अशोक का पाँचवाँ बृहद् शिलालेख

भूमिका

पाँचवाँ बृहद् शिलालेख ( Fifth Major Rock Edict ) सम्राट अशोक के चतुर्दश बृहद् शिलालेखों में से पञ्चम अभिलेख है। मौर्य सम्राट अशोक द्वारा भारतीय उप-महाद्वीप में ‘आठ स्थानों’ पर ‘चौदह बृहद् शिलालेख’ या चतुर्दश बृहद् शिला प्रज्ञापन ( Fourteen Major Rock Edicts ) अंकित करवाये गये। यहाँ पर ‘मानसेहरा संस्करण’ का मूलपाठ उद्धृत किया गया है। यद्यपि  गिरनार संस्करण सबसे सुरक्षित अवस्था में है फिरभी अन्य संस्करणों को मिलाकर पढ़ा जाता रहा है।

पाँचवाँ बृहद् शिलालेख : संक्षिप्त परिचय

नाम – अशोक का पाँचवाँ बृहद् शिलालेख ( Ashoka’s Fifth Major Rock Edict ) या पंचम / पञ्चम बृहद् शिलालेख या पाँचवाँ बृहद् शिला प्रज्ञापन।

स्थान – मानसेहरा, हजारा जनपद; पाकिस्तान।

भाषा – प्राकृत।

लिपि – ब्राह्मी।

समय – अशोक के सिंहासनारोहण के १२ वर्ष के बाद अर्थात् १३वाँ वर्ष ( २५६ ई०पू० )

विषय – सम्राट अशोक द्वारा धर्म का संदेश और उसके महत्त्व का रेखांकन।

पाँचवाँ बृहद् शिलालेख : मूलपाठ

१ – देवानंप्रियेनप्रियद्रशि रज एवं अह [ । ] कलणं दुकरं [ । ] ये अदिकरे कयणसे से दुकरं करोति [ । ] तं मय वहु कयणे कटे [ । ] तं मअ पुत्र

२ – नतरे [ च ] परं च तेन ये अपतिये में अवकपं तथं अनुवटिशति से सुकट कषति [ । ] ये चु अत्र देश पि हपेशति से दुकट कषति [ । ]

३ – पपे हि नम सुपदरे व [ । ] से अतिक्रतं अन्तरं न भुतप्रुव ध्रममहमत्र नम [ । ] से त्रेडशवषभिसितेन  मय ध्रममहमत्र कट [ । ] से सव्रपषडेषु

४ – वपुट ध्रमधिथनये च ध्रमवध्रिय हिदसुखये च ध्रमयुतस योन-कम्बोज-गधरन रठिकपितिनिकन ये व पि अञे अपरत [ । ] भटमये-

५ – षु ब्रमणिम्येषु अनथेषु वुध्रषु-हिदसुखये ध्रमयुत अपलिबोधये वियपुट ते [ । ] बधनबधस पटिविधनये अपलिबोधसे मोछये च इयं

६ – अनुबध प्रजवति कट्रभिकर ति व महल के ति व वियप्रट ते [ । ] हिदं बहिरेषु च नगरेषु सव्रेषु ओरोधनेषु भतन च स्पसुन च

७ – येव पि अञे ञतिके सव्रत वियपट [ । ] ए इयं ध्रमनिशितो ति व ध्रमधिथने ति व दनसंयुते ति सव्रत विजितसि मअ ध्रमयुतसि विपुट ते

८ – ध्रममहमत्र [ । ] एतये अथ्रये अयि ध्रमदिपि लिखित चिर-ठितिक होतु तथ च मे प्रज अनुवटतु [ । ]

संस्कृत रूपान्तरण

देवानां प्रियः प्रियदर्शी राजा एवं आह। कल्याणं दुष्करं। यो यदि कुर्यात कल्याणस्य स दुष्करं करोति। तस्मा बहु कल्याणं कृतं तन्मम पुत्राश्च नप्तारश्च परं च तानि हि यान्यपत्यानि मे यावत्कल्पं तथा अनुवर्तिष्यन्ते तत्सुकृतं करिष्यन्ति। यः तु अत्र देशमपि हापयिष्यति स दुष्कृतं करिष्यति। पापं हि नाम सुप्रचारम्। तदतिक्रान्तमन्तरं न भूतपूर्वाः धर्ममहामात्राः नाम। त्रयोदश वर्षाभिषिक्तेन मया धर्ममहामात्राः कृता। ते सर्व पार्षदेषु व्यापताः धर्माधिष्ठानाय चधर्म-वद्धड्या हित सुखाय च धर्मयुक्तस्य यवनकम्बोज गांधाराणाम् राष्ट्रिक पिटनिकानाम्, ये वापि अन्ये अपरान्ताः। भतार्येषु ब्राह्मणेभ्येषु अनाथेषु वद्धेषु हित सुखाय धर्म युक्तस्य अपरिवाधाय व्यापताः ते बन्धनवधस्य प्रतिविधानाय अपरिवाधाय मोक्षाय च। एवमनुबन्धं प्रजावन्त इति वा कृताधिकारा इति वा महान्त इति व व्यापताः। त इह वाह्येषु च नगरेषु सर्वेषु अवरोधनेषु भ्रातणां स्वसणां च ये वापि अन्ये ज्ञातिषु सर्वत्र व्यापताः। एवं धर्मनिश्चिता इतिवा दान संयुक्ता इति वा सर्वत्र विजिते मम धर्मयुक्त व्याप्तठास्ते धर्ममहामात्राः। एतस्मै अर्थाय इयं धर्मलिपिलेखिता चिरस्थितिका भवतु। तथा च मे प्रजा अनुवर्तन्ताम्।

हिन्दी में अनुवाद

१ – देवों के प्रिय प्रियदर्शी राजा इस तरह कहते हैं — कल्याण दुष्कर है। जो कल्याण का आदिकर्ता है, वह दुष्कर [ कार्य ] करता है। सो मैंने अनेक कल्याणकारी कार्य किये है।

२ – इसलिए जो मेरे पुत्र व पौत्र हैं और आगे उनके द्वारा जो मेरे अपत्य ( लड़के, वंशज ) होंगे [ वे ] यावत्कल्प ( कल्पान्त तक ) वैसा अनुसरण करेंगे, तब वे सुकृत ( पुण्य ) करेंगे। परन्तु जो इसमें से ( यहाँ ) [ एक ] देश ( अंश ) को भी हानि पहुँचायेगा, वह दुष्कृत ( पाप ) करेगा।

३ – पाप वस्तुतः सहज में फैलनेवाला ( सुकर ) है। बहुत काल बीत गया, पहले धर्ममहामात्र नहीं होते थे। सो १३ वर्षों से अभिषिक्त मुझ द्वारा धर्ममहामात्र ( नियुक्त ) किये गये।

४ – वे सब पाषण्डों ( पन्थों ) पर धर्माधिष्ठान और धर्मवृद्धि के लिए नियुक्त हैं। ( वे ) यवनों, कंबोजों, राष्ट्रिकों और पितिनिकों के मध्य और अन्य भी जो अपरान्त ( के रहने वाले ) हैं उनके बीच धर्मायुक्तों या धर्मायुक्तों ( धर्मविभाग के राजकर्मियों या ‘धर्म’ के अनुसार आचरण करने वालों ) के हित ( और ) सुख के लिए [ नियुक्त हैं ]।

५ – वे भृत्यों ( वेतनभोगी नौकरों ), आर्यों ( स्वामियों ), ब्राह्मणों, इभ्यों ( गृहपतियों, वैश्यों ), अनाथों एवं वृद्ध ( बड़ों ) के बीच धर्मयुक्तों के हित-सुख और अपरिबाधा के लिए नियुक्त हैं। वे बन्धनबद्धों ( कैदियों ) के प्रतिविधान ( अर्थसाहाय्य, अपील ) के लिए, अपरिबाधा के लिए और मोक्ष के लिए नियुक्त हैं,

६ – यदि वे [ बन्धनबद्ध मनुष्य ] अनुबद्धप्रजावान्  ( अनुब्रद्धप्रज ) ( सन्तानों में अनुरक्त, सन्तानों वाले ), कृताभिकार ( विपत्तिग्रस्त ) या महल्लक ( वयोवृद्ध ) हों। वे यहाँ ( पाटलिपुत्र में ) और अब बाहरी नगरों में मेरे भ्राताओं के, [ मेरी ] बहनों ( भगिनियों ) के

७ – और अन्य जो [ मेरे ] सम्बंधी हों उनके अवरोधनों ( अन्तःपुरों ) पर सर्वत्र नियुक्त हैं। वे धर्ममहामात्र सर्वत्र मेरे विजित में ( समस्त पृथ्वी पर ) धर्मयुक्तों पर, यह निश्चय करने के लिए कि [ मनुष्य ] धर्मनिश्रित हैं या धर्माधिष्ठित हैं या दानसंयुक्त हैं, नियुक्त हैं।

८ – इस अर्थ से यह धर्मलिपि लिखवायी गयी [ कि वह ] चिरस्थित ( चिरस्थायी ) हो और मेरी प्रजा ( उसका ) वैसा अनुवर्तन ( अनुसरण ) करे।

हिन्दी में धाराप्रवाह अनुवाद

राजाओं का प्रिय राजा प्रियदर्शी यह कहता है — कल्याण दुष्कर ( कठिन ) है, जो पहली बार ऐसा कोई कार्य करता है, वह दुःसाध्य कर्म करता है। मैंने अनेक कल्याणकारी कार्य किये है। यदि मेरे पुत्र, पौत्र और वंशज कल्पान्त तक, ऐसा करेंगे तो यह एक सुकृत ( पुण्य ) कार्य होगा। किन्तु जो थोड़ा भी [ धर्म का ] त्याग करेंगे वे पाप के भागी बनेंगे। पाप करना आसान है।

प्राचीनकाल से ही धर्ममहामात्र कभी धर्ममहामात्र नियुक्त नहीं हुए थे। मैंने अपने राज्याभिषेक के १३वें वर्ष धर्ममहामात्र नियुक्त किये हैं। वे ( धर्ममहामात्र ) धर्मस्थापना और धर्म-वृद्धि के लिए एवं धर्मात्माओं के हित व सुख के लिए सभी सम्प्रदायों में, और यवनों, कम्बोजों, गन्धारों … और अन्य अपरान्तों में नियुक्त हैं। वे ( धर्ममहामात्र ) भृत्यों, वैश्यों, ब्राह्मणों, इभ्यों ( राजाओं या क्षत्रियों ) में अनाथों व वृद्धों में उनके हित तथा सुख के लिए और धर्मात्माओं की अड़चनें दूर करने के लिए और उनकी मुक्ति के लिए प्रयासरत हैं। वे ( धर्ममहामात्र ) कैदियों की ( मुक्ति ) धन देकर सहायता करने, उनकी परेशानियों को दूर करने के लिए और उनकी रिहायी में लगे हैं — उनकी सन्तानों का बोझ, अत्याचार के शिकार या वृद्ध होने के अनुसार उनकी परेशानियों का निवारण करते हैं।

ये ( धर्ममहामात्र ) लोग यहाँ पटलिपुत्र और बाहर के सभी नगरों में, मेरे और मेरे भाइयों, बहनों और दूसरे सम्बंधियों के महलों में सर्वत्र नियुक्त किये गये हैं। ये धर्म-महामात्र मेरे पूरे साम्राज्य में धर्मयुक्त लोगों को और जो धर्मनिष्ठ, धर्माश्रित या दानशील हैं, उनकी सहायता देने के लिए नियुक्त हैं।

यह धर्मलिपि इसलिए लिखवायी गयी ताकि [ वह ] चिरस्थायी रहे एवं मेरी सन्तानें ( प्रजा ) [ मेरा ] अनुसरण करे।

प्रथम बृहद् शिलालेख

द्वितीय बृहद् शिलालेख

तृतीय बृहद् शिलालेख

चतुर्थ बृहद् शिलालेख

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