वैदिक देवता

भूमिका

ऋग्वैदिक आर्यों का सामाजिक व आर्थिक जन-जीवन जितना सरल था, धार्मिक जीवन उतना ही अधिक विशद और जटिल। यहाँ हमें प्रारम्भ में ‘बहुदेववाद’ के दर्शन होते। यह बहुदेववाद एकेश्वरवाद से होता हुआ एकवाद में प्रतिफलित होता है। इस एकवाद का पूर्ण परिपाक उपनिषदों में मिलता है। आर्यों के प्रधान देवता ‘प्राकृतिक’ शक्तियों के प्रतिनिधि हैं। इन प्राकृतिक शक्तियों का मानवीकरण किया गया है।

वैदिक देवताओं का वर्गीकरण

ऋग्वेद में देवों की बहुलता को देखकर इनके वर्गीकरण का प्रयास किया गया। इस वर्गीकरण के संकेत स्वयं ऋग्वेद में ही प्राप्त होते हैं, जिसके आधार पर वर्गीकरण के प्रयास किये गये हैं। इसमें से दो प्रमुख हैं :-

  • प्रथम, ऋग्वेद के दशम् मण्डल के १५८वें सूक्त के पहले श्लोक में।
  • द्वितीय, ऋग्वेद के प्रथम मण्डल के १३८वें सूक्त के ग्याहरवें श्लोक में।

प्रथम वर्गीकरण

ऋग्वेद के एक श्लोक के आधार पर यास्क के निरुक्त में देवताओं का संख्या मात्र तीन बतायी गयी है – पृथ्वी में अग्नि, अन्तरिक्ष में इन्द्र और वायु या आकाश में सूर्य। ये तीनों देवता इन तीन लोकों के स्वामी थे।

दशम् मण्डल; १५८वाँ सूक्त; प्रथम श्लोक — ऋग्वेद

सूर्यो न दिवस्पातु वातो अन्तरिक्षात्।

अग्निर्नः पार्थिवेभ्यः॥१॥

हिन्दी – सूर्य द्युलोक की बाधाओं से, वायु अंतरिक्ष की बाधाओं से तथा अग्नि पृथ्वी की बाधाओं से हमारी रक्षा करें॥

द्वितीय वर्गीकरण

ऋग्वेद में एक अन्य स्थान पर प्रत्येक लोक में ११-११ देवता बताये गये हैं और इनकी संख्या ३३ बतायी गयी है।

प्रथम मण्डल; १३९वाँ सूक्त; ११वाँ श्लोक — ऋग्वेद

ये देवासो दिव्येकादश स्थ पृथिव्यामध्येकादश स्थ।

अप्सुक्षितो महिनैकादश स्थ ते देवासो यज्ञमिमं जुषध्वम्॥११॥

हिन्दी – स्वर्ग में जो ग्यारह देव हैं, धरती पर जो ग्यारह देव हैं एवं अंतरिक्ष में जो ग्यारह देव हैं, वे अपनी महिमा से इस यज्ञ की सेवा करें॥

वैदिक देवताओं के सिंहावलोकन से यह प्रमाणित होता है कि वैदिक देवताओं को मूलतः तीन वर्गों में विभाजित किया गया है —

(१) आकाशस्य देवता (Gods of Sky) : वरुण, मित्र, चन्द्रमा, सूर्य, सविता, पूषण, विष्णु, अदिति, उषा, अश्विन्।

(२) अन्तरिक्षस्य देवता ( Gods of mid-air ) : इन्द्र, रुद्र, मरुत्, वायु और वात, मातरिश्वन्, पर्जन्य, आपः।

(३) पृथ्वीस्य देवता : सोम, पृथिवी, सरस्वती, बृहस्पति, और अग्नि।

यह वर्गीकरण प्राकृतिक आधार पर है अर्थात् वह आधार जिसका देवता प्रतिनिधित्व करते हैं। यह वर्गीकरण व्यावहारिक है और इस पर तुलनात्मक रूप से सबसे कम आपत्ति की जाती है। (तुलनात्मक रूप से कहा जाए)।

उपर्युक्त वर्गीकरण देवताओं के निवास स्थान को ध्यान में रखकर किया गया है। यह त्रिविध वर्गीकरण वैदिक विचारधारा में अत्यन्त ही महत्त्वपूर्ण है। इस वर्गीकरण को मैक्समूलर, ए० बी० कीथ, डॉ० राधाकृष्णन, डॉ० सूर्यकान्त आदि विद्वानों ने मान्यता प्रदान की है।

प्रमुख वैदिक देवता

ऋग्वेद के देवकुल में पुरुष देवताओं की संख्या अधिक है। जिसमें से वरुण, इंद्र, अग्नि और सोम महत्त्वपूर्ण हैं। इसके साथ ही कुछ देवियों के नाम भी मिलते हैं। इन देवी-देवताओं के बारे में कुछ विस्तार से जान लेना आवश्यक है। इनके विवरण इस तरह है :-

वरुण

वैदिक देवताओं में सबसे प्रधान देवता ‘वरुण’ हैं। ‘वरुण’ आकाश के देवता हैं। ‘वरुण’ शब्द ‘वर’ धातु से निकला है जिसका अर्थ होता है ढक लेना। आकाश को वरुण कहा जाता है क्योंकि यह समस्त पृथ्वी को आच्छादित किये हुए है। यूनान के ‘आरणौस’ के साथ उसका तादात्म्य किया जाता है। वरुण का सम्बन्ध अवेस्ता के ‘अहुरमज्दा’ के साथ भी बताया जाता है। वरुण के सम्बन्ध में ऋग्वेद में कहा गया है “सूर्य वरुण के चक्षु हैं, आकाश उसके वस्त्र हैं तथा तूफान उसका निःश्वास है।” नदियाँ उसकी आज्ञा से बहती है। सूर्य, चन्द्रमा, नक्षत्र वरुण के भय से ही कार्य करते हैं। सूर्य को वरुण का चक्षु कहा गया है तथा मित्र को वरुण का ‘सखा’ कहा गया है।

वरुण को ऋग्वेद में परम देव के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। वह परम ईश्वर है। वह देवों के देव हैं। वरुण सर्वज्ञ हैं। वह आकाश में उड़ने वाले पक्षियों का मार्ग जानता है तथा वायु की गति को जानता है। वरुण यह भी जानता है कि समुद्र में जहाज किस दिशा से प्रवाहित होंगे। वह अतीत, वर्तमान तथा भविष्य को जानता है। इस प्रकार जैसा ऊपर कहा गया है वरुण सर्वज्ञानी है। वरुण को रात्रि का देव भी कहा गया है तथा वरुण की तुलना अंधकार से की गई है। वरुण घृतव्रत अर्थात् दृढ़ संकल्प वाला है। वह चंचल मन वाला देव नहीं है। वरुण को शान्तिप्रिय देव के रुप में भी चित्रित किया गया है।

वरुण के पास एक रथ है जिस पर वे मित्र के साथ विचरते हैं। वरुण का आवास स्वर्णिम है जिसके हजार द्वार हैं तथा जो स्वर्ग में स्थित है।

वरुण को ऋग्वेद में शासक (Ruler) की संज्ञा से अभिहित किया गया है। यहाँ पर यह कहना प्रासंगिक होगा कि ऋग्वेद में ‘शासक’ शब्द का प्रयोग पाँच बार हुआ है जिनमें से चार बार वरुण के सन्दर्भ में ही प्रयुक्त हुआ है तथा एक बार सामान्य देवों के लिये प्रयुक्त हुआ है।

  • देखिये B. Keith Religion and Philosophy of the Veda and Upanishads. p. 118.

वरुण को बहुधा ‘राजा’ अथवा ‘सम्राट’ कहकर भी सम्बोधित किया गया है। वरुण के प्रभाव से ही रात्रि में चन्द्रमा चमकते हैं तथा तारे आकाश मे झिलमिलाते हैं। वरुण रात्रि का नियमन करते हैं। वरुण देवताओं के पथ का निर्देशन करते हैं। देवतागण वरुण के भय के फलस्वरूप ही कार्य करते हैं। वरुण ऋतुओं का नियमन करते हैं। वरुण को सदाचार का देव (God of morality) कहा गया है।

वह ऋत् का रक्षक है। ऋत् का अर्थ है जगत की व्यवस्था। ऋत् वह नियम है जो प्राकृतिक और नैतिक जगत् में कार्यान्वित है। ऋत् नियम के द्वारा वैदिक ऋषि विश्व की व्यवस्था तथा नैतिक जगत् की व्यवस्था की व्याख्या कर पाते थे। इस नियम के कारण ही सूर्य, चन्द्रमा, पृथ्वी, प्रातःकाल, दिन और रात की गति का नियमन होता है। यही ऋत् का नियम उपनिषद्-दर्शन में कर्मवाद (Law of Karma) में रूपान्तरित हो जाता है। वरुण के अन्तर्गत ऋत् नियम है तथा वे इस नियम का संचालन करते हैं। देवतागण भी इस नियम का उल्लंघन नहीं कर सकते हैं।

वरुण को नैतिक नियम का संरक्षक कहा गया है। वे मनुष्यों के कर्मों का मूल्यांकन करते हैं। सूर्य वरुण को मानव के कर्मों की सूचना देते हैं। मनुष्य के अनुचित कर्मों के लिये वे मानव को दण्डित करते हैं और जो व्यक्ति अपने पापों के लिये प्रायश्चित करते हैं वरुण उनके पापों को क्षमा कर करते हैं। इस प्रकार वरुण को कृपालु देव के रूप में प्रतिष्टित किया गया है।

वरुण अपने उपासकों की रक्षा करते हैं तथा उन्हें सुख प्रदान करते हैं। ऋग्वेद में कहा गया है “वह मानव की रक्षा करते हैं।” “वरुण मानव के भय का निवारण करते हैं। वह मानव के विचारों का संरक्षण करते हैं” इसीलिये ऋग्वेद में कहा गया है “वे धन्य हैं जो वरुण की कृपा को ग्रहण करते हैं।”

परन्तु इससे यह निष्कर्ष निकालना कि वरुण नैतिक नियम का उल्लंघन करने वालों के प्रति समझौता कर पाते हैं भ्रामक होगा। ऋग्वेद में ही कहा गया है “नैतिक शासक होने के नाते वरुण सभी देवताओं से कहीं ऊँचे हैं। पाप-कर्म से और व्रतों के उल्लंघन से वरुण को क्रोध आता है और वह ऐसा करने वालों को कड़ा दंड देते हैं।”

वरुण से सम्बोधित करते हुए जितने भी सूक्त हैं सबों में पापों के लिए क्षमा की प्रार्थना निहित है तथा वे पश्चाताप से ओत-प्रोत हैं। ऐसे सूतों में निम्नलिखित महत्वपूर्ण है “हमें अपने पूर्वजों के पापों से मुक्त करें और जो हमने इस शरीर के द्वारा किया हैं।” “मुझे उन पापों से भी मुक्त करें जिसे मैंने नशे के प्रभाव में किया है। ऐसे कर्म जानबूझ कर नहीं किया गए हैं।” “मैं पाप से मुक्त होकर शीघ्र तुम्हारी प्रशंसा करने लग जाऊँगा।”

वैष्णवों एवं भागवतों का भक्ति विषयक विचार वरुण की उपासना का प्रतिफल प्रतीत होता है

मित्र

मित्र का अर्थ ‘सखा’ होता है। वेद में ‘वरुण और मित्र’ दोनों की वन्दना साथ-साथ होती है। मित्र के सम्बन्ध में कहा जाता है कि वे वरुण के साथ निरन्तर निवास करते हैं। मित्र को प्रकाश का देव कहा गया है। मित्र सूर्य का प्रतिनधित्व करते हैं।

मित्र और वरुण में अन्तर यह है कि मित्र को दिन का देव कहा गया है जबकि वरुण को रात्रि का देव कहा गया है।

मित्र को सदाचार का देव (Ethical God) कहा जाता है। वे ‘शान्तिप्रिय’ देवता के रूप में चित्रित किये गये हैं। शान्तिप्रिय होने के फलस्वरुप मित्र को ‘सर्वप्रिय’ देव कहा गया है। मित्र कृत नियम के संचालक के रुप में भी प्रतिष्ठित है। सूर्य को मित्र का चक्षु कहा गया है। मित्र सूर्य और प्रकाश को अभिव्यक्त करते हैं।

ओल्डेनबर्ग का मत है कि वरुण मूलत: चन्द्रमा थे जबकि मित्र को मूलतः सूर्य के रुप में उन्होंने स्वीकारा है। मित्र और वरुण दोनों संयुक्त रुप से मानव के पापों को क्षमा करने वाले हैं। मित्र और वरुण से वर्षा के लिये भी प्रार्थना की गयी है। इस तथ्य का उल्लेख करते हुए प्रो० ए० बी० कीथ ने कहा है “दूसरे दृष्टिकोण से मित्र और वरुण का असली सम्बन्ध वृष्टि के साथ है। वृष्टि कराने के लिये देवताओं में उनकी सबसे अधिक बार प्रार्थना की गयी है।”

  • ए० बी० कीथ – वैदिक धर्म एवं दर्शन पृ० ११८

वरुण और मित्र दोनों को ‘आदित्य’ कहा गया है। आदित्य का अर्थ होता है अदिति के पुत्र। अदिति एक ‘देव’ है। अदिति के आठ पुत्र माने गये हैं जिनमें दो वरुण, और मित्र हैं। ये दोनों बन्धु हैं।

कुछ विचारकों का मत है कि वरुण के साथ रहने के फलस्वरूप मित्र की महत्ता कम हो गयी है। इस तथ्य पर प्रकाश डालते हुए डॉ० सूर्यकान्त ने जो लिखा है वह उद्धरणीय है “सच पूछो तो मित्र देवता वरुण में इतने अधिक समाविष्ट हो गये हैं कि उनकी स्वतंत्र विशेषताओं का नाम तक कम लिया गया है। हो न हो मित्र के व्यक्तित्व लोप का मुख्य कारण इस महान् देवता के साथ उनका अटूट सम्बन्ध है।”

  • डॉ० सूर्यकान्त कृत वैदिक देवशास्त्र, पृ० ५५।

सूर्य

सूर्य के लिये ऋग्वेद में दस सूक्त हैं। सूर्य संसार को प्रकाश देने वाले देवता (God of Light) हैं। वे अन्धकार को दूर करते हैं तथा अन्धकार की शक्तियों पर विजय प्राप्त करते हैं। सूर्य के पास एक रथ है जिसे सात अश्व खींचते हैं। सूर्य को वरुण और मित्र का चक्षु कहा गया है। सूर्य को दीर्घदर्शी कहा गया है। वे मानव के कर्मों का निरीक्षण करते हैं तथा वरुण को मानव के कर्मों की जानकारी प्रदान करते हैं। वे आलस्य को दूर भगाते हैं तथा मानव में कर्मठता का संचार करते हैं।

सूर्य की उपासना मानव मन के लिये स्वाभाविक है। यूनानी धर्म में सूर्य-पूजा का संकेत मिलता है। प्लेटो ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘रिपब्लिक’ में सूर्य-पूजा की महिमा का विवरण किया है। पारसी धर्म में सूर्य-पूजा पर बल दिया गया है।

सूर्य की उपासना से मानव में कर्म करने की क्षमता का विकास होता है। सूर्य की उपासना से मानव दीर्घ जीवन को प्राप्त करता है। सूर्य की उपासना से मानव रोगों से छुटकारा पाता है। ऋग्वेद में कहा गया है “हे सूर्य देव! आप जिस ज्योति से अंधकार का नाश करते हो एवं जिस किरण से सारे संसार को चमकाते हो, उसी के द्वारा हमारा अन्नाभाव, यज्ञहीनता, रोगसमूह एवं बुरे स्वप्न नष्ट करो।”

येन सूर्य ज्योतिषा बाधसे तमो जगच्च विश्वमुदीयर्षि।

तेनास्मद्विश्वामनिरामनाहुतिमपामीवामप दुष्ष्वप्न्यं सुव॥१०/३७/४॥

उपर्युक्त विवेचन से यह प्रमाणित होता है कि सूर्य की वन्दना, धन, स्वास्थ, आयु तथा क्रियाशीलता के लिये की जाती है। सूर्य की उपासना मानव के लिये लाभप्रद प्रतीत होती है क्योंकि सूर्य को मानव का कल्याणकारी तथा हितैषी के रुप में चित्रित किया गया है।

सूर्य की वन्दना मानव पापों से छुटकारा पाने के लिये भी करता है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि उदय के समय उनसे प्रार्थना की जाती है कि वे मित्र, वरुण एवं अन्य देवताओं के समक्ष मनुष्यों को निष्पाप घोषित करें। ऐसा कहा जाता है कि सूर्य के पास एक चक्र है जिससे वे पापी मनुष्यों का संहार करते हैं।

स सूर्य प्रति पुरो न उद्गा एभिः स्तोमेभिरेतशेभिरेवैः।

प्र नो मित्राय वरुणाय वोचोऽनागसो अर्यम्णे अग्नये च॥७/६२/२॥

हिन्दी – हे सूर्य! इन स्त्रोतरूपी गतिशील अश्वों के द्वारा आप ऊपर उठते हुए हम सबके सामने गमन करो। आप मित्र, वरुण, अर्यमा एवं अग्नि के पास जाकर हमें निरपराध बताना॥

सूर्य पर आकाश अवलम्बित है। सूर्य को ऋग्वेद में आकाश का रत्न कहा गया है। (ऋग्वेद ७/६३/४)। सूर्य को अदिति का पुत्र अर्थात् आदितेय भी कहा गया है।(ऋगवेद १०/८८११)। जहाँ तक सूर्य की स्थिति का सम्बन्ध है पुरुष सूक्त में कहा गया है कि सूर्य की उत्पत्ति विराट् पुरुष के नेत्रों से हुई है। यही कारण है कि जब मनुष्य की मृत्यु होती है तब उसके नेत्र को सूर्य में विलीन होने के लिये प्रार्थना की जाती है।

सविता

ऋगवेद में सविता के निमित्त ११ सूक्त मिलते हैं तथा लगभग १७० बार इनके नाम का उल्लेख हुआ है।

सविता एक स्वर्णिम देव (Golden Deity) है। वे सौर मंडल (Solar System) के देव हैं। उन्हें स्वर्णिम देव इसलिये कहा जाता है क्योंकि उनके नेत्र, हाथ, जिह्वा, भुजाएँ सब कुछ स्वर्णिम हैं। उनके रथ का रंग भी सुनहरा हैं तथा उसे दो घोड़े खींचते हैं।

ऋग्वेद के कुछ सूक्तों में सविता को सूर्य से अभिन्न बतलाया गया है। सूर्य एवं सविता का तादात्म्य (ऋग्वेद ४/१४/२) कुछ मंत्रों में दिखाया गया है। सविता और सूर्य को एक ही माना गया है। परन्तु कुछ मंत्रों में सविता को सूर्य से पृथक् माना गया है।

उर्ध्व केतुं सविता देवो अश्रेज्ज्योतिर्विश्वस्मै भुवनाय कृण्वन्।

आप्रा द्वावापृथ्वी अन्तरिक्षं वि सूर्यो रश्मिभिश्चेकितानः॥

हिन्दी – सारे संसार के लिए प्रकाश देते हुए सविता देव ऊर्ध्वमुखी किरणों का सहारा लेते हैं। सूर्य ने सबको विशेष रूप से देखते हुए किरणों से धरती, आकाश और अंतरिक्ष प्राप्त किया है॥

 

सविता ऋग्वेद के महत्त्वपूर्ण देव हैं ‘सविता’ शब्द ‘सू’ धातु से बना है, जिसका अर्थ है — प्रेरित करना। ‘सविता’ मानव को कर्म करने के लिये प्रेरित करते हैं। वे मानव में कर्मठता का संचालन करते हैं। सविता को सम्बोधित करते हुए ऋग्वेद में कहा गया है “उद्बोधन का स्वामी एकमात्र आप ही हैं।(ऋग्वेद – ५/८१/३)।

 

यस्य प्रयाणमन्वन्य इद्ययुर्देवा देवस्य महिमानमोजसा।

यः पार्थिवानि विममे स एतशो रजांसि देवः सविता महित्वना॥

हिन्दी – अन्य देव जिन सविता देव के पीछे चलकर एवं शक्ति प्राप्त करते हैं एवं जो पृथ्वी आदि लोकों को अपनी महिमा से सीमित करके सुशोभित होते हैं, वे सविता देव शोभित होकर विराजमान हों॥

उपर्युक्त विवेचन से ही प्रमाणित होता है कि सविता को ‘प्रेरित करने वाले देव’ के रुप में प्रतिष्ठा प्रदान किया गया है। सविता अपनी भुजाओं को उठाकर मनुष्यों को अनेक कर्मों में प्रेरित करते हैं।

सविता को ऋग्वेद में सूर्य देवता के रुप में ही महत्ता मिली है। यह सूर्य जो दिन में चमकता है राति काल में कहाँ चला जाता है? सम्भवतः रात्रि काल के सूर्य की अवस्था को ही ‘सविता’ कहा गया है। सायण ने लिखा है कि “सूर्य को उदय से पूर्व सविता कहते हैं और उदय से अस्त तक सूर्य।”१०

  • देखें – गयाचरण त्रिपाठी कृत वैदिक देवता, उद्भव एवं विकास ( पृ० २२६ )।१०

डॉ० सूर्यकान्त११ का मत है कि चूँकि सूर्य का वर्णन उन्ही पदों के द्वारा हुआ है जो प्रायः सविता के लिये प्रयुक्त हुए हैं, इसलिये दोनों देवताओं को पृथक् करके देखना कठिन हो गया है। यही कारण है कि गायत्री मंत्र में सूर्य को सविता के रूप में सम्बोधित किया गया है।

  • देखें – डॉ० सूर्यकान्त कृत : वैदिक देवशास्त्र ( पृ० ७२ )।११

सविता से बाधाओं को दूर करने के लिये मानव के द्वारा प्रार्थना की जाती है। सविता से मानव पाप से मुक्ति पाने के लिये भी वन्दना करता है। सविता से मानव स्वाथ्य एवं धन के लिये प्रार्थना करता है। सविता को मानव का कल्याण चाहने वाले देव के रूप में स्वीकारा गया है।

उषा

उषा देवकुल की प्रमुख देवी हैं। वह प्रभात की देवी (Goddess of Dawn) हैं। ऋग्वेद में बीस सुन्दर सूक्तों की रचना उषा की प्रशंसा के निमित्त हुए हैं। उषा के नाम का उल्लेख ऋग्वेद में ३०० बार हुआ है। इससे यह प्रमाणित होता है कि उषा एक महत्त्वपूर्ण देवी है। उषा, जिन्हें संस्कृत में ‘उषस्’ कहा गया है वैदिक काल की मनोरम कल्पना है जिसका संकेत करते हुए डॉ० सूर्यकान्त ने लिखा है जो उद्धरणीय है “उषस् की रचना वैदिक काल की सबसे मनोरम कल्पना है और संसार के किसी भी साहित्य में उषा से अधिक आकर्षक चरित्र नहीं मिलता।”१२ उषा का समीकरण यूनान के एओस (Eos) तथा रोम की आरोरा (Aurora) से किया जाता है।

  • देखें – डॉ० सूर्यकान्त कृत : वैदिक देवशास्त्र ( पृ० १०६ )।१२

सूर्योदय के पूर्व आकाश में जो लालिमा दिखायी देती है वही उषा का प्रतिनिधित्व करती है। उषा को सूर्य की प्रियतमा कहा गया है। सूर्य उषा का पीछा करते हैं। जैसे ही सूर्य का आगमन होता है वैसे ही उषा ओझल हो जाती हैं। उषा मानव को कार्य करने के लिये प्रेरित करती है तथा मानव और पशुओं में जीवन फूँक देती है। उषा के प्रभाव का विवरण करते हुए प्रो० ए० बी० कीथ ने जो कहा है वह उल्लेखनीय है — “उषा अपनी पहली दमक से ही मनुष्यों और पशुओं में जीवन फेंक देती है, पक्षी-गण उसके उदय पर घोंसलों में फुर-फुर करने लगते हैं और मनुष्य काम-काज की खोज में बाहर निकल पड़ते है।”१३

  • प्रो० ए० बी० कीथ कृत वैदिक धर्म एवं दर्शन ( पृ० १४९ )।१३

वह ( उषा ) मनुष्यों के पथों को चमकाती है तथा अन्धकार को दूर भगाती है। वह दुःस्वप्नों को भगा देती है तथा दुरात्माओं को बाधित करती हैं। उषा पापी आत्माओं का संहार करती हैं। उनके पास एक रथ है जिसका प्रयोग वह पापी एवं दुराचारी व्यक्तियों के दमन के लिये करती है।

उषा से प्रार्थना की जाती है कि वे पापी व्यक्तियों को चारपाई पर ही रहने दें ताकि वे पापमय कर्म का सम्पादन न कर सकें। उषा भक्तों को यज्ञ के लिये प्रेरित करती है। यही कारण है कि उषा का अग्नि के साथ निकट का सम्बन्ध दिखाया गया है। उषा से उपासक दीर्घ जीवन, यश और धन की कामना करते हैं। उषा सभी प्राणियों के लिये नवजीवन लाती है।

अश्विन

वरुण, इन्द्र, अग्नि और सोम के बाद यदि कोई महत्त्वपूर्ण देव हुआ तो वे ‘अश्विन’ हैं। अश्विनों के सम्बन्ध में ऋग्वेद में ५० सूक्त प्रयुक्त हुए हैं तथा इनके नाम का उल्लेख ४०० बार से अधिक हुआ है। इससे अश्विनों की महत्ता परिलक्षित होती है।

अश्विन युगल देवता (Twin Gods) हैं। अश्विन जुड़वा भाई है। यही कारण है कि अश्विनों की तुलना नेत्रों, हाथों, पैरों आदि से की गयी है जो युगल हैं। अश्विनों का सम्बन्ध मधु के साथ गहरा है। इसलिये इन्हें कभी-कभी ‘मधु का देव’ (God of Honey) कहकर भी प्रतिष्ठित किया गया है। अश्विन सर्वगामी हैं। वे स्वर्ग, वायु, गृह, पर्वत आदि स्थानों पर विद्यमान माने जाते हैं। अश्विन को युवा, सुन्दर, कमलों की माला से युक्त माना गया है। वे गम्भीर चेतना वाले देव हैं। वे मधुवर्ण वाले देव हैं। अश्विनों का सम्बन्ध प्रकाश के साथ भी है। वे अन्धकार को दूर भगाते हैं तथा दुरात्माओं का ध्वन्स करते हैं।

अश्विनों को उदार प्रकृति का देव कहा गया है। वे मानव की सहायता मुसीबत के समय करते हैं। वे मानव की सहायता हर संकट के समय करने के लिये तत्पर रहते हैं। यही कारण है कि अश्विनों को इन्द्र से भिन्न कोटि का देव माना गया है। इन्द्र की वन्दना मात्र समरभूमि में की जाती है क्योंकि वे (इन्द्र) युद्ध के देवता हैं परन्तु अश्विनों की वन्दना मानव किसी प्रकार के संकट के निवारण के लिये करता है। अश्विनों की उदारता अनुपम है।

अश्विनों की वन्दना वैवाहिक जीवन को सफल बनाने के लिये की जाती है। वे प्रेमी-प्रेमिकाओं को जोड़ते हैं। उन्हें सामुद्रिक देवता कहा गया है जो मानव की समुद्र से रक्षा करते हैं।

अश्विन के सम्बन्ध में दो प्रकार की धारणायें हमारे समक्ष मिलती हैं। ए० बी० कीथ (A.B. Keith) का विचार है कि सूर्योदय के पूर्व आकाश में जो लालिमा रहती है, वह लालिमा ही उषा के नाम से विख्यात है। उषा और सूर्योदय के बीच अश्विन का स्थान है। इस तथ्य पर प्रकाश डालते हुए ए० बी० कीथ ने कहा है जो उल्लेखनीय है “अश्विनों का अपना काल उषा के बाद और सूर्योदय से पहले है।”१४

  • ए० बी० कीथ कृत वैदिक धर्म एवं दर्शन (प्रथम खंड) पू० १४०।१४

डॉ० राधाकृष्णन दूसरे विचार को शिरोधार्य करते हैं। उनके अनुसार अश्विन जुड़वा भाई हैं जो सूर्योदय एवं सूर्यास्त के प्रतीक हैं। उन्होंने लिखा है “दो अश्विन बन्धु हैं जो सूर्योदय और सूर्यास्त के प्रतिरूप है।”१५

  • We have two Asvins corresponding to the dawn and dusk. — Radhakrishnan Indian Philosophy (Vol. 1) p. 82.१५

पूषन्

पूषन् सौर जगत् से सम्बन्धित देवता हैं। ऋग्वेद मे इनके लिये आठ सूक्त मिलते हैं तथा १२० बार इनके नाम का उल्लेख हुआ है। पूषन् शब्द ‘पुष्’ धातु से बना है, जिसका अर्थ है — पोषक।

ऋग्वेद में यह देवता मनुष्य को पुष्ट करने वाली शक्ति का दूसरा नाम है। पूषन् धन के स्वामी हैं और धन प्राप्ति के लिये इनसे वन्दना की जाती है। वे गृहस्थ जीवन को सुखमय होने में मानव की सहायता करते हैं।

पूषन् को चरागाह का देवता (Pastoral God) कहा गया है। वे पशुओं के संरक्षक हैं। पशुओं की रक्षा करना इनका मूल कार्य है। वे पशुओं को गड्ढे में गिरने से बचाते हैं। यदि वे किसी प्रकार गड्ढे में गिर जाते हैं तो पूषन् पशुओं को गड्ढे में गिर जाने से लगी चोट से उन्हें बचाते हैं तथा बिना घाव के घर पहुँचा देते हैं। यदि पशुगण खो जाते हैं तब पूषन् पशुओं को खोज कर उन्हें घर पहुँचाते हैं। पूषन् पथ के रक्षक हैं। पूषन् पथ को चमकाते हैं तथा पथ को सुरक्षित रखते हैं। वे पथ को पापियों के सम्पर्क से बचाते हैं। पूषन् को अन्त्येष्टि में भाग लेने के लिये प्रार्थना की जाती है तथा पूषन् से प्रार्थना की जाती है कि वे मृतात्मा को पितरों के पास ले जायें।

पूषन् को पशुओं के रक्षक के रूप में प्रधानतः चित्रित किया गया है। वे पशुओं के पोषक हैं। इससे यह प्रमाणित होता है कि वैदिक काल में पशुओं का महत्त्वपूर्ण स्थान था और उनकी रक्षा के लिये देवताओं की मीमांसा की गयी है।

चन्द्रमा

चन्द्रमा ऋग्वेद के अत्यन्त ही निम्नकोटि के देव हैं। सूर्य की तरह इन्हें भी प्रकाश का देवता कहा गया है। रात्रि के समय चन्द्रमा जगत् में प्रकाशित करते को हैं। चन्द्रमा के प्रभाव से समुद्र में ज्वार भाटा का उदय होता है। इस प्रकार समुद्र की तरंगों के साथ चन्द्रमा का निकट का सम्बन्ध है। चन्द्रमा के प्रभाव से ही कुछ पौधे विकसित होते हैं। चन्द्रमा पौधे के पनपने में योगदान देते हैं। चन्द्रमा को देखकर वैदिक ऋषियों के मन में कविता का सृजन हुआ है।

अदिति

अदिति का अर्थ जो बन्धन से मुक्त है, जो हर प्रकार की सीमाओं से मुक्त है। वैदिक धर्म में अदिति अनेक देवताओं के जन्मदात्री के रुप में स्वीकर किया गया हैं। जिन देवताओं को इन्होंने जन्म दिया है उनके वर्ग को ‘आदित्य‘ कहा गया है। आदित्यों का वर्ग कुछ अनिश्चित सा प्रतीत होता है। अथर्ववेद के अनुसार अदिति के आठ पुत्र हैं जिनमें वरुण, मित्र, इन्द्र प्रधान है। अदिति अनाक्सिमैंडर के अनन्त सत्ता के समानान्तर प्रतीत होता है।

अदिति को आदित्यों की माता कहा गया है। वे उपासकों की रक्षा करती हैं। वे रोग और बाधाओं की निवारक हैं। अदिति सब, जो यहाँ और इससे परे है, का अपरिमित आधारतुल्य है। अदिति के विषय में कहा गया है कि अदिति आकाश, मध्यवर्ती देश तथा पिता, माता और पुत्र है। जो उत्पन्न हुआ है और जो भविष्य में उत्पन्न होगा वह सब अदिति कहा गया है। अदिति को कभी सर्व देवता के रूप में भी प्रयुक्त किया गया है।

विष्णु

ऋग्वेद में विष्णु का स्थान गौण है। उनके विषय में केवल पाँच सूक्त आये हैं तथा उनके नाम का उल्लेख १०० बार ही हुआ है।

वे युवा होते हुए भी बृहत् शरीर वाले देव हैं। विष्णु का शरीर बड़ा है अथवा सारा संसार मात्र जिसका शरीर है वही विष्णु है। भक्त विष्णु को प्रिय है। यही कारण है कि भक्तों के बुलाने पर वे आ जाते हैं।

विष्णु के सम्बन्ध में कहा गया है कि वे भूमि के देवता हैं। वे मनुष्य को भूमि वितरित करते हैं। उनकी कृपा से ही मानव को धन सम्पति की प्राप्ति होती है। वे मानव के कल्याण चाहने वाले देव हैं।

विष्णु गर्भ के रक्षक है। गर्भ-रक्षक होने के फलस्वरुप इनकी उपयोगिता मानव जीवन के लिये बढ़ जाती हैं। विष्णु को उदार, संरक्षक एवं दानी देव के रूप में चित्रित किया गया है।

विष्णु का सूर्य के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध दिखता है। सूर्य विष्णु के रूप है तथा सूर्य विष्णु के रूप में सब लोकों को धारण करते हैं।

विष्णु के सम्बन्ध में कहा जाता है कि उनके तीन चरण हैं, जिनमें दो चरण दृश्य हैं परन्तु तीसरा अदृश्य है। विष्णु के तीन चरण सूर्य के उदय, मध्याह्न और सूर्य के अस्त के बोधक हैं। ब्राह्मणों के अनुसार विष्णु के तीन चरण (पद) पृथ्वी, वायु और आकाश में स्थित है।

यहाँ पर यह कहना अप्रासंगिक नहीं होगा कि विष्णु जो ऋग्वेद में गौण स्थान रखते हैं ब्राह्मणों में महत्त्वपूर्ण स्थान ग्रहण कर लेते हैं।

इन्द्र

इन्द्र को वैदिक धर्म में एक लोकप्रिय देवता के रुप में चित्रित किया गया है। वरुण का जो स्थान वेद में दिखता है उस स्थान को इन्द्र ग्रहण कर लेते हैं। ए० बी० कीथ (A.B. Keith) ने इन्द्र को सबसे महान देवता कहा है जो उल्लेखनीय है “इन्द्र ऋग्वेद के सबसे महान् देवता है। एक मात्र वरुण शक्ति में उनकी बराबरी कर पाते है।”१६ डॉ. सूर्यकान्त ने इन्द्र के सम्बन्ध में लिखा है “इन्द्र वैदिक भारतीयों के प्रियतम् राष्ट्रीय देवता है।”१७

  • ए० बी० कीथ कृत वैदिक धर्म एवं दर्शन ( पृ० १५३ )।१६
  • डॉ० सूर्यकान्त कृत वैदिक देवता शास्त्र ( पृ० १२६ )।१७

वेद में २५० सूक्त इन्द्र के विषय में कहे गये हैं जो ऋग्वेद के सूक्तों की संख्या का लगभग चतुर्थांश है। इससे भी इन्द्र की महत्ता का बोध होता है।

इन्द्र एक विलक्षण कोटि के देव हैं। इन्द्र से किसी भी प्राकृतिक घटना का बोध नहीं होता है जिसके फलस्वरूप इन्द्र का अर्थ अनिश्चित जँचता है।

इन्द्र ऋग्वेद के ऐसे देव हैं जिनका अत्यधिक मानवीकरण हुआ है। इन्द्र के सिर, भुजायें, हाथ, पैर, उदर की चर्चा हुई है। इनके उदर की तुलना जलाशय से की गयी है। जिस प्रकार जलाशय जल से भरा रहता है उसी प्रकार इन्द्र का उदर सोम रस से परिपूर्ण रहता है। इन्द्र सोम पान बहुत प्रिय है।

इन्द्र के केशों और दाड़ी की चर्चा हुई है जो भूरे रंग की है। इन्द्र के पिता का नाम घौस है। इनकी पत्नी का नाम इन्द्राणी है। इन्द्र के पास एक रथ है जिसे दो घोड़े खींचते हैं। इन्द्र को भारतीय जीयस (Zeus) कहा गया है। सर्वप्रथम इन्द्र को विद्युत का देव कहकर सम्बोधित किया गया है। वे वज्र धारण करते हैं। वज्र (Thunder) इन्द्र का अस्त है। इन्द्र अन्धकार पर विजय प्राप्त करते हैं तथा प्रकाश को प्रसारित करते हैं।

इन्द्र को बहुधा ‘युद्ध का देवता’ (God of battles) कहकर सम्बोधित किया गया है। इन्द्र की वन्दना युद्धभूमि में भी की जाती है। इन्द्र ऐसे देवताओं के साथ भी युद्ध करते हैं जो इनके प्रतिद्वन्दी थे। वे शत्रुओं को पराजित करते हैं और उनकी सम्पति को छीन लेते हैं। इन्द्र को देवताओं और असुरों के साथ युद्ध करने पड़ते थे। ऐसे देवता जो अहंकार और शक्ति से युक्त दिखायी देते थे इन्द्र उन्हें पराजित कर उनके अहंकार को समाप्त करने में सक्षम हो पाते थे। कभी-कभी इन्द्र धनुष और बाण ले कर उपस्थित होते हैं जिससे वे शत्रुओं को पराजित कर देते हैं।

इन्द्र को ‘वर्षा का देवता’ कहकर भी प्रतिष्ठित किया गया है। इन्द्र से वर्षा के लिये प्रार्थना की जाती है। वैदिक काल में कृषि वर्षा पर निर्भर करती थी। यही कारण है कि वहाँ वर्षा के लिये इन्द्र जैसे देवता की मीमांसा हुई है।

ऋग्वेद में इन्द्र के जन्म को लेकर विभिन्न प्रकार के विवरण मिलते हैं :

  • एक, इन्द्र का जन्म मेघ से हुआ है। जिस प्रकार बादल से विद्युत् चमकती हैं उसी प्रकार इन्द्र का जन्म हुआ है। इन्द्र का जन्म विद्युत् की तरह हुआ है। यही कारण है कि उत्पन्न होते ही वे आकाश को प्रकाशित कर देते हैं। उनके उत्पन्न होने पर अचल पर्वत, आकाश और पृथ्वी काँपने लगते हैं।
  • दो, इन्द्र का जन्म जल से सम्भव हुआ है।
  • तीन, इन्द्र की उत्पत्ति के विषय में कहा गया है कि देवताओं ने एक राक्षस को नाश करने के लिये उन्हें उत्पन्न किया था।

इन्द्र को ऋग्वेद में एक शक्तिशाली देवता के रूप में प्रतिष्ठा हुई है। इन्द्र को पृथ्वी और आकाश नमस्कार करते हैं। इन्द्र के सम्बन्ध में कहा जाता है कि उन्होंने सर्प को मारकर सात नदियों को पार किया है। इस प्रकार इन्द्र भयानक देवता के रूप में प्रतिष्ठित हैं।

इन्द्र को वेद में उदार देवता कहकर सम्बोधित किया गया है। उनकी उदारता अनुपम है। वे धन प्रदान करने के लिये निरन्तर आतुर रहते हैं। धन देने की प्रवृति उनके स्वभाव का अंग है। इन्द्र अपने उपासकों के साथ मित्र, भाई जैसे निकट सम्बन्धों में आते हैं। यही कारण है कि वैदिक कर्मकाण्ड सम्बन्धी विवरण में इन्द्र लोकप्रिय देवता के रूप में प्रतिष्ठित हैं।

रुद्र

ऋग्वेद में रुद्र के लिये तीन सूक्त आये हैं तथा उनके नाम का उल्लेख ७५ बार हुआ है। इससे प्रमाणित होता है कि ऋग्वेद में रुद्र को गौण स्थान प्राप्त है।

ऋग्वेद में रुद्र का चरित्र भयावह है। वे वज्र धारण करते हैं और तीर चलाते हैं। तीर चलाने में वे प्रवीण हैं। देवता भी रुद्र से डरते हैं। वे मरुतों के पिता हैं। रुद्र का अग्नि के साथ निकट का सम्बन्ध दीखता है। साधारणतया रुद्र को ‘तूफान का देव’ समझा जाता है। रुद्र को ‘कल्याणकारी शिव‘ भी कहा गया है।

मरुत्

मरुत् का एक समुदाय है जिसमें २१ सदस्य हैं। ये सभी मरुत् की संज्ञा से अभिहित किये गये हैं। मरुतों का प्रधान कार्य है इन्द्र की सहायता करना। ये रुद्र के पुत्र हैं। इसीलिये इन्हें ‘रुद्रियाः’ या ‘रुद्रा’ भी कहा गया है। वे वनों को कुचल डालते हैं तथा अंबार उड़ाते हैं। वे वृष्टि भी लाते हैं। इनका सम्बन्ध विद्युत् से है। ये चमकने वाले देव हैं। इनका प्रधान कार्य वर्षा कराना है।

वायु और वात

वायु और वात ‘युगल देवता’ हैं। ये ‘वायु-देवता’ के रूप में प्रतिष्ठित हैं। वायु का सम्बन्ध इन्द्र के साथ है जबकि वात का सम्बन्ध पर्जन्य के साथ है

वायु का रूप हमें दिखायी नहीं देता है लेकिन उनकी आवाज को हम सुनते हैं। वायु साँय-साँय करते हुए एक दिशा से दूसरी दिशा में प्रवाहित होती है। वायु निरन्तर विचरण करते हैं। ये एक क्षण के लिये भी आराम नहीं कर पाते हैं। वायु को ‘देवताओं का प्राण’ कहा गया है।

वात रोगियों का उपचार करते हैं तथा मानव-वर्ग को दीर्घायु प्रदान करते हैं। इन्हें अमृत प्रदान करने वाला देव भी कहा गया है।

आपः

ऋग्वेद में आप को गौण स्थान प्रदान किया गया है। इनके विषय में तीन सूक्त कहे गये हैं। उन्हें केवल माता, युवती स्त्रियाँ, वर देने वाली देवियाँ कहा गया है। आपः को ‘अग्नि की माता’ कहा गया है।

आपः वरुण के अधीन निवास करती हैं और वरुण जब मानव के कर्मों का मूल्यांकन करते हैं तो ये वरुण को सहायता प्रदान करती हैं। इस प्रकार आपः को मानव के कर्मों के निर्णय में भागीदार माना गया है।

आपः मानव को शुद्ध एवं संस्कृत बनाती है। गृह में मानव के स्वास्थ की देखभाल करना इनका प्रमुख कार्य है। ये मानव को आर्शीवाद देने के लिये तत्पर रहती हैं। आपः धन एवं अमृत प्रदान करने वाली देवी है।

पर्जन्य

पर्जन्य के लिये ऋग्वेद में तीन सूक्त आये हैं तथा ३० बार इनके नाम का उल्लेख हुआ है। पर्जन्य का अर्थ ‘मेघ‘ होता हैं। पर्जन्य ‘मेघ के देवता’ (God of Cloud) हैं।

प्रारम्भ में आर्यों के आकाश सम्बन्धी देवता ‘पर्जन्य’ थे। बाद में वे वरुण को आकाश के देवता के रूप में महत्ता देने लगे। यही कारण है कि कुछ विद्वानों ने पर्जन्य को आकाश का देव कहकर भी सम्बोधित किया है। फिर भी पर्जन्य को मेघ देव के रूप में ही महत्ता मिली है।

इनका मूल कार्य वर्षा लाना है। इन्हें ‘वृष्टि देवता’ (God of rain) कहकर भी सम्बोधित किया गया है। ये गरजते हैं बरसते हैं तथा पौधे इनके प्रभाव से विकसित होते हैं। इन्हें पशुओं का पोषक भी कहा गया है।

वात पर्जन्य को निरन्तर इनके कार्य में सहायता प्रदान करते हैं। पर्जन्य पापियों को धराशायी कर पाते हैं।

मातरिश्वन्

मातरिश्वन् को अग्नि का एक रूप कहा गया है। अग्नि का जन्म स्वर्ग में हुआ माना जाता है। जब अग्नि स्वर्ग से पृथ्वी पर आता है तब उसे मातरिश्वन् कहा जाता है। मानव धन, यश और अमृत की प्राप्ति के लिये मातरिश्वन् की प्रार्थना करता है। दो प्रेमियों को मिलाने के लिये भी इनकी वन्दना की गयी है। इस प्रकार मातरिश्वन् को अग्नि देव के रुप में स्वीकारना युक्तियुक्त है।

ऋग्वेद के तीन मंत्रों में मातरिश्वन् का नाम अग्नि के लिये आया है। यास्क के अनुसार मातरिश्वन् वायु-देव है। परन्तु उनके विचार को प्रामाणिकता नहीं मिल सकी है। यहाँ पर यह कहना प्रासंगिक जान पड़ता है कि ऋग्वेद के लोकप्रिय देव नहीं है। इनके लिये ऋग्वेद में एक सूक्त भी प्राप्य नहीं हैं। इनके नाम का उल्लेख तीन बार हुआ है।

यम

यम को ‘मृत्यु-देवता’ (God of Death) कहकर सम्बोधित किया गया है। इन्हें ‘यमलोक का राजा’ कहा जाता है। ये मृतक व्यक्तियों का यमलोक में स्वागत करते हैं। इनका रूप भयावह है। इनके शब्द कठोर एवं हृदयविदारक होते हैं। यम को अनेक विद्वानों ने देवता का दर्जा नहीं दिया है। यम पहले मानव है जिनकी मृत्यु हुई है तथा जो मृत्यु के उपरान्त यमलोक में निवास करते हैं

सोम

डॉ० सूर्यकान्त ने कहा है कि — “सोम ऋग्वेद के सबसे महान् देवों में से एक है।” नवम् मंडल के सभी ११८ सूक्त सोम को समर्पित हैं। सोम एक प्रकार की लता थी जिसके पत्ते को पीसकर मादक द्रव्य निकाला जाता था जिसे सोमरस की संज्ञा दी जाती थी। देवता गण जैसे इन्द्र, वायु, पर्जन्य, मरुत्, अग्नि आदि सोमरस का पान करते थे। सोम, इन्द्र का अत्यधिक प्रिय पेय था। सोम को ‘स्फूर्ति का देवता’ (God of Inspiration) माना गया है। वह अमर जीवन प्रदान करने वाला देवता है।

इन्हें मदिरा का देवता माना गया है। दुःखी मनुष्य मदिरा के पान से अपने दुःखों को भूल जाता है। यही कारण है कि वैदिक काल के लोगों ने मादक द्रव्य में ईश्वरत्व का दर्शन किया तथा सोम को देवता के रूप में प्रतिष्ठित किया है।

सोम की उत्पत्ति के सम्बन्ध में वैदिक विचारधारा में दो मत पाते हैं। पहला मत यह है कि सोम की उत्पत्ति स्वर्ग में हुई है। दूसरे मत के अनुसार सोम की उत्पत्ति पर्वतों पर हुई है। वेद में सोमरस की प्राप्ति जिन औजारों से होती थी उन औजारों को भी वैदिक लोग देवता मानते थे। उदाहरणस्वरूप, जिस पत्थर से सोम को पीसा जाता था उस पत्थर को भी पवित्र माना जाता था और उसकी भी वन्दना होती थी।

सोम मनुष्य में शक्ति का संचार करता है। सोम को अमरत्व प्रदान करनेवाला देव कहा गया है। सोम दीर्घ जीवन प्रदान करने वाला देव है। वह अपने उपासकों को मृत्यु से छुड़ाता है।

सोम के पान से मानव अनेक रोगों से छुटकारा पाता है। सोम के पान से अन्धे में देखने की शक्ति आ जाती है। सोमपान से लंगड़े चलने लगते हैं। औषधियों में सर्वश्रेष्ठ होने के नाते सोम को ‘औषधियों का राजा’ (King of the Medicines) कहा गया हैं। चूँकि सोम लताओं में सर्वश्रेष्ठ है इसीलिये सोम को ‘वनस्पतियों का राजा‘ (King of Plants) भी कहा गया है। सोम को ‘सरिताओं के राजा’ (ऋग्वेद – ९/८९/२) कहकर भी सम्बोधित किया गया है।

मानव को सोम से अनेक अपेक्षायें हैं। सोम के प्रति की गयी प्रार्थनाओं में मानव की अभिलाषायें एवं आकाशाएँ प्रकट हुई हैं। कुछेक को डॉ० राधाकृष्णन जी ने अपनी कृति ‘Indian Philosophy’ में उद्धृत किया है जो इस प्रकार है :

  • “हे सोम मुझे उस जगत् में ले चलो जहाँ नित्य प्रकाश हो।”
  • “जीवन बन्धन रहित हो आनन्द ही आनन्द हो जहाँ भोजन प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हो और प्रसन्नता ही प्रसन्नता हो।”

जहाँ तक सोम के प्रभाव का सम्बन्ध है एक उपासक की अनुभूतियों का विवरण अत्यावश्यक है, जो इस प्रकार अभिव्यक्त हुई है — “हमने सोम पी लिया है, हम अमर बन गये हैं, हम प्रकाश-लोक में पहुँच गये हैं, हमने देवताओं को जान लिया है।”१८

 

अपाम सोमममृता अभूमागन्म ज्योतिरविदाम देवान्।

किं नूनमस्मान्कृणवदरातिः किमु धूर्तिरमृत मर्त्यस्य॥८/४८/३॥१८

हिन्दी – हे मरणरहित सोम! हम तुम्हें पीकर अमर बनेंगे, स्वर्ग में जाएंगे एवं देवों को प्राप्त करेंगेशत्रु हमारा क्या कर लेगा? मुझ मनुष्य का हिंसक शत्रु क्या बिगाड़ लेगा॥

 

पृथ्वी

पृथ्वी के लिये एक सूक्त ऋग्वेद में मिलता है। इससे प्रमाणित होता है कि पृथ्वी को ऋग्वेद में गौण स्थान प्राप्त है। पृथिवी को ऋग्वेद में ‘माँ’ की संज्ञा दी गयी है। जिस प्रकार माँ अपने बच्चों का पोषण करती है ठीक उसी प्रकार पृथु फल, फूल, अन्न देकर मनुष्य का पोषण करती है। पृथ्वी की उदारता अनुपम है। वह पर्वत के भार को वहन करती है, पृथ्वी वृक्ष और वन के भार को वहन करती है। वह धरती को उर्वरा बनाती है क्योंकि वह पानी बरसाती है।

सरस्वती

ऋग्वेद में सरस्वती एक नदी है जो देवी (Goddess) के रुप में चित्रित हुई है। उनकी सात बहनें हैं। सरस्वती को नदियों की माता की संज्ञा से अभिहित किया गया है। ये दिव्य हैं। सन्तान एवं धन के लिये इनसे प्रार्थना की जाती है।

वेदोत्तरकालीन साहित्य में सरस्वती को ‘विद्या की देवी’ (Goddess of Learning) कहा गया है। वह विद्या रुपी ज्ञान को बिखेर कर अविद्या रुपी अज्ञान का अन्त करती है।

बृहस्पति

बृहस्पति एक पुरोहित हैं। इन्हें देवताओं का पुरोहित भी कहा गया है। इनका सम्बन्ध अग्नि के साथ निकट है। वे शास्त्र गाते हैं। उपासकों पर अनुग्रह करना इनकी विशेषता है। वे सम्पत्ति और आयु को बढ़ाने वाले देवता हैं। बृहस्पति को मूलतः अग्नि के एक पक्ष के रुप में मान्यता मिली है।

अग्नि

इन्द्र के बाद वैदिक देवताओं में अग्नि का स्थान है। डॉ० राधाकृष्णन ने कहा है कि — “अग्नि का महत्त्व केवल इन्द्र के नीचे दूसरे स्तर पर है।”१९

  • Agni is second in importance only to Indra. — Radhakrishnan : Indian Philosophy Vol.1 ( 82 ).१९

अग्नि के लिये २०० सूक्त ऋग्वेद में आये हैं। इससे यह प्रमाणित होता है कि अग्नि एक लोकप्रिय देवता हैं।

अग्नि उस देवता का नाम है जिसका प्रयोग मनुष्य यज्ञ के सन्दर्भ में करता है। वैदिक धर्म में अग्नि का प्रयोग यज्ञ के देवता के रूप में हुआ है। अग्नि, यज्ञ के समय, देवताओं को बुलाते हैं, उन्हें बिठाते हैं तथा यज्ञ के हविष्य को देवताओं को ग्रहण करने के लिये प्रार्थना करते हैं। उनके प्रयासों के फलस्वरूप देवता-गण यज्ञ-भोग कर पाते हैं।

उपर्युक्त विवेचन से यह प्रमाणित होता है कि मनुष्य यज्ञ करते समय जिन विषयों को अर्पित करता है उन्हें अग्नि के द्वारा देवताओं तक पहुँचाया जाता है। इस प्रकार अग्नि को मानव और देवताओं के बीच एक कड़ी के रुप में स्वीकार किया गया है। इसीलिये अग्नि को मानव का पुरोहित कहा गया है। अग्नि की अनुशंसा पर देवता यज्ञ के हविष को ग्रहण करते हैं।

अग्नि को ‘धूम केतु’ कहा गया है क्योंकि धूम उनका आवरण हैं। अग्नि की व्याख्या ऋग्वेद में मानव की तरह हुई है। अग्नि के तीन सिर, तीन जिह्वा हैं। अग्नि के दाढ़ी की बात की गई है जिसका रंग भूरा है। अग्नि दिन में तीन बार भोजन करते हैं। अग्नि का मूल्यवान भोजन घृत है। कभी-कभी वे जंगल को भी भस्म कर जाते हैं।

अग्नि को सूर्य के तुल्य माना गया है। वे सूर्य की तरह चमकते हैं तथा अन्धकार का नाश करते हैं और प्रकाश फैलाते हैं।

ऋग्वेद के अनुसार “वे सूर्य की भाँति चमकते हैं।” ”वे रात्रि में भी चमकते हैं।” उनकी लपटें पकड़ के बाहर हैं। अग्नि में सूर्य की तरह सुन्दरता है। एक ओर अग्नि जहाँ सूर्य से मेल खाते हैं वहाँ दूसरी ओर इन्द्र से पृथकता ग्रहण करते हैं। इन्द्र से युद्ध में विजय के लिये प्रार्थना होती है जबकि अग्रि से घरेलू सुख-चैन के लिये प्रार्थना की जाती है। इन्द्र युद्ध के देवता हैं जबकि अग्नि घरेलू समृद्धि के देवता हैं।

अग्नि के जन्म के प्रश्न को लेकर ऋग्वेद में तीन मत मिलते हैं —

(१) अग्नि का जन्म जल से हुआ है। जल अग्नि का गर्भ है।

(२) अग्नि का जन्म काठ से हुआ है।

(३) अग्नि का जन्म स्वर्ग में हुआ है।

अग्नि अपने उपासकों के हितैषी हैं। वे उन्हें विपदाओं से बचाते हैं। उनसे धन प्राप्ति के लिये प्रार्थना की गयी है तथा निर्धनता, शत्रु और राक्षस से बचने के लिये भी वन्दना की गयी है। अग्नि कर्म-काण्ड के प्रमुख देवता हैं। उनकी परिक्रमा करने का आदेश वेद में निहित है।

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