अशोक का बराबर गुहालेख

भूमिका

बराबर गुहालेख ( Barabar Cave Inscriptions ) अशोक के साम्प्रदायिक सौहार्दपूर्ण कृत्यों का साक्ष्य प्रस्तुत करता है। अशोक स्वयं बौद्ध धर्मानुयायी थे, फिरभी बराबर पहाड़ी में उन्होंने आजीवकों के लिए गुफाएँ बनवाकर दान की। बराबर की पहाड़ी को इन गुहालेखों में खलतिक नाम से पुकारा गया है। इसके साथ ही बराबर गुहालेख गुफाओं के नाम ( नयग्रोथ, सुप्रिया ) भी मिलते हैं। बराबर में अशोक के कुल तीन गुहालेख मिलते हैं।

बराबर गुहालेख : संक्षिप्त परिचय

नाम :- अशोक का बराबर गुहालेख ( Ashoka’s Barabar Cave Inscriptions )

स्थान :- बराबर पहाड़ी, जिला जहानाबाद ( बिहार )

भाषा :- प्राकृत

लिपि :- ब्राह्मी

काल :- मौर्यकाल

विषय :- आजीवक सम्प्रदाय को गुहादान

पहला बराबर गुहालेख : मूलपाठ

१ – लाजिना पियदसिना दुवाइस बसा [ भिसितेना ]

२ – [ इयं निगोह ] [ कुमा दिना ] [ आजीविकेहि ] ( । )

हिन्दी अनुवाद

१ – बारह वर्षों से अभिषिक्त राजा प्रियदर्शी द्वारा

२ – यह नयग्रोथ गुफा आजीवकों को दी गयी।

दूसरा बराबर गुहालेख : मूलपाठ

१ – लाजिना पियदसिना दुवा-

२ – डस-वसाभिसितेना इयं

३ – कुभा खलतिक पवतसि

४ – दिना आजीवि केहि ( । )

हिन्दी अनुवाद

१ – राजा प्रियदर्शी द्वारा

२ – बारह वर्ष अभिषिक्त होने पर यह

३ – गुफा खलतिक पर्वत में

४ – आजीविका को दी गयी

तीसरा बराबर गुहालेख : मूलपाठ

१ – लाजा पियदसी एकुनवी-

२ – सति वसाभिसिते ज [ लघो ]

३ – [ सागमें ] थातवे इयं कुभा

४ – सुपिये ख [ लतिक पवतसि दि ]

५ – [ ना। ]

हिन्दी रूपान्तरण

१ – राजा प्रियदर्शी ने उन्नीस

२ – वर्ष अभिषिक्त होने पर वर्षा काल

३ – के उपयोग के लिए यह [ सुप्रिया ] गुफा

४ – सुन्दर खलतिक पर्वत पर [ आजीविकों को ] दिया

टिप्पणी

अशोक के इन गुहा अभिलेखों में आजीविकों को निवास के लिए गुफा दान दिये जाने के उल्लेख है ।

अशोक ने अपने सातवें स्तम्भलेख में आजीविक सम्प्रदाय का उल्लेख निर्ग्रन्थों और ब्राह्मणों के साथ किया और उनके लिए धर्म-महामात्र नियुक्त करने की बात कही है। परन्तु इससे किसी धर्म के प्रति किसी प्रकार का कोई पक्षपात प्रकट नहीं होता।

यद्यपि अशोक के सम्बन्ध में कहा जाता है कि उसकी निष्ठा बौद्ध-धर्म के प्रति थी। यह उसके धर्म-शासनों से भी प्रकट होता है; फिर भी उसने बौद्ध भिक्षुओं के लिए किसी गुफा का निर्माण नहीं करवाया। अशोक और उसके पौत्र दशरथ ने आजीविकों के प्रति ही यह उदारता क्यों दिखायी? यह प्रश्न विचारणीय अवश्य है।

आजीवक-सम्प्रदाय के संस्थापक मक्खलि ( मंखलि ) गोशालि माने जाते हैं। इस सम्प्रदाय का विकास भगवान् बुद्ध के समय या उससे कुछ पहले हुआ था। परन्तु इसका उल्लेख मौर्यकाल में ही मिलता है और उसके सम्बन्ध की जानकारी बौद्ध-ग्रंथों से होती है। उन ग्रन्थों में इसकी चर्चा प्रसंगवश ही हुई है।

पतंजलि के महाभाष्य से प्रकट होता है कि आजीवक लोग भाग्यवादी थे और उनका किसी प्रकार के कारण एवं परिणाम में विश्वास नहीं था। इनके सम्बन्ध में जो कुछ भी जानकारी अब तक उपलब्ध है, उसे ए० एल० बैशम ने अपनी पुस्तक ‘आजीविकाज’ में संकलित किया है।

  • History and Doctrines Of The Ajivikas : A Vanished Indian Religion — A. L. Basham.

अशोक का सातवाँ स्तम्भलेख

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