आरा अभिलेख

भूमिका

कनिष्क का आरा अभिलेख पाकिस्तान के कटक से कुछ दूरी पर आरा नामक नाला के पास से प्राप्त हुआ है। अटक से दक्षिण-पश्चिम में जहाँ पर सिंधु नदी पश्चिम की ओर मुड़ती है वहाँ बाघ-नीलाब ( Bagh-Nilab ) के पास आरा नामक नाला बहता है। यह प्राकृत भाषा और खरोष्ठी लिपि में अंकित है। वर्तमान में यह लाहौर संग्रहालय में ( सम्भवतः ) है।

आरा अभिलेख : संक्षिप्त परिचय

नाम :- कनिष्क तृतीय का आरा अभिलेख ( Ara Inscription of Kanishka III )

स्थान :- अटक शहर ( पाकिस्तान ) से दक्षिण-पश्चिम स्थित चाहवाग निगलाव या बाघ नीलाब के समीप स्थित आरा के एक कुएँ से प्राप्त

भाषा :- प्राकृत

लिपि :- खरोष्ठी

समय :- कनिष्क तृतीय का शासनकाल

विषय :- कनिष्क ( तृतीय ) के शासनकाल में दषव्हर द्वारा अपने माता-पिता की पूजा हेतु कुँआ बनवाने का उल्लेख

आरा अभिलेख : मूलपाठ

१. महरजस रजतिरजस देवपु [ त्रस ] [ क ] इ [ स ] रस

२. व [ झि ] ष्प-पुत्रस कनिष्कस संवत्सरए एकचप [ रि ]—

३. [ शए ] सं० २० [ + ] २० [ + ] १ जेठस मसस दिव [ से ] १ [ । ] इ [ शे ] दिवस क्षुणम् ख [ दे ]

४. [ कुपे ] दषव्हरेन पोषपुरिअ-पुत्रण मतर पितरण पुय [ ए ]

५. [ हि ] रंणस सभर्य [ स ] [ स ] पुत्रस अनुग्रहर्थए सर्व [ सप ] ण

६. जति [ षु ] छतए [ ॥ ] इमो च लिखितो म [ धु ] ..[ ॥ ]

  • स्टेन कोनो इसको हितए पढ़ते हैं।

हिन्दी अनुवाद

महाराज रजतिराज देवपुत्र कैसर वझेष्क ( वाशिष्क ) पुत्र कनिष्क के संवत्सर ४१ के ज्येष्ठ मास का दिन १। इस दिन ( क्षण ) को पोषपुरिय-पुत्र दशव्हर ने यह कुँआ खुदवाया अपने माता-पिता, हिरण्यनाम्नी भार्या और पुत्रसहित अपने अनुग्रह और सर्व सत्वों ( जीवों ) के जन्म-जन्म में रक्षा ( हित ) के लिए। इसे मधु …… ने लिखा ।

आरा अभिलेख : विश्लेषण

यह कुएँ के खुदवाये जाने की एक सामान्य प्रज्ञप्ति है। कुआँ खुदवाने वाले को पोषपुरिय-पुत्र कहा गया है। इसके दो अर्थ हो सकते हैं :-

  • प्रथम, पोषपुरिय व्यक्तिवाचक नाम हो सकता है अथवा
  • द्वितीय, पोषपुर का तात्पर्य पुरुषपुर ( पेशावर ) से है और पुत्र का अभिप्राय ‘मूल निवासी’ से।
  • इन दोनों अर्थों में से कौन सा अर्थ ग्राह्य है निश्चित नहीं कहा जा सकता; पर इस दूसरे अर्थ से ही प्रयोग किये जाने की सम्भावना अधिक है। लोग इसी अर्थ में ग्रहण करते हैं।
    • निवासी की अभिव्यक्ति के लिए मध्यकालीन अनेक लेखों में ‘अन्वय’ शब्द का प्रयोग मिलता है, जो पुत्र का पर्याय-सा ही है। यथा-अग्रोतक निवासी के लिए अग्रोतकान्वय का प्रयोग अनेक लेखों में हुआ है।

इस लेख का ऐतिहासिक महत्त्व वझेष्क-पुत्र कनिष्क के उल्लेख के कारण है। इसमें उल्लिखित वर्ष से स्पष्ट है कि यह कनिष्क उस कनिष्क से सर्वथा भिन्न है जिसके अभिलेख संवत् १ से २३ तक प्राप्त होते हैं। अतः इतिहासकारों ने इस कनिष्क को कनिष्क द्वितीय की संज्ञा दी थी। परन्तु अधिकतर विद्वान इसे कनिष्क तृतीय के रूप में पहचानते हैं जो उचित भी लगता है।

महाराज रजतिराज देवपुत्र कैसर विरुद का प्रयोग इस अभिलेख में कनिष्क के लिए किया गया है। अतः इस प्रसंग में लोगों का ध्यान उस चीनी अनुश्रुति की ओर गया है जिसमें चीन, भारत, रोम और यू-ची के सम्राट् चार देवपुत्र कहे गये हैं। इस अनुश्रुति के सम्बन्ध में कुछ लोगों का अनुमान है कि उसका आरम्भ भारत से हुआ है। इस प्रकार उनका यह भी अनुमान है कि उनके उल्लेखों का क्रम भारत, ईरान, चीन और रोम रहा होगा। उसी क्रम से इस अभिलेख में चारों देशों के सम्राटों की उपाधि का प्रयोग किया गया है। इसमें महाराज भारतीय, रजतिराज ईरानी, देवपुत्र चीनी और कैसर रोमन उपाधि है। इस प्रकार कुछ लोगों ने इन उपाधियों में उक्त अनुश्रुति की व्याख्या देखने का प्रयत्न किया है।

महाराज रजतिराज और देवपुत्र विरुदों का प्रयोग अभिलेखों में पूर्ववर्ती कुषाण-नरेशों के लिए होता रहा है। अतः उनका प्रयोग इस लेख में स्वाभाविक ही है। इस लेख में केवल नयी बात यह है कि इसमें इन उपाधियों के साथ कैसर उपाधि का भी प्रयोग है जो रोम सम्राटों की उपाधि रही है। उसका प्रयोग रोम के व्यापारिक सम्पर्कों का ही परिणाम प्रतीत होता है। इस प्रयोग को रोम सम्राटों के वैभव की अनुगूँज से प्रेरित कनिष्क को उनके समक्ष मानने का प्रयास अनुमान किया जा सकता है। किन्तु हमारी दृष्टि में इसका प्रयोग अभिलेखों में प्रयुक्त षाहि विरुद के पर्याय के रूप में ही किया गया है।

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