्त एक अन्य शासक का परिचय अमरावती से प्राप्त एक अभिलेख से मिलता है। सद नामान्त तीन शासकों महासद, शिव मकसद और असक ( अश्वक ) सद के सिक्के गुण्टूर जिले के वडुमानु नामक स्थान के पुरातात्विक उत्खनन में मिले हैं। इन सबके सम्मिलित साक्ष्य से इन शासकों का काल प्रथम शती ई० का अन्त और दूसरी शती का पूर्वार्ध ज्ञात होता है और उनका शासन आन्ध्र प्रदेश के कृष्णा, गुण्टूर और पश्चिमी गोदावरी वाले भू-भाग में था। खारवेल इन शासकों से एक-दो पीढ़ी से अधिक पहले नहीं हुआ होगा। अतः इस साक्ष्य के आधार पर यह निश्चित होता है कि उसका समय पहली शती ई० के आरम्भ से पहले नहीं होगा।

इस परिप्रेक्ष्य में सातवाहन नरेश प्रथम सातकर्णि के खारवेल का समसामयिक होने का अनुमान नहीं किया जा सकता। इस भूभाग में सातवाहन अपने शासन के अन्तिम दिनों में ही शासक रहे। अतः सातवाहन वंश के अन्तिम तीन-चार शासकों में से ही सातकर्णि नामक कोई शासक ही खारवेल का समसामयिक रहा होगा। सम्प्रति इतना ही अनुमान लगाया जा सकता है।

(२) पंक्ति संख्या ८ में ‘यवनराज दिमित’ के उल्लिखित होने का अनुमान संदिग्ध भाव से कुछ विद्वानों ने प्रस्तुत किया है और वे इससे तात्पर्य यवन-नरेश दिमित्र ( Demetrius ) से लेते हैं जिसका समय ई०पू० १६७ और १५१ के बीच अनुमान किया जाता है। किन्तु इस संदिग्ध पाठ के आधार पर कुछ कह सकना कठिन है।

बहुत सम्भावना है कि पाठ दिमित न होकर विमक या विमिक है और उसका तात्पर्य कुषाण-नरेश विम कदफिस से है। यदि यह अनुमान ठीक है तो इसके आधार पर खारवेल का समय प्रथम शती ई० में ही मानना होगा। कुछ विद्वान्, इस पंक्ति में यवन दिमित अथवा विमिक जैसा कुछ भी नहीं पाते; वे उसका दूसरा पाठ ही प्रस्तुत करते हैं। अतः इस पंक्ति के आधार पर भी कोई अन्तिम मत प्रकट नहीं किया जा सकता ।

(३) पंक्ति संख्या १२ में उल्लिखित बृहस्पतिमित्र ( बहसतिमित ) नामक किसी मगध-नरेश की जानकारी किसी सूत्र से उपलब्ध नहीं है। अतः काशीप्रसाद जायसवाल ने इसकी पहचान पुष्यमित्र शुंग से करने की कल्पना प्रस्तुत की थी। उनका कहना था कि बृहस्पति, पुष्य अथवा तिष्य नक्षत्र का नक्षत्राधिप है। उनका यह सुझाव कल्पना पर आधारित होने के कारण किसी भी विद्वान् को मान्य नहीं रहा। लोगों का प्रयास बृहस्पतिमित्र नामक किसी अन्य शासक के ढूँढ़ने का ही रहा है।

बहसतिमित ( बृहस्पतिमित्र ) नामक शासक के सिक्के कौशाम्बी से मिलते हैं। उसका समय एलन ने ई०पू० दूसरी शती अनुमानित किया है। कौशाम्बी के उत्खनन स्तर के आधार पर वे १८५ और ११५ ई० पू० के बीच रखे जाते हैं। कौशाम्बी के निकट ही पभोसा अभिलेख मिला है, उसमें भी बहसतिमित का नाम है। इसी प्रकार मोरा ( मथुरा ) से मिले एक अभिलेख में बृहस्वतिमित्र नामक एक शासक का नाम है । समझा जाता है कि इन तीनों सूत्रों से ज्ञात बहसतिमित ( बृहस्पतिमित्र ) एक ही व्यक्ति हैं। कौशाम्बी-मथुरा-अहिच्छत्रा के इस एकीकृत व्यक्ति का सम्बन्ध मगध से भी जोड़ा जाता है और इस बृहस्पतिमित्र को हाथीगुम्फा अभिलेख में उल्लिखित बृहस्पतिमित्र बताया जाता है। इस आधार पर खारवेल का समय ई०पू० दूसरी शती बताने का प्रयास किया गया है। किन्तु इस प्रयास में इस ओर ध्यान नहीं दिया जाता कि बोधगया से प्राप्त तोरण अभिलेखों से मगध में ही मित्र-वंश के कतिपय शासकों के होने की बात ज्ञात होती है। उनका समय लिपि स्वरूप के आधार पर ई०पू० प्रथम शती आँका जाता है। हाथीगुम्फा में उल्लिखित बहसतिमित के पूर्वोक्त बृहस्पतिमित्र की अपेक्षा इस वंश में होने की अधिक सम्भावना है। इस आधार पर भी खारवेल का समय प्रथम शती ई०पू० के आसपास ही आंका जा सकता है।

उपर्युक्त विवेचन खारवेल का समय पूर्णतः निश्चित करने में समर्थ नहीं है। उनका समय निश्चित करने के लिए कुछ अन्य प्रमाण अपेक्षित हैं। इस दृष्टि से निम्नलिखित तथ्य भी द्रष्टव्य हैं —

(१) अभिलेख में प्रयुक्त ‘महाराज’ उपाधि का सर्वप्रथम प्रयोग भारत के यवन-नरेशों द्वारा ई०पू० दूसरी शती के पूर्वार्द्ध में हुआ था। अतः इन विदेशी प्रभावों से मुक्त दूरस्थ कलिंग में उसका प्रयोग इस काल के बहुत बाद ही किसी समय हुआ होगा।

(२) अभिलेख की काव्य-शैली अत्यन्त विकसित है, यह उसके ओज-गुण में स्पष्ट है। यह इस बात का प्रतीक है कि यह रचना ई० शती से पूर्व की नहीं होगी

(३) अभिलेख के अक्षर व म, ह, ड और य के स्वरूपों से यह स्पष्ट प्रकट होता है कि वह निस्सन्देह बेसनगर-अभिलेख से बहुत पीछे का और पहली शती ई० से पूर्व का नहीं है।

(४) भारतीय कला मर्मज्ञों का विचार है कि मंछापुरी लयण की मूर्तिकला जिसमें खारवेल की रानी का अभिलेख है, शुङ्ग-कालीन भारहूत की मूर्तिकला के बहुत पीछे की है।

इन तथ्यों के प्रकाश में अभिलेख को पहली शती ई० से पूर्व कदापि नहीं रखा जा सकता। इस काल को स्वीकार कर लेने पर सातकर्णि, यवनराज विमक और मगधराज बृहस्पतिमित्र के साथ खारवेल की समसामयिकता अपने-आप स्पष्ट हो जाती है और नन्दराज के ‘ति-वस-सत’ का भी समाधान हो जाता है।

गुण्टूपल्ली अभिलेख

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